साल 2015 में सऊदी अरब ने पाकिस्तान से यमन में हूतियों के खिलाफ लड़ाई के लिए लड़ाकू विमान, नौसैनिक जहाज और सैनिक भेजने को कहा था. पाकिस्तान की संसद में इस पर पांच दिन तक बहस चली और आखिरकार 10 अप्रैल को सर्वसम्मति से तय हुआ कि पाकिस्तान जंग में शामिल नहीं होगा. हालांकि, संसद ने यह भी कहा था कि अगर सऊदी अरब की जमीन या मक्का-मदीना के पवित्र स्थलों को खतरा हुआ तो पाकिस्तान उसके साथ खड़ा रहेगा.
अब 11 साल बाद हालात बदल चुके हैं. अगस्त में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट किया. इसके मुताबिक, एक देश पर हमला बाकी दोनों पर हमला माना जाएगा. हूतियों के लगातार हमलों के बीच सोमवार को इस समझौते को सक्रिय कर दिया गया. अब पाकिस्तान और तुर्की सऊदी अरब में अपनी सैन्य ताकत और दूसरी सुरक्षा क्षमताएं तैनात कर सकते हैं. लेकिन असली सवाल यही है- क्या पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ मिलकर हूतियों को पूरी तरह हरा पाएगा?
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कागज पर ताकत, जमीन पर अलग कहानी
तीनों देशों की सैन्य ताकत हूतियों के मुकाबले काफी बड़ी है. सऊदी अरब के पास आधुनिक फाइटर जेट और मिसाइल सिस्टम हैं. पाकिस्तान बड़ी थल और वायुसेना के साथ जंग का अनुभव लेकर आएगा. तुर्की के पास नाटो का अनुभव और मजबूत ड्रोन, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता है.
लेकिन यमन की जंग में यही ताकत सब कुछ नहीं तय करती. उत्तरी यमन के पहाड़, गुफाएं और सुरंगें हूतियों को फायदा देते हैं. उनके पास मोबाइल मिसाइल लॉन्चर और बिखरा हुआ कमांड सिस्टम भी है. किसी बड़ी सेना के लिए इस इलाके में लंबे समय तक लड़ना आसान नहीं है.
सऊदी अरब पहले भी फंस चुका है
सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन 2015 से यमन में हवाई हमले करता रहा है, लेकिन हूतियों को खत्म नहीं कर सका. बाद में अमेरिका और ब्रिटेन ने भी उनके ठिकानों पर हमले किए, फिर भी हूतियों की मिसाइल और ड्रोन क्षमता बनी रही.
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विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान और तुर्की सऊदी अरब की एयर डिफेंस, खुफिया जानकारी और निगरानी मजबूत कर सकते हैं. यमनी सरकारी सेना को जमीन पर आगे बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है. लेकिन सना और उत्तरी यमन के पहाड़ी इलाकों पर कब्जा कर हूतियों को पूरी तरह खत्म करना बहुत मुश्किल होगा. यानी तीनों देश मिलकर हूतियों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन उन्हें जड़ से खत्म करना अब भी बड़ी चुनौती है.
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