वो पूर्वज जो दुनिया में नहीं हैं... उनके लिए किया तर्पण... क्या कहती है हावड़ा के गंगा घाटों पर उमड़ी भीड़?

पश्चिम बंगाल के हावड़ा में महालय पर सुबह से ही गंगा घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण करने पहुंचे. शिवपुर, रामकृष्णपुर, बांधाघाट और बेलूड़ समेत कई घाटों पर धार्मिक अनुष्ठान हुए. महालय के साथ पितृपक्ष का समापन और देवपक्ष की शुरुआत होती है.

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हावड़ा में घाट पर तर्पण करने उमड़ी भीड़. (Photo: Screengrab) हावड़ा में घाट पर तर्पण करने उमड़ी भीड़. (Photo: Screengrab)

बैधनाथ झा

  • हावड़ा,
  • 10 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 8:52 AM IST

सुबह का वक्त है. गंगा के घाटों पर लोगों की आवाजाही बढ़ने लगी है. कोई नदी में डुबकी लगा रहा है, तो कोई हाथ जोड़कर अपने दिवंगत पूर्वजों को याद कर रहा है. कुछ लोग गंगा के पानी में खड़े होकर तर्पण कर रहे हैं. माहौल में पूजा-पाठ है, आस्था है और एक खास तरह का इंतजार भी. इंतजार मां दुर्गा के आगमन का.

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पश्चिम बंगाल के हावड़ा में महालय के मौके पर शनिवार सुबह कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला. शहर के अलग-अलग गंगा घाटों पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे. वजह थी महालय, जिसे बंगाल में पितृपक्ष के समापन और देवपक्ष की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है. इस दिन लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करते हैं, उनके लिए तर्पण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति की कामना करते हैं.

हावड़ा के शिवपुर गंगा घाट, रामकृष्णपुर गंगा घाट, तेलकल घाट, नामक गोला घाट, बांधाघाट और बेलूड़ समेत कई घाटों पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ नजर आई. कई लोग पहले गंगा में स्नान करने पहुंचे. इसके बाद उन्होंने अपने पूर्वजों को जल अर्पित किया और धार्मिक परंपराओं के मुताबिक तर्पण किया.

तर्पण का मतलब सिर्फ एक धार्मिक रस्म निभाना नहीं है. इसके जरिए लोग अपने उन परिजनों को याद करते हैं, जो अब उनके बीच नहीं हैं. परिवार की पुरानी यादें, पूर्वजों के प्रति सम्मान और उनकी शांति की कामना-इन सबके बीच यह परंपरा निभाई जाती है.

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यह भी पढ़ें: पितृ पक्ष, पूर्वज और पिंडदान... देश-दुनिया से बिहार के गया पहुंच रहे लोग, क्या है इस परंपरा की कहानी?

महालय के दिन गंगा के घाटों पर जुटे लोगों के लिए यह अपने पूर्वजों को याद करने का खास मौका था. किसी ने अकेले तर्पण किया, तो कोई परिवार के साथ घाट पर पहुंचा. हर किसी की अपनी प्रार्थना थी, लेकिन भाव एक ही था-पितरों को श्रद्धांजलि देना.

महालय का बंगाल में इतना महत्व क्यों है?

महालय का नाम आते ही बंगाल में दुर्गापूजा की याद आने लगती है. यहां यह दिन सिर्फ कैलेंडर की एक धार्मिक तारीख नहीं, बल्कि त्योहार के मौसम की शुरुआत का संकेत भी है.

पितृपक्ष के समापन और देवपक्ष के आरंभ के साथ ही लोगों का ध्यान मां दुर्गा के आगमन की ओर बढ़ने लगता है. दुर्गापूजा बंगाल के सबसे बड़े सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजनों में से एक है. पंडालों की तैयारी, मूर्तियों को अंतिम रूप देने का काम और पूजा की योजनाओं के बीच महालय लोगों के उत्साह को और बढ़ा देता है.

यही वजह है कि महालय के दिन हावड़ा के घाटों पर दो तरह के भाव एक साथ दिखाई दिए. एक तरफ लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को याद कर रहे थे, दूसरी तरफ मां दुर्गा के स्वागत की खुशी भी माहौल में महसूस की जा सकती थी. महालय के अवसर पर हावड़ा स्थित बेलूड़ मठ में भी तर्पण का आयोजन किया गया. यहां संन्यासी महाराजों को भी तर्पण करते देखा गया.

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बेलूड़ मठ रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन का प्रमुख केंद्र है. महालय के मौके पर यहां हुए आयोजन ने दिन के धार्मिक महत्व को और खास बना दिया. गंगा घाटों पर आम श्रद्धालु अपने पितरों को याद कर रहे थे, वहीं बेलूड़ मठ में भी इस परंपरा का पालन किया गया.

भीड़ को देखते हुए सुरक्षा के इंतजाम

महालय पर गंगा घाटों में बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने के कारण पुलिस और प्रशासन ने भी व्यवस्थाओं पर ध्यान दिया. श्रद्धालुओं को परेशानी न हो और किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके, इसके लिए विभिन्न घाटों पर सुरक्षा के इंतजाम किए गए.

धार्मिक आयोजनों में बड़ी भीड़ के बीच लोगों की आवाजाही और सुरक्षा का ध्यान रखना प्रशासन के लिए अहम होता है. महालय के मौके पर भी इसी बात को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था की गई. हावड़ा के गंगा घाटों पर महालय का दिन इसी तरह आस्था और उत्सव के मेल के साथ गुजरा. लोग अपने पितरों को याद करने पहुंचे थे, लेकिन इस दिन के साथ जुड़ी एक दूसरी भावना भी उनके साथ थी-मां दुर्गा के आगमन की खुशी. बंगाल में महालय इसी तरह बीते हुए अपनों की याद और आने वाले त्योहार के स्वागत को एक साथ जोड़ता है.

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