सरकारी जमीन, कोर्ट का फैसला और 6.41 करोड़ की भरपाई... सहारनपुर मस्जिद विवाद की पूरी कहानी

सहारनपुर कलेक्ट्रेट में सुबह 4 बजे बुलडोजर पहुंचा और 6 बजे वहां बनी मस्जिद पर एक्शन शुरू हो गया. यह मामला उस जमीन का है, जिसे प्रशासन सरकारी बताता है, जबकि मस्जिद कमेटी इसे वक्फ की जमीन कहती है. कोर्ट ने मस्जिद को अवैध मानते हुए 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति भी तय की थी. इसके बाद इकरा हसन, ओवैसी और इमरान मसूद ने कार्रवाई पर सवाल उठाए. आखिर पूरा विवाद क्या है?

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करीब डेढ़ साल से चल रहा था विवाद. (Photo: Screengrab) करीब डेढ़ साल से चल रहा था विवाद. (Photo: Screengrab)

राहुल कुमार / शरद मलिक

  • सहारनपुर/शामली,
  • 05 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 2:11 PM IST

यूपी के सहारनपुर में आज सुबह करीब 4 बजे प्रशासन की कार्रवाई शुरू हुई और करीब 6 बजे कलेक्ट्रेट परिसर में बनी मस्जिद को गिराने के लिए बुलडोजर पहुंच गए. देखते ही देखते इलाके में पुलिस का पहरा बढ़ गया. कलेक्ट्रेट के गेट बंद कर दिए गए. चार बुलडोजर लगाए गए और मस्जिद के हिस्से को गिराने के बाद मलबा नगर निगम की गाड़ियों में भरकर हटाया जाने लगा. मौके पर भारी पुलिस फोर्स के साथ आरआरएफ की कंपनियां भी तैनात रहीं.

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ये सिर्फ बुलडोजर एक्शन की कहानी नहीं है. इसके पीछे करीब डेढ़ साल से चल रहा जमीन और निर्माण का कानूनी विवाद है. प्रशासन और अदालत के आदेशों के मुताबिक, जमीन सरकारी है और मस्जिद को अवैध निर्माण माना गया. वहीं मस्जिद कमेटी और विपक्षी नेताओं का दावा है कि यह मस्जिद 100 साल से भी ज्यादा पुरानी है और उसके पास पुराने दस्तावेज मौजूद हैं.

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इस पूरे विवाद में एक और बड़ी रकम सामने आती है- 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति. आखिर ये रकम क्यों तय हुई? अदालत तक मामला कैसे पहुंचा? मस्जिद कमेटी का क्या कहना था? और शनिवार सुबह अचानक ऐसा क्या हुआ कि कलेक्ट्रेट परिसर में बुलडोजर चल गया? पूरी कहानी सिलसिलेवार समझते हैं.

कलेक्ट्रेट परिसर में मस्जिद, यहीं से शुरू हुआ विवाद

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सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में मौजूद इस मस्जिद को लेकर विवाद पिछले करीब डेढ़ साल से चल रहा था. प्रशासन का पक्ष था कि जिस जमीन पर मस्जिद का निर्माण मौजूद है, वह सरकारी भूमि है. इसके आधार पर सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में मामला पहुंचा.

सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने 16 जुलाई को इस मामले में आदेश दिया. अदालत ने विवादित जमीन को सरकारी भूमि माना और मस्जिद के निर्माण को अवैध बताया. इसके साथ ही परिसर खाली करने का आदेश दिया गया.

यहीं से विवाद और ज्यादा बढ़ गया. क्योंकि मस्जिद कमेटी का कहना था कि यह कोई नया निर्माण नहीं है. कमेटी की ओर से दावा किया गया कि मस्जिद करीब 150 साल पुरानी है. यानी कमेटी के मुताबिक, यह जमीन और मस्जिद अचानक हाल के वर्षों में अस्तित्व में नहीं आई थी, बल्कि वहां लंबे समय से धार्मिक गतिविधियां होती रही थीं.

मस्जिद पक्ष ने जमीन को वक्फ संपत्ति बताते हुए अपना दावा अदालत के सामने रखा. बाद में कमेटी की ओर से पुराने दस्तावेज भी पेश किए गए. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि मस्जिद कमेटी ने 1911 तक के रिकॉर्ड अदालत में पेश किए थे और वहां एक सदी से ज्यादा समय से लगातार नमाज पढ़े जाने की बात कही. हालांकि प्रशासन और अदालत के आदेश के मुताबिक, इन दावों के समर्थन में पर्याप्त कानूनी साक्ष्य नहीं माने गए.

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6 करोड़ 41 लाख रुपये की क्षतिपूर्ति

इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है- 6,41,65,565 रुपये. सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने विवादित परिसर को सरकारी भूमि मानते हुए मस्जिद को अवैध निर्माण माना. आदेश में परिसर खाली करने के साथ-साथ 6 करोड़ 41 लाख 65 हजार 565 रुपये की क्षतिपूर्ति भी तय की गई.

यानी मामला सिर्फ जमीन खाली कराने तक सीमित नहीं था. प्रशासन की ओर से यह भी माना गया कि सरकारी भूमि के इस्तेमाल से संबंधित नुकसान या कब्जे के एवज में क्षतिपूर्ति तय की जानी चाहिए.

मस्जिद कमेटी ने इस आदेश को चुनौती दी. उसका तर्क था कि जमीन को वक्फ संपत्ति माना जाना चाहिए और मस्जिद लंबे समय से वहां मौजूद है. इसी के साथ कमेटी ने आगे की कानूनी लड़ाई जारी रखी.

जिला अदालत पहुंचा मामला

सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी ने जिला अदालत में अपील की. यहां मामला जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत पहुंचा. 2 सितंबर को जिला जज की अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर दी और सिटी मजिस्ट्रेट के 16 जुलाई के आदेश को बरकरार रखा. यही आदेश प्रशासन की आगे की कार्रवाई का आधार बना.

प्रशासन का कहना था कि निचली अदालत के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी की फर्स्ट अपील भी खारिज हो चुकी है. इसके बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा रही है. सहारनपुर मंडल के डीआईजी अभिषेक सिंह ने भी यही बात कही. उनके मुताबिक, कलेक्ट्रेट में स्थित मस्जिद को सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने अवैध पाया था और उसके खिलाफ मस्जिद कमेटी की फर्स्ट अपील खारिज हो गई. इसी के बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जा रही है.

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शुक्रवार रात से बढ़ी हलचल

2 सितंबर के अदालती आदेश के बाद मस्जिद को लेकर तनाव और राजनीतिक हलचल बढ़ गई थी. जैसे-जैसे रात बढ़ी, कलेक्ट्रेट के आसपास पुलिस बल की तैनाती भी बढ़ती गई. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने देर रात लाइव आकर मस्जिद मामले पर अपनी बात रखी. उनके दामाद शायान मसूद ने भी घटनाक्रम से जुड़ी जानकारी शेयर की. सपा विधायक आशु मलिक, एमएलसी शाहनवाज खान समेत कई नेता कलेक्ट्रेट पहुंचे. हालांकि पुलिस ने नेताओं को कलेक्ट्रेट के गेट के बाहर ही रोक दिया. नेताओं की जिलाधिकारी अरविंद चौहान से मुलाकात भी हुई. 

सुबह 4 बजे शुरू हुआ एक्शन

शनिवार तड़के करीब 4 बजे प्रशासन ने मस्जिद को हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी. कलेक्ट्रेट परिसर में बाहरी लोगों की आवाजाही रोक दी गई. सभी प्रमुख गेट बंद कर दिए गए. पुलिस की भारी तैनाती के बीच बुलडोजर मस्जिद तक पहुंचे. करीब 6 बजे ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई. चार बुलडोजर कार्रवाई में लगाए गए.

बुलडोजर ने मस्जिद की दीवारों और निर्माण के दूसरे हिस्सों को गिराना शुरू किया. सुबह तक मस्जिद का एक हिस्सा गिराया जा चुका था. इसके बाद मलबा हटाने का काम भी शुरू कर दिया गया. मौके पर भारी पुलिस फोर्स के अलावा आरआरएफ की कंपनियां तैनात रहीं.

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वहीं इस मामले को लेकर डीआईजी अभिषेक सिंह के मुताबिक, त्योहारों का समय चल रहा है, इसलिए सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर बड़ी संख्या में पुलिस बल लगाया गया है. साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी.

इकरा हसन को क्यों किया गया हाउस अरेस्ट?

मस्जिद पर कार्रवाई से पहले राजनीतिक गतिविधियां भी तेज थीं. कैराना से सपा सांसद इकरा हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकने के लिए रात में ही उनके कैराना स्थित आवास पर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया और उन्हें हाउस अरेस्ट कर दिया गया. इकरा हसन के मुताबिक, वह सहारनपुर जाकर अधिकारियों से मिलना चाहती थीं और स्थानीय लोगों की बात उनके सामने रखना चाहती थीं. लेकिन उन्हें घर से बाहर निकलने नहीं दिया गया.

उन्होंने सवाल उठाया कि क्या एक निर्वाचित सांसद को अपने क्षेत्र की जनता से जुड़े मुद्दे पर अधिकारियों से मिलने से रोका जा सकता है. वहीं सपा सांसद अवधेश प्रसाद ने भी इकरा हसन और अन्य नेताओं को नजरबंद किए जाने की आलोचना की. उनका आरोप था कि जनप्रतिनिधियों को घटनास्थल पर जाने से रोकना लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने जैसा है.

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने क्या कहा?

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कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने कार्रवाई को लेकर सरकार और प्रशासन पर तीखा हमला बोला. उनका दावा है कि मस्जिद 1911 से भी पहले की है और मस्जिद पक्ष ने अपने पुराने रिकॉर्ड अदालत में पेश किए थे. उन्होंने आरोप लगाया कि वक्फ से जुड़े दावों और 'वक्फ बाय यूजर' के पहलू को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया. इमरान मसूद ने कार्रवाई को संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ते हुए इसे सहारनपुर के लिए 'काला दिन' कहा. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी कानून को अपने हाथ में नहीं लेगी और कानूनी रास्ते से लड़ाई जारी रखेगी.

ओवैसी ने उठाए जमीन और वक्फ के सवाल

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी मस्जिद गिराए जाने पर सवाल उठाए. ओवैसी का दावा है कि मस्जिद कमेटी ने 1911 के दस्तावेज अदालत में पेश किए थे. उन्होंने कहा कि वहां एक सदी से ज्यादा समय से लगातार नमाज पढ़ी जा रही थी. इसी आधार पर उन्होंने 'वक्फ बाय यूजर' का सवाल उठाया.

यह भी पढ़ें: कौशांबी पटाखा ब्लास्ट: आरोपी के आलीशान मकान पर चला बुलडोजर, 3 फरार आरोपियों पर 25-25 हजार का इनाम

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अगर कोई धार्मिक स्थल लंबे समय से खुले और लगातार कब्जे या इस्तेमाल में रहा है, तो सरकार अचानक इतने लंबे समय बाद उस जमीन पर अपना दावा कैसे कर सकती है. उन्होंने Limitation Act और adverse possession के सिद्धांत का भी हवाला दिया.

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ओवैसी ने यह सवाल भी उठाया कि अगर मस्जिद कलेक्ट्रेट से पहले की है, तो जमीन के इतिहास को किस तरह देखा जाना चाहिए. हालांकि ये ओवैसी और मस्जिद पक्ष की कानूनी दलीलें हैं. प्रशासन की स्थिति इसके उलट है. प्रशासन का कहना है कि जमीन सरकारी है, मस्जिद अवैध निर्माण है और अदालत से प्रशासन के पक्ष में आदेश आने के बाद ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई.

विवाद का असली केंद्र क्या है?

सहारनपुर मस्जिद विवाद को समझने के लिए तीन बातें सबसे अहम हैं. पहली- जमीन किसकी है? प्रशासन और सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने इसे सरकारी भूमि माना है. मस्जिद कमेटी इसे वक्फ संपत्ति बताती रही है. दूसरी- मस्जिद कितनी पुरानी है और पुराने दस्तावेज क्या साबित करते हैं? मस्जिद पक्ष का दावा है कि इसके पास 1911 के रिकॉर्ड हैं और मस्जिद इससे भी पुरानी है. प्रशासन की तरफ से अदालत में इन दावों को पर्याप्त साक्ष्य नहीं माना गया.

तीसरी- क्या अदालत का आदेश अंतिम कानूनी स्थिति है? 2 सितंबर को जिला जज की अदालत ने मस्जिद कमेटी की फर्स्ट अपील खारिज करते हुए सिटी मजिस्ट्रेट का आदेश बरकरार रखा. इसी के बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की. दूसरी तरफ मस्जिद पक्ष और विपक्षी नेता आगे भी अदालत का रुख करने की बात कह रहे हैं.

फिलहाल कलेक्ट्रेट परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है. प्रशासन की कार्रवाई जारी है और मलबा हटाया जा रहा है. पुलिस सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने वालें पर नजर रख रही है. दूसरी तरफ मस्जिद पक्ष और विपक्षी नेता इस कार्रवाई को लेकर कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाने की बात कह रहे हैं.

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