Google में 2.85 करोड़ रुपये सालाना की नौकरी छोड़ी, अब कर रहे काम

गूगल में 13 साल तक काम करने वाले ब्रूनो बियानचिनी ने सालाना करीब 2.85 करोड़ रुपये की नौकरी छोड़ दी. अब वह कंबोडिया के जंगलों को फिर से हरा-भरा बनाने और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं.

Advertisement
 गूगल में काम करते हुए उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ऑनलाइन मास्टर प्रोग्राम के जरिए पर्यावरण से जुड़ी पढ़ाई की. ( Photo: ITG) गूगल में काम करते हुए उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ऑनलाइन मास्टर प्रोग्राम के जरिए पर्यावरण से जुड़ी पढ़ाई की. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 17 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:13 AM IST

सोचिए, किसी बड़ी कंपनी में 13 साल तक काम करने के बाद हर साल करोड़ों रुपये की सैलरी मिल रही हो. जिंदगी आराम से चल रही हो और करियर भी अच्छा हो. ऐसे में अगर कोई अपनी नौकरी छोड़कर पर्यावरण को बचाने के काम में जुट जाए, तो यह फैसला लोगों का ध्यान खींचेगा ही. सोशल मीडिया पर एक ऐसे ही एग्जीक्यूटिव की कहानी सामने आई है, जिन्होंने गूगल में 13 साल काम करने के बाद सालाना 2.85 करोड़ रुपये की नौकरी छोड़ दी. अब उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को अपने काम का हिस्सा बनाने का फैसला किया है. उनकी कहानी इस सवाल पर सोचने को मजबूर करती है कि क्या अच्छी सैलरी और बड़ी कंपनी में नौकरी ही कामयाबी का पैमाना है

Advertisement

13 साल गूगल में काम करने के बाद क्यों छोड़ी नौकरी?
इस एग्जीक्यूटिव का नाम ब्रूनो बियानचिनी है. वह गूगल में मिडिल ईस्ट, अफ्रीका और तुर्की के लिए ग्लोबल पार्टनरशिप के प्रमुख थे. उनका काम अलग-अलग क्षेत्रों में कंपनी के बड़े ग्राहकों और साझेदारों के साथ काम करना था. इस पद पर उन्हें कई देशों की यात्रा भी करनी पड़ती थी. ब्रूनो ने जुलाई 2012 में गूगल में काम शुरू किया था. शुरुआत में वह अस्थायी कर्मचारी के तौर पर जुड़े थे, लेकिन करीब एक साल बाद उन्हें स्थायी नौकरी मिल गई. समय के साथ उनकी जिम्मेदारियां बढ़ती गईं और वह कंपनी में बड़े पद तक पहुंचे.

पर्यावरण को लेकर कैसे बदली सोच?
ब्रूनो की पर्यावरण में दिलचस्पी धीरे-धीरे बढ़ी. इटली के मिलान शहर में रहते हुए उनकी मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई, जो शाकाहारी लाइफस्टाइल अपनाता था. उस व्यक्ति ने उन्हें बताया कि मांस और डेयरी बिजनेस का पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है. इसके बाद ब्रूनो ने इस विषय पर पढ़ना और जानकारी जुटाना शुरू किया. उन्हें महसूस हुआ कि वह केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं को समझना नहीं चाहते, बल्कि उनके समाधान के लिए भी काम करना चाहते हैं.

Advertisement

उन्होंने इस रुचि को अपने करियर से जोड़ने का फैसला किया. गूगल में काम करते हुए उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के ऑनलाइन मास्टर प्रोग्राम के जरिए पर्यावरण से जुड़ी पढ़ाई की. उनकी पढ़ाई का विषय यह समझना था कि कंबोडिया के बाढ़ प्रभावित जंगलों को दोबारा विकसित करने का काम आर्थिक रूप से संभव है या नहीं.

कंबोडिया के जंगलों को बचाने की योजना
ब्रूनो ने अपनी नौकरी से कुछ समय की छुट्टी ली और कंबोडिया जाकर जंगलों को फिर से विकसित करने से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम किया. वहां करीब चार महीने बिताने के बाद उन्होंने गूगल की नौकरी छोड़ने का फैसला कर लिया. जिस परियोजना से वह जुड़े हैं, उसका लक्ष्य कंबोडिया में एक लाख हेक्टेयर बाढ़ प्रभावित जंगलों को फिर से विकसित करना है. इस काम में जंगलों को बचाने के साथ-साथ उन्हें दोबारा हरा-भरा बनाने के लिए आर्थिक मदद जुटाने पर भी जोर है. ब्रूनो अब स्वतंत्र सलाहकार के रूप में इस परियोजना पर काम कर रहे हैं. वह इससे जुड़े शोध पत्र की तैयारी कर रहे हैं और परियोजना के शुरुआती चरण के लिए आर्थिक मदद जुटाने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही, वह नीदरलैंड में रहकर पर्यावरण से जुड़े कामों के लिए वित्तीय सहायता के रास्ते तलाश रहे हैं.

Advertisement

ब्रूनो के लिए यह फैसला आसान नहीं था. रिपोर्ट के मुताबिक, उनकी सालाना कुल कमाई 3 लाख डॉलर से ज्यादा थी, जो भारतीय रुपये में करीब 2.85 करोड़ रुपये बैठती है. इसमें केवल वेतन ही नहीं, बल्कि नौकरी से मिलने वाले दूसरे लाभ भी शामिल हो सकते हैं. इतनी अच्छी कमाई वाली नौकरी छोड़ने का मतलब था कि उन्हें एक सुरक्षित करियर के बजाय अनिश्चित भविष्य चुनना था. हालांकि, ब्रूनो ने बताया कि गूगल ने उनके फैसले का समर्थन किया. कंपनी ने उनसे कहा कि वह अपने सपनों को पूरा करने की कोशिश करें और अगर चीजें काम नहीं करतीं, तो उनके लौटने का रास्ता भी खुला है. ब्रूनो का कहना है कि अब उनके पास काम करने का एक बड़ा उद्देश्य है. उन्हें अपनी क्षमताओं पर भरोसा है और वह आर्थिक रूप से भी खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »