पेड़ों पर मधुमक्खियों के छत्ते, हाथ में धारदार औजार और नीचे घात लगाए बैठा रॉयल बंगाल टाइगर... सुंदरवन के जंगलों में शहद इकट्ठा करने जाने वाले लोगों की जिंदगी किसी रोमांचक फिल्म से कम नहीं है. यहां शहद की हर बूंद के पीछे मेहनत ही नहीं, जान का जोखिम भी छिपा है. यही वजह है कि जंगल में जाने से पहले इन लोगों के घरों में विदाई का माहौल होता है. कुछ परिवारों में तो ऐसी रस्में निभाई जाती हैं, जो किसी के गुजर जाने के बाद होने वाले शोक जैसी लगती हैं.
पश्चिम बंगाल के सुंदरवन में शहद इकट्ठा करने वाले इन लोगों को मौली या मौआल कहा जाता है. यह इनके लिए सिर्फ काम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही रोजी-रोटी का जरिया है. लेकिन सवाल है कि आखिर ये लोग जंगल में शहद निकालते कैसे हैं? बाघों के बीच उनकी जिंदगी कैसी होती है और जिस शहद के लिए वे अपनी जान जोखिम में डालते हैं, वह इतना खास क्यों है?
जंगल में जाने से पहले करते हैं बोनबिबी की पूजा
सुंदरवन के जंगल में कदम रखने से पहले मौली बोनबिबी की पूजा करते हैं. लोकविश्वास में बोनबिबी को जंगल की रक्षक माना जाता है. हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग इस परंपरा को मानते हैं. जंगल में बाघों से सुरक्षा के लिए बोनबिबी से प्रार्थना की जाती है. इसके अलावा दक्षिण राय को बाघों से जुड़े शक्तिशाली देवता के रूप में माना जाता है. यह पूजा इनके लिए सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि जंगल के खतरों के बीच हिम्मत और सुरक्षा की उम्मीद भी है.
शहद लेने जाते हैं तो घर में निभाई जाती हैं शोक जैसी रस्में
मौली परिवारों की जिंदगी का सबसे भावुक पहलू उनकी विदाई से जुड़ा है. 2017 में पब्लिश एक स्टडी में सुंदरवन के कुछ मौली परिवारों में ऐसी विदाई-परंपराओं का उल्लेख मिलता है, जिन्हें शोक-काल जैसी रस्मों से जोड़ा गया है.
मसलन, वे माथे पर सिंदूर नहीं लगाती थीं, मेहमानों का स्वागत नहीं करती थीं, श्मशान नहीं जाती थीं और घर का दरवाजा खुला रखती थीं. यह रस्म इस डर से जुड़ी थी कि जंगल में गया व्यक्ति शायद वापस न लौटे. यह परंपरा सभी मौली परिवारों में आज भी प्रचलित है—ऐसा दावा उपलब्ध जानकारी से नहीं किया जा सकता. लेकिन इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस काम में जान का जोखिम कितना गहरा है.
पेड़ों पर छत्ता, नीचे छिपा होता है बाघ
हर साल अप्रैल-मई के आसपास मौली समूह बनाकर नाव से सुंदरवन के जंगलों में जाते हैं. शहद और मधुमोम यहां के माइनर फॉरेस्ट प्रोड्यूस में शामिल हैं. इसके संग्रह के लिए वन विभाग से परमिट लेना होता है.
जंगल के अंदर पहुंचकर ये लोग पेड़ों पर मधुमक्खियों के छत्ते तलाशते हैं. स्थानीय अनुभव रखने वाले मौली मधुमक्खियों की गतिविधि और उड़ान की दिशा से छत्ते का अनुमान लगाते हैं. यहां खास तौर पर विशालकाय मधुमक्खी यानी Apis dorsata के छत्तों से शहद इकट्ठा किया जाता है.
छत्ता मिलने पर पेड़ों की हरी पत्तियों से धुआं किया जाता है, ताकि मधुमक्खियां कुछ दूर रहें. मौली आम तौर पर छत्ते के शहद से भरे हिस्से को काटने की कोशिश करते हैं और अंडों या लार्वा वाले हिस्से को बचाकर रखते हैं, ताकि मधुमक्खियों की कॉलोनी दोबारा विकसित हो सके.
लेकिन इस पूरे काम में सबसे बड़ा खतरा जमीन पर छिपे बाघ का होता है. जब मौली पेड़ों पर छत्ते तलाश रहे होते हैं, तब उनका ध्यान ऊपर होता है. इसी दौरान नीचे मौजूद रॉयल बंगाल टाइगर हमला कर सकता है.
WWF India के अनुसार, सुंदरवन क्षेत्र में मानव-बाघ संघर्ष के कारण हर साल लगभग छह शहद संग्रहकर्ताओं की मौत होती है. यह एक अनुमानित आंकड़ा है, आधिकारिक संयुक्त सरकारी मृत्यु-रजिस्टर नहीं.यहां मगरमच्छों का खतरा भी बना रहता है.
10-15 दिन जंगल में रहते हैं, नाव ही बनती है घर
मौली एक-दो घंटे के लिए जंगल नहीं जाते. सुंदरिनी की रिपोर्ट के मुताबिक, वे नाव में चावल, सब्जियां और जरूरत का सामान लेकर करीब 10 से 15 दिनों के अभियान पर निकलते हैं. पूरी टीम साथ रहती है और एक अनुभवी व्यक्ति उसका नेतृत्व करता है.
एक टीम को सामान्य वर्षों में करीब 700-800 किलो शहद मिल जाता था. लेकिन बाघ के हमले में साथी की मौत के बाद एक साल वे डर के कारण सिर्फ करीब 400 किलो शहद ही ला पाए. यह एक खास टीम का अनुभव है, पूरे सुंदरवन का औसत नहीं.
सुंदरवन का शहद क्यों है खास?
सुंदरवन का शहद किसी एक फूल से नहीं, बल्कि कई तरह के मैंग्रोव पेड़ों के फूलों से मिलता है. मधुमक्खियां सुंदरी, गरान, गेवां, खलिसा और केओरा जैसे पेड़ों से रस इकट्ठा करती हैं. इसलिए इसे मल्टीफ्लोरल मैंग्रोव हनी कहा जाता है.
इस शहद को जनवरी 2024 में GI रजिस्ट्रेशन भी मिला. यानी इसकी पहचान सुंदरवन से जुड़े खास उत्पाद के रूप में दर्ज है. पश्चिम बंगाल वन विकास निगम इसे MOUBAN ब्रांड के नाम से बेचता है.
सरकारी व्यवस्था के तहत मौली परमिट लेकर शहद इकट्ठा करते हैं और तय जगहों पर जमा करते हैं. इसके बाद इसे पश्चिम बंगाल वन विकास निगम को सौंपा जाता है.
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सुंदरवन का यह शहद इसलिए भी खास है कि इसकी हर बूंद के पीछे जंगल का अनुभव, पीढ़ियों पुरानी परंपरा और जोखिम भरी मेहनत छिपी है. यहां शहद लेने जाने वाले लोग सिर्फ मधुमक्खियों से नहीं जूझते, बल्कि उस जंगल में अपनी जिंदगी दांव पर लगाते हैं, जहां बाघ और मगरमच्छ भी उनके आसपास मौजूद होते हैं.
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