भारत के तीन 'वॉटर वेपन' से ऐसे टूट रही ड्रैगन के पिट्ठू पाकिस्तान की रीढ़

चिनाब नदी पर बने बगलिहार, सलाल और दुल्हस्ती जैसे हाइड्रो प्रोजेक्ट भारत के सबसे बड़े रणनीतिक हथियार बनकर उभरे हैं. आखिर ये तीनों परियोजनाएं पाकिस्तान की कृषि, अर्थव्यवस्था और कथित वॉटर सिक्योरिटी पर कितना असर डाल सकती हैं? पूरी कहानी समझिए.

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पाकिस्तान में इन दिनों सिंधु के पानी पर खलबली मची है. (Photo- AI Generated) पाकिस्तान में इन दिनों सिंधु के पानी पर खलबली मची है. (Photo- AI Generated)

एम. नूरूद्दीन

  • नई दिल्ली,
  • 01 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 6:00 PM IST

'पानी और खून एक साथ नहीं बह सकते.' पहलगाम आतंकी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यही लाइन भारत की नई जल नीति का आधार बनी हुई है. दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 की सिंधु जल संधि दोनों देशों के रिश्तों का सबसे स्थिर समझौता मानी जाती थी. लेकिन अप्रैल 2025 में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पहली बार इस संधि को "इन एबेयंस" (In Abeyance) यानी निलंबित करने का फैसला किया. इसकी वजह से अब पाकिस्तान में खलबली मची है.

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भारत ने पाकिस्तान को साफ संदेश दे दिया है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक पानी को लेकर पुराने नियमों के तहत सहयोग की उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए. भारत के इसी रुख के बाद चिनाब नदी पर बने तीन बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट बगलिहार, सलाल और दुल्हस्ती अचानक पूरी रणनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं.

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आज सवाल सिर्फ बिजली उत्पादन का नहीं है. सवाल यह है कि क्या ये तीनों परियोजनाएं पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी हैं?

पहले समझिए चिनाब क्यों इतना अहम है...

आजादी के वक्त भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि के तहत छह नदियों का बंटवारा किया गया था. इसके तहत पूर्वी नदियां रावी, ब्यास और सतलुज भारत को मिलीं. जबकि पश्चिमी नदियां सिंधु, झेलम और चिनाब का ज्यादतर पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया. हालांकि, संधि ने भारत को पश्चिमी नदियों पर बहते पानी से बिजली उत्पादन करने वाली परियोजनाएं बनाने का अधिकार दिया था. भारत ने इसी प्रावधान के तहत चिनाब पर कई हाइड्रो प्रोजेक्ट विकसित किए हैं. आज वही परियोजनाएं पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता बन चुकी हैं.

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बगलिहार बांध, जिसके पेच कसने से पाकिस्तान में होती है पानी की कमी

जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में बना 900 मेगावाट का बगलिहार हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट चिनाब पर भारत की सबसे अहम परियोजनाओं में गिना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसके फ्लशिंग गेट्स हैं. इन गेट्स की मदद से भारत जल प्रवाह और गाद निकालने की प्रक्रिया को कंट्रोल कर सकता है.

(इमेज - गूगल अर्थ)

 

यही वजह है कि मई 2025 में जब भारत ने जल प्रवाह का संचालन बदला, तब पाकिस्तान के मराला हेडवर्क्स तक पहुंचने वाला पानी काफी घट गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, वहां जल प्रवाह करीब 35,000 क्यूसेक से घटकर लगभग 3,100 क्यूसेक तक पहुंच गया था. यही घटना पाकिस्तान में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बनी.

सलाल डैम, जिससे पाकिस्तान के निचले इलाके एक झटके में डूब जाएंगे

चिनाब नदी पर भारत का दूसरा बड़ा हथियार है 690 मेगावाट का सलाल बांध. ये बांध जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में बना है. यह परियोजना रणनीतिक रूप से इसलिए ज्यादा अहम मानी जाती है क्योंकि यह पाकिस्तान सीमा के नजदीक स्थित है.

(इमेज - गूगल अर्थ)

 

अगर भारत जल प्रवाह की टाइमिंग बदलता है या गाद निकालने की प्रक्रिया के दौरान ज्यादा मात्रा में पानी छोड़ता है, तो पाकिस्तान के निचले इलाकों में अचानक जलस्तर बदल सकता है. यानी जहां जरूरत पड़े वहां पानी रोकना और जरूरत पड़ने पर नियंत्रित तरीके से छोड़ना दोनों ऑप्शन भारत के पास मौजूद हैं.

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दुल्हस्ती और उसका स्टेज-II पाकिस्तान की बड़ी मुसीबत

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले में स्थित 390 मेगावाट का दुल्हस्ती प्रोजेक्ट पहले से एक्टिव है. लेकिन अब भारत ने इसके दुल्हस्ती स्टेज-II को भी मंजूरी दे दी है. नई योजना के तहत अतिरिक्त सुरंगें, भूमिगत पावर हाउस और बेहतर जल प्रबंधन सिस्टम विकसित की जा रही है.

(इमेज- गूगल अर्थ)

 

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत चिनाब के जल प्रवाह की टाइमिंग को पहले की तुलना में और ज्यादा प्रभावी तरीके से कंट्रोल कर सकेगा. यानी पानी पूरी तरह रोकना संभव नहीं होगा, लेकिन कब कितना पानी छोड़ा जाए, इस पर भारत की क्षमता निश्चित रूप से बढ़ेगी.

पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?

भारत की ताकत जितनी इन परियोजनाओं में है, उससे कहीं बड़ी कमजोरी पाकिस्तान के इंफ्रास्ट्रक्चर में छिपी हुई है. चिनाब नदी भारत से निकलकर सीधे पाकिस्तान के कृषि क्षेत्र में प्रवेश करती है. लेकिन भारत की सीमा के तुरंत बाद पाकिस्तान के पास ऐसा कोई विशाल स्टोरेज सिस्टम नहीं है जो अचानक कम या ज्यादा जल प्रवाह को संभाल सके. तारबेला और मंगला जैसे बड़े बांध सिंधु और झेलम बेसिन से जुड़े हैं. चिनाब पर वैसी स्टोरेज क्षमता मौजूद नहीं है. यही वजह है कि जल प्रवाह में अचानक बदलाव पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है. 

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डेटा शेयरिंग बंद होने से क्यों बढ़ी पाकिस्तान की परेशानी?

सिंधु जल संधि का सबसे अहम हिस्सा सिर्फ पानी का बंटवारा नहीं था. भारत नियमित रूप से पाकिस्तान के साथ जल प्रवाह, बाढ़, बारिश और हाइड्रोलॉजिकल डेटा शेयर करता था. संधि निलंबित होने के बाद भारत ने यह डेटा पाकिस्तान को देना भी बंद कर दिया. अब पाकिस्तान को पहले से यह जानकारी नहीं मिलती कि भारत कब बांधों का संचालन बदलेगा, कब गाद निकालेगा और कब ज्यादा मात्रा में पानी छोड़ेगा. इसी वजह से जून 2026 में जब अचानक जल प्रवाह बढ़ा, तब पाकिस्तान ज्यादा कुछ तैयारी नहीं कर पाया और वहां बाढ़ की आशंका पैदा हो गई. पाकिस्तान ने इसे "वॉटर टेररिज्म" तक कहा. 

(इमेज - गूगल अर्थ)

 

पाकिस्तान का पंजाब प्रांत उसके कृषि उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है. लाहौर, फैसलाबाद, मुल्तान और आसपास के इलाके चिनाब और उससे कनेक्टेड नहरों पर काफी हद तक निर्भर हैं. अगर जल प्रवाह घटता है तो सिंचाई प्रभावित होती है. अगर अचानक ज्यादा पानी आता है तो फसलों और नहर व्यवस्था को नुकसान पहुंच सकता है. यानी दोनों परिस्थितियां पाकिस्तान की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती हैं. दूसरी तरफ कराची जैसे शहर पहले से गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं, जहां बड़ी आबादी वॉटर टैंकरों पर निर्भर है. 

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भारत की सबसे बड़ी ताकत क्या है?

अगर नक्शे पर देखें तो पूरी रणनीति आसानी से समझ आ सकती है. सबसे पहले किश्तवाड़ में दुल्हस्ती. फिर रामबन में बगलिहार. इसके बाद रियासी में सलाल डैम. इन तीनों परियोजनाओं के बाद ही चिनाब पाकिस्तान की ओर बढ़ती है. यानी नदी का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह भारत के नियंत्रण क्षेत्र में है. यही भौगोलिक स्थिति भारत को रणनीतिक बढ़त देती है.

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फिलहाल भारत के पास ऐसी स्टोरेज क्षमता नहीं है कि वह चिनाब या सिंधु जैसी विशाल नदियों का पूरा पानी लंबे समय तक रोक सके. विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा परियोजनाओं के जरिए भारत जल प्रवाह की टाइमिंग, डिस्चार्ज और प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है, लेकिन पूरे नदी प्रवाह को स्थायी रूप से रोकना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है. यानी रणनीतिक बढ़त का मतलब पानी को पूरी तरह रोकना नहीं है, बल्कि जल प्रबंधन पर ज्यादा नियंत्रण स्थापित करना है.

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अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान की कोशिश

भारत के फैसले के बाद पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मंचों का दरवाजा भी खटखटाया. स्थायी मध्यस्थता न्यायालय (PCA) और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में उसने भारत की परियोजनाओं पर सवाल उठाए. लेकिन भारत का रुख साफ है. भारत का कहना है कि जब तक संधि निलंबित है और सीमा पार आतंकवाद जारी है, तब तक किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की जाएगी. भारत लगातार यह भी कह रहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च है और आतंकवाद और सामान्य सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते.

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आगे क्या हो सकता है?

भारत अब जम्मू-कश्मीर में अपनी जल परियोजनाओं का तेजी से विस्तार कर रहा है. नई सुरंगें, अतिरिक्त बिजली उत्पादन और बेहतर वॉटर स्टोरेज सिस्टम पर काम चल रहा है ताकि अपने हिस्से के पानी का ज्यादा से ज्यादा देश के भीतर किया जा सके. दूसरी तरफ पाकिस्तान लगातार इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रहा है और उसके कई नेता जल संकट को राष्ट्रीय सुरक्षा का विषय बता चुके हैं. यानी आने वाले वर्षों में भारत-पाकिस्तान के रिश्तों में आतंकवाद के साथ-साथ जल कूटनीति (Water Diplomacy) भी सबसे बड़ा रणनीतिक मोर्चा बनने जा रही है.

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