दुनिया में ऐसी भी एक जनजाति है, जो आधुनिक दुनिया से लगभग पूरी तरह दूर रहकर जंगल में अपनी जिंदगी बिताती है. इनके पास न मोबाइल है, न इंटरनेट और न ही शहरों जैसी कोई सुविधा. ये लोग दक्षिण-पूर्वी पेरू के घने अमेजन जंगलों में रहते हैं और बाहरी लोगों से दूरी बनाए रखते हैं. इन्हें माश्को पिरो कहा जाता है.
इन्हें दुनिया की सबसे बड़ी अनकनेक्टेड यानी बाहरी दुनिया से संपर्क न रखने वाली जनजाति माना जाता है. इनके करीब 750 से ज्यादा होने का अनुमान है. लेकिन इनसे नियमित संपर्क नहीं होने की वजह से इनकी सटीक जनगणना करना बेहद मुश्किल है.
सबसे दिलचस्प बात यह है कि जंगल में ये लोग एक-दूसरे और आसपास के लोगों को संकेत देने के लिए सीटी और पक्षियों जैसी आवाजों का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि उनकी पूरी भाषा सिर्फ सीटी है. कई बार वे पक्षियों की आवाज की नकल करते हुए सीटी बजाते हैं, जो आसपास के लोगों के लिए दूर रहने का संकेत भी हो सकता है.
इंसानों से क्यों छिपते हैं?
माश्को पिरो का इंसानों से दूर रहने का फैसला कोई रहस्यमयी कहानी नहीं, बल्कि उनके इतिहास से जुड़ा है. सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक, 19वीं सदी के आखिर में अमेजन क्षेत्र में रबर का कारोबार तेजी से बढ़ा. रबर के लिए बाहरी लोग जंगलों में पहुंचे.
रबड़ व्यापारियों ने उनकी ही जमीन पर इन आदिवासियों को गुलाम बना लिया गया. उनकी हत्या की गई. उन्हें कोड़े मारे, जंजीरों में बांधा, उनका पीछा किया, उनके साथ बलात्कार किया और उनके जंगल, उनके घर को लूट लिया. बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों को हिंसा और जबरन मजदूरी का सामना करना पड़ा.
माश्को पिरो के पूर्वज भी इस दौर की हिंसा और गुलामी से बचकर जंगल के और अंदर चले गए. माशको पिरो लोग जंगल में विलीन हो गए. आज भी सबसे अलग, छिपे हुए, संपर्क से बाहर रहते हैं. आज, उनके वंशज, जो अभी भी एकांत में रह रहे हैं, अपनी भूमि पर एक बार फिर अतिक्रमण होते देख रहे हैं.
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इसके बाद उन्होंने बाहरी दुनिया से दूरी बनाए रखी. वे जंगल के अंदर नदियों के ऊपरी इलाकों में रहने लगे और शिकार, मछली पकड़ने तथा जंगल से मिलने वाली चीजों पर निर्भर रहे. यानी आज उनका इंसानों से दूर रहना किसी फैशन या अजीब आदत का हिस्सा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सुरक्षा की रणनीति है.
सीटी बजाकर देते हैं संकेत
माश्को पिरो जब जंगल से बाहर नदी किनारे दिखाई देते हैं तो उनके व्यवहार को करीब से देखने वाले लोगों ने कुछ खास संकेतों के बारे में बताया है. इस जनजाति के पड़ोसी यिने समुदाय के लोग बताते हैं कि माश्को पिरो कई बार पक्षियों जैसी पतली और तेज आवाज में सीटी बजाते हैं. इसे आसपास मौजूद लोगों को चेतावनी देने या अपनी मौजूदगी का संकेत देने से जोड़ा जाता है.
यिने और माश्को पिरो के बीच भाषाई और पुश्तैनी संबंध भी हैं. कभी-कभी नदी के दूसरी तरफ से दोनों समूह एक-दूसरे से बात करने की कोशिश करते हैं. लेकिन आम तौर पर यिने लोग भी उनसे सीधे संपर्क से बचते हैं, क्योंकि संपर्क दोनों पक्षों के लिए जोखिम भरा हो सकता है.
कभी केले मांगते हैं, कभी औजार
हाल के वर्षों में माश्को पिरो के नदी किनारे बसे यिने समुदायों के पास दिखाई देने की घटनाएं बढ़ी हैं. कभी वे वहां के खेतों से केला, कसावा या दूसरी खाने की चीजें ले जाते हैं. कुछ मौकों पर उन्होंने माचेते यानी बड़ा धारदार औजार या खाना पकाने के बर्तन जैसी चीजों की मांग भी की है.
यिने समुदाय के कुछ लोग उनकी मदद भी करते हैं. वे गांव के किनारे अलग से एक छोटा खेत यानी 'चाक्रा' तैयार करते हैं, जहां केला, कसावा और दूसरी चीजें उगाई जाती हैं. माश्को पिरो वहां से जरूरत का सामान लेकर वापस जंगल में चले जाते हैं.
जंगल में लकड़ी काटने वाले पहुंचे तो बढ़ा खतरा
माश्को पिरो के लिए सबसे बड़ी परेशानी अब उनके जंगल में बाहरी लोगों की बढ़ती मौजूदगी है. दक्षिण-पूर्वी पेरू में उनके इलाके के कुछ हिस्सों में लकड़ी काटने का काम हो रहा है. वहां लॉगिंग के लिए सड़कें भी बनाई गई हैं.
सर्वाइवल इंटरनेशनल के मुताबिक, माश्को पिरो के इलाके में करीब 200 किलोमीटर तक लॉगिंग रोड बनाए जाने की जानकारी सामने आई है. इन सड़कों से पहले से दूर जंगल तक पहुंचना आसान हो जाता है.
यही वजह है कि जंगल में माश्को पिरो की मौजूदगी पहले की तुलना में ज्यादा दिखाई देने लगी है. 2024 में 50 से ज्यादा लोगों का एक समूह यिने लोगों के गांव के पास नदी किनारे दिखाई दिया था.
आम बीमारी भी बन सकती है जानलेवा
माश्को पिरो के लिए बाहरी लोगों से संपर्क का खतरा सिर्फ हिंसा तक सीमित नहीं है. लंबे समय से अलग-थलग रहने की वजह से उनमें आम बीमारियों के खिलाफ वही प्रतिरोधक क्षमता नहीं हो सकती, जो बाहरी आबादी में होती है.
इसलिए फ्लू जैसी सामान्य बीमारी भी उनके लिए गंभीर खतरा बन सकती है. पेरू में दूसरे अलग-थलग समूहों के साथ बाहरी संपर्क के बाद बीमारी फैलने और बड़ी संख्या में मौतों के मामले दर्ज किए गए हैं.यही वजह है कि विशेषज्ञ और स्थानीय संगठन कहते रहे हैं कि इन लोगों से जबरन संपर्क नहीं किया जाना चाहिए.
बाण लेकर जंगल में क्यों घूमते हैं?
माश्को पिरो शिकारी-संग्राहक जीवन जीते हैं और जंगल से ही अपनी जरूरत की कई चीजें जुटाते हैं. वे धनुष-बाण का इस्तेमाल करते हैं. कई बार वे जमीन पर भाले या डंडों को क्रॉस की शक्ल में रखकर बाहरी लोगों को दूर रहने का संकेत भी देते हैं.
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हालांकि, उनके और आसपास रहने वाले लोगों के बीच हर मुलाकात हिंसक नहीं होती. समस्या खास तौर पर तब बढ़ती है जब उनके इलाके में लकड़ी काटने या दूसरी गतिविधियों के लिए बाहरी लोग लगातार प्रवेश करते हैं.
2024 में लॉगरों और माश्को पिरो के बीच कई हिंसक घटनाएं भी हुईं. अगस्त 2024 की एक घटना में कम से कम दो लॉगर मारे गए, एक घायल हुआ और दो अन्य के लापता होने की सूचना मिली थी.
जंगल ही इनका घर है, लेकिन वही घर सिकुड़ रहा है
माश्को पिरो की कहानी सिर्फ एक ऐसी जनजाति की कहानी नहीं है, जो दुनिया से दूर रहती है. यह उस जंगल की कहानी भी है, जिसे वे अपना घर मानते हैं.
2002 में पेरू सरकार ने माश्को पिरो समेत कुछ अलग-थलग जनजातियों के लिए एक इलाका रिजर्व किया था. लेकिन यह क्षेत्र माश्को पिरो के पूरे पारंपरिक इलाके जितना बड़ा नहीं है. उनके इलाके के दूसरे हिस्सों में लॉगिंग की अनुमति दी गई है.
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आज माश्को पिरो की संख्या 750 से ज्यादा होने का अनुमान जरूर है, लेकिन उनकी जिंदगी और आवाज को समझना आसान नहीं है. वे खुद दुनिया से दूरी बनाए रखना चाहते हैं. ऐसे में उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि दुनिया उनसे संपर्क कब करेगी, बल्कि यह है कि क्या दुनिया उनके जंगल को उनके लिए सुरक्षित छोड़ पाएगी.
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