नवरात्रि और दशहरा के मौके पर कई जगहों पर मेला लगा हुआ है. इन मेलों में कई तरह के छोटे- बड़े झूले लगे होते हैं. इन पर बच्चों से लेकर बड़े तक घूम मस्ती करते हैं. ऐसे में कई बार झूला झूलते समय मन में ये सवाल उठता है कि आखिर मेला के बाद ये झूले वाले कहां चले जाते हैं? क्या इनका काम सिर्फ झूला लगाना ही है या फिर मेले के बाद बाकी दिन ये कुछ और भी काम करते हैं? चलिए समझते हैं मेला में हमें झूला झुलाने वाले लोगों की कमाई का पूरा सिस्टम क्या है और कैसे पूरे साल इनका घर चलता है?
इन दिनों नोएडा स्टेडियम में रामलीला के मौके पर मेला लगा हुआ है. वहां हर दिन शाम में रामलीला का मंचन होता है. इस वजह से वहां काफी लोग पहुंचते हैं. ऐसे में लोगों के मनोरंजन के लिए कई छोटे- बड़े झूले लगाए गए हैं. ऐसे ही कुछ झूले वालों से मैंने बातचीत करके उनके काम-काज के बारे में जानने की कोशिश की.
मैं दोपहर के वक्त मेला स्टेडियम पहुंचा था. जब सभी दुकान और स्टॉल वाले सुस्ताते रहते हैं. वहां घुसते के साथ ही एक विशाल झूला दिखाई दिया. मैं झट उस झूले के पास पहुंच गया. वहां नीचे मुझे एक बुजुर्ग कुर्सी पर बैठे आराम करते मिले. मैंने पूछा इस झूले का मालिक कौन है, मुझे कुछ बात करनी है. इस पर उस बुजुर्ग ने अपनी तरफ इशारा करते हुए बताया कि मैं ही हूं. बताइये क्या काम है.
बातचीत शुरू हुई. उन्होंने अपना नाम अब्दुल खान बताया. मैंने झट से अपना अपना सवाल पूछ लिया कि ये मेला खत्म होने के बाद आपलोग कहां जाएंगे. क्या आप सिर्फ झूला लगाने का ही काम करते हैं. या फिर यह सीजनल काम है? इस पर उन्होंने कहा कि यह सीजनल काम नहीं है. पूरे साल हम यही काम करते हैं. हमलोग अजमेर के रहने वाले हैं. इस मेला में मेरे गांव के 5-6 लोगों का झूला लगा हुआ है. इसमें करीब 25-30 लोग काम करते हैं. पूरे साल ठेकेदार हमें काम दिलवाता है.
अब्दुल खान के बगल में ही एक लड़का मुर्शिद अली खड़ा था. उसने बताया कि हमलोगों के ग्रुप में 10- 12 अलग- अलग झूले हैं. हमलोग एक साथ 150 लोग साथ चलते हैं. यहां 4-5 झूले लगे हैं और कुछ दिल्ली में दूसरी जगह मेले में लगे हुए हैं. वहां भी हमारे ग्रुप के लोग हैं. मुर्शिद ने बताया कि पूरे साल झांसी, जयपुर, दिल्ली, नोएडा, भोपाल जैसे अलग- अलग शहरों में ठेकेदार हमें काम दिलवाते हैं. ठेकेदार और झूले लगाने वालों के बीच 50-50 की डील होती है. यानी हमें कमाई का आधा देना होता है.
क्या झूले से कमाई का सिस्टम
अब्दुल और मुर्शिद दोनों ने बताया कि अलग- अलग झूलों की फीस 50 से 200 रुपये राउंड तक होती है. बड़े वाले झूले से एक दिन में 8000 से 10 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है. अब्दुल के पास से आगे बढ़ने पर सामने कुछ छोटे झूले वाले भी दिखाई दिए, जो हाथ से झूला घूमाते हैं. इनमें से एक ने अपना नाम अनिल बताया. वह संभल का रहने वाला था. उसने बताया कि मैं 50 रुपये में झूले पर 5 राउंड घुमाता हूं. हर दिन 4 हजार से 5 हजार रुपये की कमाई हो जाती है. इसमें से ठेकेदार को कमीशन देना पड़ता है और फिर बिजली वाले भी काफी पैसा ले लेते हैं.
इसी तरह एक मोर झूला लगाने वाला मो. अली आगे मिल गया. उसने रोककर बोला कि हमसे भी सर बात कर लो. उसने भी वही बात कही. मुझे हमेशा ठेकेदार से काम मिलता है. यह झूला भी किराए का है. मैं 50 रुपये में 6 राउंड घूमाता हूं. मैं ठेकेदार को कमीशन देकर, बिजली वाले को देकर और मालिक को झूले का किराया देकर मुझे 20 दिनों में 25 से 30 हजार रुपये ही बच पाएंगे.
पूरे साल अलग- अलग जगह लगाते हैं झूला
इन झूले वालों से बात करने के बाद यही पता चला कि मेले में झूला लगाना, इनका पूर्णकालिक काम है. एक को- ऑर्डिनेटर होता है, जिसे ये ठेकेदार कहते हैं. वह अलग- अलग जगहों पर होने वाले ऐसे इवेंट ऑर्गनाइजर्स या मेला समितियों के संपर्क में होता है. जिस भी शहर में इन ठेकेदारों को मेला लगवाने का काम मिलता है. ये झूले वालों को बुला लेते हैं. इनका अलग- अलग झूले वालों के साथ अलग- अलग परसेंटेज पर डील फिक्स होता है.
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इस तरह एक मेला खत्म होने पर झूला तबतक वहीं लगा रहता है. जबतक उन्हें कहीं दूसरी जगह काम न मिल जाए. इन झूला लगाने वालों का काम पूरी तरह से को-ओर्डिनेशन से चलता है. ठेकेदार इन्हें काम दिलाता है. बदले में ठेकेदार को कमीशन मिलता है या फिर पार्टनरशिप. कुछ ऐसे भी झूला मालिक हैं, जो किराए पर झूला देते हैं या फिर सिर्फ अपने स्टाफ को झूले के साथ मेला में भेज देते हैं.
सिद्धार्थ भदौरिया