वो 64 देश, जहां आबादी का नक्शा अब सिकुड़ रहा! बाकी दुनिया के लिए क्या मैसेज है

एक तरफ जहां भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे एशियाई देश लंबे समय तक जनसंख्या विस्फोट की चुनौती से जूझते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दुनिया के नक्शे पर एक बहुत बड़ा और शांत बदलाव आ चुका है. कई देश अब जनसंख्या में तेज गिरावट के दौर में प्रवेश कर चुके हैं.

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21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती 'इंसानों का विस्फोट' नहीं, बल्कि 'इंसानों की कमी' होने वाली है (Photo-ITG) 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती 'इंसानों का विस्फोट' नहीं, बल्कि 'इंसानों की कमी' होने वाली है (Photo-ITG)

संदीप कुमार सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 06 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:31 AM IST

सोचिए, किसी शहर में नए अस्पताल, सड़कें और चमचमाते ऑफिस तो बन रहे हों, लेकिन पार्कों में बच्चों की किलकारियां गायब हों, स्कूलों पर ताले लटक रहे हों और अस्पतालों के डिलीवरी वार्ड खाली पड़े हों. यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हमारी पृथ्वी की नई और कड़वी हकीकत बनती जा रही है.

दशकों से हमें यही पढ़ाया और समझाया गया था कि दुनिया में जनसंख्या का विस्फोट हो रहा है और संसाधन खत्म हो जाएंगे. लेकिन संयुक्त राष्ट्र और आवर वर्ल्ड इन डेट के आधिकारिक आंकड़े अब एक बिल्कुल उलटी और हैरान कर देने वाली तस्वीर पेश कर रहे हैं.

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दुनिया के 64 देश और क्षेत्र अपनी आबादी के उच्चतम स्तर यानी 'पीक पॉपुलेशन' को पार कर चुके हैं. इसका मतलब है कि इन देशों की जनसंख्या अपने चरम पर पहुंचकर अब नीचे की ओर ढलने लगी है.

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस 64 देशों की फेहरिस्त में केवल छोटे या युद्धग्रस्त देश शामिल नहीं हैं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी और ताकतवर अर्थव्यवस्थाएं खड़ी हैं. दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश चीन अपने पीक को पार कर चुका है और वहां की जनसंख्या अब हर साल घट रही है. दक्षिण कोरिया में फर्टिलिटी रेट दुनिया में सबसे कम यानी लगभग 0.72 रह गई है, जिससे अनुमान है कि इस सदी के अंत तक वहां की आबादी आधी से भी कम रह जाएगी. जापान और थाईलैंड जैसे एशियाई देश भी इसी ढलान पर तेजी से नीचे जा रहे हैं.

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अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि वो 64 देश कौन से हैं? तो अगर महादेशों के लेवल से देखा जाए तो पूर्वी और पूर्वी-दक्षिण एशिया में चीन, हांगकांग, ताइवान, जापान, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड इस लेवल पर आ चुके हैं. यूरोप में इटली, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, यूक्रेन, रूस, ऑस्ट्रिया हैं. कैरिबियन और लैटिन अमेरिका में क्यूबा, प्यूर्टो रिको, जमैका, उरुग्वे, डोमिनिका, मार्टिनिक, गुआदेलूप, कुराकाओ, मोंटसेराट, सेंट किट्स एंड नेविस, सेंट मार्टिन, सेंट विंसेंट एंड द ग्रेनेडींस, यूएस वर्जिन आइलैंड्स और फॉकलैंड आइलैंड्स जैसे इलाके हैं.

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यूरोप और जापान तो इस दौर में एक दशक से भी पहले दाखिल हो चुके थे. जापान में अब हर साल बच्चों के खिलौनों और डायपर के मुकाबले बुजुर्गों के डायपर ज्यादा बिकते हैं. हजारों स्कूल बच्चे न होने के कारण हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं. वहीं पोलैंड, रोमानिया और बुल्गारिया जैसे पूर्वी यूरोपीय देशों में कम जन्मदर के साथ-साथ युवाओं का दूसरे देशों में पलायन आबादी घटने का बड़ा कारण बना है.

और हैरान करने वाली बात ये है कि यह गिरावट किसी महामारी, युद्ध या कुदरती आफत की वजह से नहीं आई है, बल्कि इंसानी समाज के रहन-सहन और सोच में आए बुनियादी बदलावों का नतीजा है.

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रिप्लेसमेंट रेट से नीचे गिरती फर्टिलिटी चिंता की बात क्यों है ये समझने की जरूरत है. किसी भी देश की आबादी को स्थिर रखने के लिए प्रति महिला औसतन 2.1 बच्चों की जरूरत होती है, जिसे रिप्लेसमेंट रेट कहते हैं. आज दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी ऐसे देशों में रह रही है जहां यह दर 2.1 से बहुत नीचे गिर चुकी है.

महंगाई और शहरीकरण का बोझ भी इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है. बड़े शहरों में बच्चों का पालन-पोषण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और घर का खर्च इतना बढ़ गया है कि कपल अब एक से ज्यादा बच्चा पैदा करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. अब ज्यादा महिलाएं शिक्षित हो रही हैं, अपने करियर को प्राथमिकता दे रही हैं और देर से शादी करने या बिना बच्चों के रहने का स्वतंत्र फैसला ले रही हैं. समाज का यह बदलाव अब सीधे आबादी के आंकड़ों पर दिखने लगा है.

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बाकी दुनिया के लिए क्या मैसेज है?
64 देशों का यह सिकुड़ता नक्शा उन सभी देशों के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जहां अभी आबादी बढ़ रही है. UN के ताजा प्रोजेक्शंस बताते हैं कि- 2050 का दशक आते-आते ब्राजील, मैक्सिको और अर्जेंटीना जैसे दक्षिण अमेरिकी देश अपनी आबादी के पीक को छू लेंगे.

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2060 का दशक आते आते भारत का नंबर भी आ जाएगा. आज दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत 2060 के दशक में अपने उच्चतम स्तर यानी लगभग 170 करोड़ तक पहुंचेगा. इसके बाद भारत में भी आबादी घटने का दौर शुरू हो जाएगा.

2084 में वैश्विक पीक दिखेगा. यानी दुनिया की आबादी साल 2084 के आसपास लगभग 10.3 अरब पर अपना उच्चतम स्तर छुएगी. तब मानव इतिहास में पहली बार पूरी दुनिया की कुल जनसंख्या का ग्राफ हमेशा के लिए नीचे गिरना शुरू होगा.

अब आपके मन में सवाल उठ सकता है कि क्या अमेरिका जैसे समृद्ध देश में भी आबादी घट रही है? इसका जवाब है- नहीं. अमेरिका में भी जन्मदर बहुत कम है, लेकिन UN के मुताबिक उसकी आबादी का पीक इस सदी के अंत तक भी नहीं आएगा. इसका सीधा कारण इमिग्रेशन यानी विदेशी प्रवासियों का आना है. अमेरिका हर साल लाखों युवाओं को अपने देश में बसने का मौका देता है, जो वहां की घटती जन्मदर की भरपाई कर देते हैं.

भविष्य की बड़ी और गंभीर चुनौतियां ये हैं.

वर्कफोर्स का संकट- सस्ते और असीमित मजदूरों का जमाना अब बीते दिनों की बात बन जाएगा. काम करने वाले हाथ कम होंगे, जिससे कंपनियों को रोबोटिक्स, ऑटोमेशन और AI पर पूरी तरह निर्भर होना पड़ेगा.

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पेंशन और हेल्थकेयर का भारी बोझ- टैक्स देने वाले युवा कम होंगे और पेंशन या इलाज पर निर्भर बुजुर्गों की संख्या दोगुनी-तिगुनी हो जाएगी. सरकारों के पास रेवेन्यू कम आएगी और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा.

इमिग्रेशन ही बनेगा नया ईंधन- जो देश विदेशी हुनर और युवाओं को अपने यहां आने की छूट देंगे, वही आर्थिक रूप से टिक पाएंगे. बंद सीमाओं वाले देशों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा.

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अमीर बनने की सीमित मोहलत: भारत और अफ्रीका जैसे युवा देशों के लिए यह सबसे बड़ा मैसेज है. उनके पास डेमोग्राफिक डिविडेंड यानी युवा आबादी का फायदा उठाने के लिए केवल अगले 20-30 साल बचे हैं. अगर इस दौरान हमने अपने युवाओं को सही स्किल, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और रोजगार नहीं दिया, तो आबादी घटने से पहले देश अमीर नहीं बन पाएगा.

64 देशों की वीरान होती सड़कें और बंद होते स्कूल हमें आगाह कर रहे हैं कि 21वीं सदी की नई हकीकत अब 'जनसंख्या नियंत्रण' नहीं, बल्कि एक बूढ़ी और सिकुड़ती हुई दुनिया को संभालने की तैयारी है. साथ ही इस बदले हुए हालात की जरूरतों को देखकर अपने देश को बदलना भी है ताकि कम होती आबादी संकट बनने की जगह संसाधन बन सके.

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