बेंगलुरु ट्रैफिक से परेशान CEO, 17 किमी का सफर तय करने में लगे 2 घंटे

बेंगलुरु में ट्रैफिक का हाल अब लोगों को ऑफिस पहुंचने से पहले ही थका दे रहा है. एक उद्यमी ने सुबह 10:15 बजे अपने लगभग खाली ऑफिस की तस्वीर शेयर करते हुए बताया कि समस्या कर्मचारियों की नहीं, बल्कि ऑफिस पहुंचने में लगने वाली मेहनत है

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बाला पनीरसेल्वम ने लिखा कि समस्या कर्मचारियों की नहीं है (Photo: LinkedIn/Bala Panneerselvam) बाला पनीरसेल्वम ने लिखा कि समस्या कर्मचारियों की नहीं है (Photo: LinkedIn/Bala Panneerselvam)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 19 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 10:25 AM IST

बेंगलुरु को भारत का टेक हब कहा जाता है, लेकिन शहर का ट्रैफिक अब लोगों की काम करने की क्षमता पर भी असर डाल रहा है. सुबह ऑफिस पहुंचने में ही कर्मचारियों की काफी ऊर्जा खर्च हो जाती है और शाम को घर लौटने में घंटों लग जाते हैं. एक उद्यमी ने सोशल मीडिया पर अपने खाली ऑफिस की तस्वीर शेयर कर इसी समस्या की ओर ध्यान दिलाया है.

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एप्लाइड एआई स्टूडियो और एप्लाइड एआई क्लब के संस्थापक बाला पनीरसेल्वम ने लिंक्डइन पर अपने ऑफिस की एक तस्वीर शेयर की. तस्वीर में कई डेस्क खाली नजर आ रहे थे. उन्होंने बताया कि सुबह 10:15 बजे तक, जब ज्यादातर ऑफिस में कामकाज शुरू हो चुका होता है, उनके ऑफिस में काफी कम लोग दिखाई दे रहे थे.

'समस्या लोग नहीं, ऑफिस पहुंचने की मेहनत है'

बाला पनीरसेल्वम ने लिखा कि समस्या कर्मचारियों की नहीं है, बल्कि ऑफिस तक पहुंचने में लगने वाली मेहनत की है. उनके मुताबिक, बेंगलुरु का रोजाना का ट्रैफिक लोगों को ऑफिस पहुंचने से पहले ही मानसिक और शारीरिक तौर पर थका देता है.

उन्होंने एचएसआर इलाके का उदाहरण देते हुए बताया कि करीब 4 किलोमीटर का सफर स्कूटर से लगभग 20 मिनट और कार से करीब 30 मिनट में पूरा होता है. पीक आवर्स में ट्रैफिक की वजह से यह समय और बढ़ जाता है.

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उनका कहना है कि रास्ते में लगातार ट्रैफिक, अचानक सिग्नल तोड़कर सामने आ जाने वाले दोपहिया वाहन और सड़क पर लगातार सतर्क रहने की जरूरत लोगों की ऊर्जा खत्म कर देती है. ऐसे में जब कर्मचारी ऑफिस पहुंचते हैं, तब तक वे उतने तरोताजा नहीं रहते जितना एक अच्छे वर्किंग डे के लिए होना चाहिए.

 

17 किलोमीटर का सफर तय करने में लगे 2 घंटे

बाला ने अपना अनुभव भी साझा किया. उन्होंने बताया कि एक दिन दोपहर करीब 4 बजे बिना बारिश या किसी दूसरी बड़ी परेशानी के भी उन्हें व्हाइटफील्ड से एचएसआर तक करीब 17 किलोमीटर का सफर पूरा करने में दो घंटे लग गए.

यानी सामान्य परिस्थितियों में भी शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पहुंचने में इतना लंबा समय लग सकता है. यही वजह है कि उन्होंने सवाल उठाया कि जब लोग रोजाना ट्रैफिक की इस परेशानी से जूझ रहे हों, तो उनके पास अच्छे काम के लिए जरूरी मानसिक ऊर्जा और सोचने का समय आखिर बचेगा कितना.

शाम को ऑफिस से निकलना भी बन जाता है परेशानी

बेंगलुरु की समस्या सिर्फ ऑफिस पहुंचने तक सीमित नहीं है. बाला के मुताबिक, शाम 6 बजे के बाद ऑफिस से निकलने पर घर पहुंचने में सामान्य से दोगुना समय लग सकता है.वहीं जो कर्मचारी करीब 5 बजे ऑफिस से निकलते हैं, वे भी घर पहुंचते-पहुंचते इतने थक जाते हैं कि अपने परिवार और निजी जिंदगी के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं बचती. इसका असर अगले दिन की शुरुआत पर भी पड़ता है. लंबे सफर और थकान की वजह से कई कर्मचारी अगले दिन ऑफिस देर से पहुंचते हैं.

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'हम शहर में अच्छा काम करने की क्षमता खत्म कर रहे हैं'

बाला पनीरसेल्वम ने बेंगलुरु के ट्रैफिक को लेकर चिंता जताते हुए कहा कि शहर का यह हाल लोगों की काम करने की क्षमता को नुकसान पहुंचा रहा है.

उनके मुताबिक, जब किसी व्यक्ति का काफी समय ट्रैफिक में बीत रहा हो और वह लगातार सड़क के हालात से जूझ रहा हो, तो उसके लिए किसी समस्या पर शांत दिमाग से सोच पाना मुश्किल हो जाता है.

उनकी पोस्ट के बाद कई बेंगलुरु निवासी भी इससे जुड़ी अपनी परेशानियां साझा करने लगे. लोगों ने बताया कि रोजाना का लंबा और अनिश्चित सफर उन्हें ऑफिस जाने से पहले और काम खत्म होने के बाद दोनों समय थका देता है.

बेंगलुरु का ट्रैफिक अब सिर्फ ट्रैफिक की समस्या नहीं

बेंगलुरु लंबे समय से ट्रैफिक जाम और लंबे कम्यूट के लिए चर्चा में रहा है. लेकिन बाला पनीरसेल्वम की पोस्ट ने इस समस्या का एक अलग पहलू सामने रखा है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लोग ऑफिस पहुंचने में कितना समय गंवा रहे हैं, बल्कि यह भी है कि वे ऑफिस पहुंचने के बाद कितना काम करने लायक बचते हैं.

एक कर्मचारी अगर रोजाना घंटों ट्रैफिक में फंसकर ऑफिस पहुंचता है और फिर शाम को उतना ही लंबा सफर करके घर लौटता है, तो उसका असर उसकी उत्पादकता, मानसिक ऊर्जा और निजी जिंदगी पर पड़ना स्वाभाविक है.

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बेंगलुरु जैसे टेक और स्टार्टअप हब के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहां कंपनियां कर्मचारियों से लगातार रचनात्मक सोच और बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद करती हैं. ऐसे में शहर का ट्रैफिक खुद काम करने की क्षमता पर असर डालने लगे, तो यह सिर्फ आने-जाने की समस्या नहीं रह जाती.

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