जैसे ही कैलेंडर में किसी लॉन्ग वीकेंड की तारीख चमकती है, दिल्ली-मुंबई जैसे बड़े शहरों की सड़कों से गाड़ियों के रेले पहाड़ों की ओर निकल पड़ते हैं. कोई दफ्तरों से छुट्टी बढ़वाकर, तो कोई बहाने बनाकर मनाली से लेकर मसूरी तक घंटों लंबे ट्रैफिक जाम में फंसी गाड़ियों में सवार हो लेता है, बाकी लोग दफ्तरों के जंजाल में उलझे रहते हैं. पर सोचिए, अगर किसी मुल्क में छुट्टियों के नाम पर यह अफरा-तफरी और काम का तनाव न हो, बल्कि छुट्टी लेना एक सम्मानित राष्ट्रीय परंपरा और मानसिक सुकून का असली स्वैग माना जाए? जहां आपका दफ्तर याद दिलाए कि आप घूमने कब जा रहे हैं?
घुमक्कड़ शास्त्र के जनक राहुल सांकृत्यायन के अनुसार घुमक्कड़ी यानी घूमना-फिरना मनुष्य को ज्ञान देता है, नई चीजें सिखाता है और समाज को आगे बढ़ाता है. उनकी रचनाएं घुमक्कड़ी को सबसे बड़ा धर्म और समाज की प्रगति का मूल आधार मानती हैं.
सोचिए, अगर किसी देश में काम से छुट्टी लेकर किसी समुद्र तट पर बैठना आलस नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय गौरव और जीवन जीने की कला माना जाए तो? जहां दफ्तर आपसे यह पूछे कि 'आप घूमने कब जा रहे हैं?' और जहां घूमने-फिरने को विलासिता नहीं, बल्कि मानसिक सेहत और सुकून के लिए जरूरी स्वैग का दर्जा हासिल हो.
राहुल सांकृत्यायन के घुमक्कड़ी के इसी दर्शन को जिस राष्ट्र ने अपनी रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक संस्कृति में पूरी तरह उतार लिया है, वह यूरोप के केंद्र में बसा देश जर्मनी है. यहां के लोगों को दुनिया का ट्रैवल चैंपियंस माना जाता है. और इसका कारण है एक खास कल्चर जिसने जर्मन्स को Reiseweltmeister यानी दुनिया के ट्रैवल चैंपियंस का तमगा दिलाया है.
ग्लोबल टूरिज्म इंडस्ट्री और यूएन टूरिज्म के आंकड़ों पर नजर डालें तो अरबों डॉलर पर्यटन पर खर्चने वाले जर्मन हमेशा आगे दिखते हैं. जर्मन पर्यटक विदेश यात्राओं पर सालाना 138 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च करते हैं. आउटबाउंड टूरिज्म स्पेंडिंग यानी विदेश यात्रा पर खर्च के मामले में जर्मनी सालों से चीन और अमेरिका के साथ दुनिया के टॉप-3 देशों में काबिज है.
यूरोस्टैट के आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 8.4 करोड़ की आबादी वाला यह देश हर साल 10 करोड़ से अधिक अंतरराष्ट्रीय यात्राएं दर्ज कराता है. यानी देश की कुल जनसंख्या से भी अधिक बार यहां के लोग सीमा पार कर विदेश घूमने निकलते हैं.
यहां वान्डरलस्ट कल्चर का साफ प्रभाव दिखता है. क्योंकि, जर्मनी में घूमने का यह जुनून केवल अमीरी का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उनकी सामाजिक सोच से जुड़ा है. जर्मन भाषा का एक प्रसिद्ध शब्द वान्डरलस्ट पूरी दुनिया में जाना जाता है, जिसका अर्थ है प्रकृति और नई जगहों को तलाशने की अदम्य इच्छा.
जर्मनी को घुमक्कड़ों का मुल्क बनाने में तीन मुख्य फैक्टर काम करते हैं.
पहला- जर्मनी में वर्क और लाइफ बैलेंस को बहुत गंभीरता से लिया जाता है. श्रम कानूनों के तहत हर कर्मचारी को साल में 25 से 30 दिनों की पेड लीव मिलती हैं. राष्ट्रीय छुट्टियों और वीकेंड को जोड़कर जर्मन नागरिकों के पास घूमने के लिए हर साल 5 से 6 हफ्ते का समय होता है. इस वैधानिक छुट्टी को जर्मन भाषा में Urlaub कहा जाता है, जिसे भुनाना हर नागरिक अपना अधिकार समझता है.
दूसरा- यहां बचपन से हाइकिंग और एक्सप्लोर करने की ट्रेनिंग बच्चों को दी जाती है. जर्मन समाज में बच्चों को शुरुआती दिनों से ही हाइकिंग, पैदल यात्रा करने या बाहरी दुनिया को समझने के लिए प्रेरित किया जाता है. नए रास्तों पर निकलना, नए समाज को समझना और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करना उनकी परवरिश की बुनियादी ट्रेनिंग का हिस्सा है.
तीसरा- जर्मन नागरिक अचानक ये यात्राएं नहीं करते, बल्कि अपनी छुट्टियों की प्लानिंग 6 महीने से 1 साल पहले ही कर लेते हैं. मजबूत बजट प्रबंधन और दुनिया के सबसे शक्तिशाली पासपोर्टों में से एक होना उनके इस शौक को रफ्तार देता है.
अब ये सवाल भी उठता है कि दुनिया भर में ट्रैवल चैंपियंस का तमगा हासिल करने वाले ये जर्मन सैलानी आखिर जाते कहां हैं और वहां क्या ढूंढते हैं? पर्यटन डेटा के अनुसार, जर्मन पर्यटकों का सबसे पसंदीदा ठिकाना यूरोप का भूमध्यसागरीय क्षेत्र है. स्पेन का मैलोरका द्वीप तो जर्मन पर्यटकों के बीच इतना लोकप्रिय है कि मजाक में इसे जर्मनी का '17वां राज्य' भी कह दिया जाता है. स्पेन के अलावा इटली, ग्रीस, फ्रांस, तुर्की और क्रोएशिया जर्मन सैलानियों की टॉप विशलिस्ट में शामिल रहते हैं.
जर्मन घुमक्कड़ सिर्फ धूप सेंकने या समुद्र तटों पर आराम फरमाने नहीं जाते, बल्कि उनका मुख्य मकसद सूरज-समुद्र और संस्कृति का बैलेंस होता है. वे ऐतिहासिक इमारतों को देखने, स्थानीय कला व स्थापत्य को समझने, प्राचीन कस्बों की पैदल यात्रा करने और प्राकृतिक हाइकिंग ट्रेल्स को एक्सप्लोर करने में गहरा यकीन रखते हैं. लंबी दूरी की यात्राओं में संयुक्त राज्य अमेरिका, थाईलैंड, मिस्र और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश उनके पसंदीदा डेस्टिनेशन बनकर उभरे हैं.
यूएन टूरिज्म की रिपोर्ट बताती है कि जहां जर्मन सैलानी दुनिया भर में घूमते हैं, वहीं वैश्विक स्तर पर सबसे ज्यादा पर्यटकों की अगवानी करने का रिकॉर्ड फ्रांस के नाम दर्ज है. हर साल लगभग 10 करोड़ से अधिक अंतरराष्ट्रीय सैलानी अकेले फ्रांस की वास्तुकला, एफिल टॉवर और वाइन कल्चर को देखने पहुंचते हैं. इसके बाद स्पेन दूसरे और संयुक्त राज्य अमेरिका तीसरे स्थान पर आते हैं. जर्मन सैलानी भी सबसे ज्यादा इन्हीं देशों के सांस्कृतिक वैभव, प्राकृतिक सुंदरता और बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर का लुत्फ उठाने के लिए वहां का रुख करते हैं.
हाल के वर्षों में ग्लोबल आउटबाउंड टूरिज्म में भारत भी तेजी से अपनी जगह बना रहा है. दुनिया के टूरिज्म मैप पर भारत भी अब एक प्रमुख प्लेयर है. भारतीय नागरिक हर साल लगभग 3 करोड़ से अधिक अंतरराष्ट्रीय यात्राएं कर रहे हैं और यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है. भारतीय सैलानियों का वैश्विक आउटबाउंड खर्च 30 अरब डॉलर के पार पहुंच चुका है. वियतनाम, थाईलैंड, यूएई और यूरोपीय देशों में भारतीय पर्यटकों की बढ़ती संख्या यह साबित करती है कि भारतीय मध्यम वर्ग में भी अब 'काम के साथ सुकून और ट्रैवल' का कल्चर तेजी से अपनी जगह बना रहा है.
लोगों की जुबां पर ये लाइनें अक्सर आ जाती हैं कि-
सैर कर दुनिया की गफ़िल ज़िंदगानी फिर कहां,
ज़िंदगानी गर रही तो नौजवानी फिर कहां.
जर्मनी के लोगों ने इस दर्शन को केवल किताबों में नहीं रखा, बल्कि अपनी जीवनशैली का स्थायी हिस्सा बना लिया है. सही मायनों में जर्मनी वह मुल्क है जहां छुट्टी लेना कोई अपराधबोध या हिचकिचाहट नहीं, बल्कि एक सम्मानित कल्चर है और घूमकर मिलने वाला सुकून ही उनका असली स्वैग है.
संदीप कुमार सिंह