कन्नौज का इत्र: कैसे GI टैग बना UP की सदियों पुरानी 'खुशबूदार विरासत' का ढाल

2014 में GI टैग हासिल करने वाला कन्नौज परफ्यूम कानूनी रूप से संरक्षित है, जो इसकी भौगोलिक प्रामाणिकता को कायम रखते हुए कन्नौज की पारंपरिक इत्र-कारीगरी को सुरक्षा प्रदान करता है.

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लोकल खुशबू, ग्लोबल पहचान (Photo-ITG) लोकल खुशबू, ग्लोबल पहचान (Photo-ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 16 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 11:04 AM IST

उत्तर प्रदेश का कन्नौज जिला सदियों से पारंपरिक खुशबू बनाने की कला से जुड़ा रहा है. यह जिला इत्र के लिए जाना जाता है, जहां लोकल इंडस्ट्री पारंपरिक डिस्टिलेशन  तकनीकों और खुशबूदार सामग्रियों का इस्तेमाल करती है. उत्तर प्रदेश सरकार के ODOP पोर्टल पर इत्र और परफ्यूम प्रोडक्ट्स को कन्नौज से जुड़े उत्पादों के तौर पर दर्ज किया गया है, और इस जिले को सदियों पुरानी इत्र-परंपरा वाला बताया गया है.

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कन्नौज परफ्यूम को भारत के जिओग्राफिकल इंडिकेशंस (GI) सिस्टम के तहत भी मान्यता मिल चुकी है. आधिकारिक जिओग्राफिकल इंडिकेशंस रजिस्ट्री के मुताबिक, कन्नौज परफ्यूम के लिए आवेदन 9 फरवरी 2009 को उत्तर प्रदेश सरकार के एक्सपोर्ट प्रमोशन ब्यूरो के एक्सपोर्ट कमिश्नर द्वारा दाखिल किया गया था. इसे 31 मार्च 2014 को सर्टिफिकेट नंबर 203 के तहत रजिस्टर किया गया. रिन्यूअल के बाद, यह रजिस्ट्रेशन फिलहाल 8 फरवरी 2029 तक वैध है.

कन्नौज की खुशबू के पीछे की पारंपरिक प्रक्रिया

कन्नौज की पारंपरिक इत्र-कारीगरी "देग-भपका" पद्धति से जुड़ी है, जो हाइड्रो-डिस्टिलेशन का एक तरीका है. इस प्रक्रिया में तांबे के बर्तनों का इस्तेमाल करके खुशबूदार सामग्रियों को डिस्टिल किया जाता है. उत्तर प्रदेश ODOP पोर्टल के मुताबिक, कन्नौज के इत्र/अत्तर को इसी पारंपरिक देग-भपका प्रक्रिया से बनाया जाता है, जिसमें फूल, जड़ी-बूटियां, मसाले और खुशबूदार लकड़ियां इस्तेमाल होती हैं. इस प्रक्रिया के लिए सामग्री, गर्म करने और डिस्टिलेशन की गहरी जानकारी चाहिए होती है, साथ ही खुशबुओं को मिलाने का हुनर भी. यह हुनर जिले के कारीगरों और इत्र-निर्माताओं में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है.

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GI रजिस्ट्रेशन क्यों मायने रखता है

GI रजिस्ट्रेशन, कन्नौज परफ्यूम को एक मान्यता प्राप्त भौगोलिक पहचान देता है और इस रजिस्टर्ड नाम की सुरक्षा के लिए एक कानूनी ढांचा तैयार करता है, भारत के GI सिस्टम में "ऑथोराइज्ड यूजर" यानी अधिकृत उपयोगकर्ता की भी व्यवस्था है. GI रजिस्ट्रेशन और ऑथोराइज्ड यूजर रजिस्ट्रेशन, ये दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं. इसका मतलब है कि सिर्फ GI रजिस्ट्रेशन होने से यह नहीं हो जाता कि हर उत्पादक अपने-आप इस GI नाम का इस्तेमाल करने लगे.

उपभोक्ताओं के लिए, GI नाम भौगोलिक पहचान का एक भरोसेमंद संकेत बन जाता है. वहीं उत्पादकों के लिए, यह रजिस्ट्रेशन उत्पाद और उसकी उत्पत्ति की जगह के बीच के रिश्ते को सुरक्षित रखने का एक जरिया बनता है.

पारंपरिक शिल्प से सुरक्षित पहचान तक का सफर

किसी भी पारंपरिक उद्योग के लिए, यह मान्यता उस बड़ी कोशिश का एक हिस्सा बन सकती है, जिसका मकसद है उत्पादन से जुड़ी पारंपरिक जानकारी को बचाए रखना और साथ ही स्थानीय उत्पादकों को आज के बाजार से जोड़ना. उत्तर प्रदेश का ODOP कार्यक्रम अलग से कन्नौज के इत्र (खुशबू) और परफ्यूम प्रोडक्ट्स को जिला-स्तरीय प्रचार के लिए चिन्हित करता है.

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इस तरह, कन्नौज परफ्यूम का GI रजिस्ट्रेशन एक खास भौगोलिक नाम को एक मान्यता प्राप्त उत्पाद श्रेणी और जिले से जुड़ी पारंपरिक इत्र-निर्माण प्रथाओं से जोड़ता है. 2029 तक रिन्यू हो चुका यह GI रजिस्ट्रेशन, इस भौगोलिक पहचान को कानूनी सुरक्षा देता है, जबकि कन्नौज की इत्र-इंडस्ट्री लगातार काम करती और आगे बढ़ती रहती है.

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