गौतम गंभीर की टीम इंडिया को आक्रामक क्रिकेट खेलना है, विपक्ष को कुचलना है और कोई कसर नहीं छोड़नी है. लेकिन ऑकलैंड में चौथे टी20 के दौरान टीम मैनेजमेंट के फैसले ने इसी सोच पर सवाल खड़े कर दिए. जिस वैभव सूर्यवंशी ने अभिषेक शर्मा के साथ मिलकर पिछले मैच में पावरप्ले में 118 रन ठोककर इतिहास रचा, उसे ही प्लेइंग-11 से बाहर कर दिया गया. कप्तान श्रेयस अय्यर ने 'निर्दयी' बने रहने की बात कही, लेकिन 260 रनों के पहाड़ के सामने टीम इंडिया की बल्लेबाजी का ऐसा बंटाधार हुआ कि पहले ही ओवर में 2 विकेट गिर गए और जीत की उम्मीदों का दम निकल गया. आखिर यह कैसी आक्रामक सोच है, जिसमें अपने सबसे विस्फोटक हथियार को ही बाहर बैठा दिया जाए?
नतीजा- न्यूजीलैंड ने 260 रनों का पहाड़-सा लक्ष्य खड़ा किया तो भारतीय बल्लेबाजों के हाथ-पांव फूल गए. मेजबान टीम ने 87 रनों से ऐसी धुलाई की कि टीम इंडिया लक्ष्य के आसपास भी नहीं फटक सकी. 4-0 का सपना देखने निकली भारतीय टीम को हार का कड़वा घूंट पीना पड़ा.
गौतम गंभीर को आक्रामक क्रिकेट पसंद है. उनकी टीम बड़े लक्ष्य का पीछा करने से पीछे नहीं हटती. बल्लेबाजों को खुलकर खेलने की छूट है. गेंदबाजों से भी विकेट लेने की उम्मीद की जाती है. लेकिन आक्रामकता और अंधाधुंध प्रयोग के बीच एक बारीक अंतर होता है. ऑकलैंड में टीम मैनेजमेंट शायद यही अंतर भूल गया.
भारत पहले ही सीरीज में 3-0 की अजेय बढ़त ले चुका था. चौथा मुकाबला जीतकर 4-0 की बढ़त बनाने का मौका था. ऐसे में टीम के पास अपने सफल संयोजन को आजमाने का अच्छा अवसर था. लेकिन गंभीर और उनके सहयोगियों ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने सबसे ज्यादा हैरान किया.
जिसने इतिहास रचा, उसी को बाहर कर दिया!
पिछले मुकाबले में अभिषेक शर्मा और वैभव सूर्यवंशी ने न्यूजीलैंड के गेंदबाजों की जमकर खबर ली थी. दोनों ने पावरप्ले के 6 ओवरों में 118 रन बना दिए. टी20 इंटरनेशनल क्रिकेट में किसी भी टीम का यह सबसे बड़ा पावरप्ले स्कोर था.
यह सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं था. यह उस बल्लेबाजी संयोजन की ताकत का प्रमाण था, जिसने विपक्षी टीम को शुरुआती ओवरों में ही मुकाबले से बाहर धकेल दिया था. वैभव और अभिषेक एक-दूसरे के खेल को समझते हुए गेंदबाजों पर टूट रहे थे.
लेकिन अगले ही मुकाबले में इस जोड़ी को तोड़ दिया गया. वैभव बाहर और ईशान किशन अंदर.
सवाल ईशान की काबिलियत का नहीं है. वह भी मैच जिताने की क्षमता रखते हैं. सवाल यह है कि आखिर वैभव को ही बाहर करने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या पिछले मैच का रिकॉर्ड प्रदर्शन टीम मैनेजमेंट के लिए इतना भी मायने नहीं रखता? क्या टीम में जगह बनाने के लिए खिलाड़ी को हर मैच में खुद को साबित करना होगा, लेकिन जगह बचाने के लिए एक ऐतिहासिक प्रदर्शन भी काफी नहीं होगा?
गंभीर से यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब कोई बल्लेबाजी जोड़ी रिकॉर्ड बना रही हो, तो उसे तोड़ने का आधार क्या था?
कप्तान अय्यर की 'निर्दयी' क्रिकेट वाली बात कहां गई?
टॉस के समय कप्तान श्रेयस अय्यर ने कहा, 'हम कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते. सीरीज जीत चुके हैं, लेकिन मुझे लगता है कि हमारा आधा काम ही पूरा हुआ है. निर्दयी बने रहना जरूरी है.'
कप्तान की बात सुनने में शानदार थी. लेकिन निर्दयी क्रिकेट सिर्फ बयान देने से नहीं खेला जाता. इसके लिए फैसलों में भी स्पष्टता चाहिए. अगर टीम का लक्ष्य विपक्ष को कोई मौका नहीं देना है तो फिर पिछले मैच में विपक्ष को ध्वस्त करने वाली ओपनिंग जोड़ी को क्यों तोड़ा गया?
अय्यर कप्तान हैं. प्लेइंग-11 के फैसले में कोच और कप्तान की सामूहिक जिम्मेदारी होती है. इसलिए इस बदलाव पर कप्तान भी सवालों से बच नहीं सकते. क्या उन्होंने वैभव को बाहर करने के फैसले का समर्थन किया? क्या उन्हें नहीं लगा कि 118 रनों की साझेदारी करने वाली जोड़ी को बरकरार रखना चाहिए?
कप्तान का काम सिर्फ टॉस जीतकर गेंदबाजी या बल्लेबाजी चुनना नहीं है. मैदान पर टीम की रणनीति और खिलाड़ियों के भरोसे की जिम्मेदारी भी उसी की होती है. जब आप निर्दयी क्रिकेट की बात करते हैं तो फिर अपने सफल खिलाड़ियों के प्रति भी उतनी ही स्पष्टता दिखानी होगी.
260 रन पड़े तो याद आई आक्रामक बल्लेबाजी?
न्यूजीलैंड ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवरों में 7 विकेट पर 259 रन बनाए. ग्लेन फिलिप्स ने 49 गेंदों पर 107 रन ठोक दिए. माइकल ब्रेसवेल ने 25 गेंदों पर 65 रन बनाकर भारतीय गेंदबाजों की मुश्किलें बढ़ा दीं.
भारत के सामने 260 रनों का लक्ष्य था. यह चुनौती बड़ी थी, लेकिन असंभव नहीं. पिछले मैचों में भारतीय बल्लेबाजों ने जिस तरह बड़े लक्ष्य का पीछा किया था, उससे उम्मीद थी कि टीम एक बार फिर आक्रामक शुरुआत करेगी.
लेकिन दूसरी ही गेंद पर संजू सैमसन 4 रन बनाकर आउट हो गए. पांचवीं गेंद पर ईशान किशन भी बिना खाता खोले पवेलियन लौट गए. पांचवें ओवर में अभिषेक शर्मा (27) आउट हो गए.
जिस टीम को पावरप्ले में 118 रन बनाने की आदत दिखाई दे रही थी, वह इस बार पांचवें ओवर में ही तीन बड़े विकेट गंवा चुकी थी.
यहां गंभीर की रणनीति पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है. अगर टीम का भरोसा आक्रामक बल्लेबाजी पर था तो फिर उस बल्लेबाज को बाहर क्यों किया गया, जो इस रणनीति को सबसे बेहतरीन तरीके से अंजाम दे रहा था?
गेंदबाज पिटे, बल्लेबाज भी नहीं बचा पाए लाज
भारत की हार के पीछे सिर्फ वैभव को बाहर करने का फैसला नहीं था. भारतीय गेंदबाजों ने भी बेहद निराश किया. फिलिप्स और ब्रेसवेल ने जिस तरह रन बनाए, उसने गेंदबाजी की कमजोरियों को उजागर कर दिया.
लेकिन बड़ा लक्ष्य मिलने के बाद बल्लेबाजों से जवाब की उम्मीद थी. आखिर टीम मैनेजमेंट की पूरी रणनीति ही यही थी कि भारत किसी भी स्कोर का पीछा कर सकता है. फिर जब 260 रन सामने आए तो यह दावा मैदान पर क्यों नहीं दिखा?
टीम को शुरुआत में ही तीन झटके लग गए. इसके बाद वापसी की राह मुश्किल होती चली गई. 4-0 का सपना टूट गया और भारतीय टीम को अपनी रणनीति पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत महसूस हुई.
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गंभीर और अय्यर, जवाब तो देना होगा!
इस मैच ने भारतीय टीम के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या टीम में प्रदर्शन की कोई कीमत है? क्या रिकॉर्ड साझेदारी करने के बाद भी किसी युवा खिलाड़ी की जगह सुरक्षित नहीं है? क्या सीरीज जीतने के बाद प्रयोग करना जरूरी था? और सबसे अहम, क्या आक्रामक क्रिकेट के नाम पर सफल संयोजन से छेड़छाड़ करना सही रणनीति थी?
वैभव होते तो भारत 260 रन बना ही लेता, ऐसा दावा नहीं किया जा सकता. वह भी आउट हो सकते थे. लेकिन उन्हें बाहर रखने का फैसला निश्चित रूप से चर्चा के दायरे में है. खासकर तब, जब पिछले मैच में उन्होंने अपनी उपयोगिता साबित की थी.
गंभीर को यह समझना होगा कि टीम बनाना सिर्फ बड़े नामों को प्लेइंग-11 में फिट करने का खेल नहीं है. खिलाड़ियों के प्रदर्शन का सम्मान करना भी जरूरी है. वहीं अय्यर को भी यह बताना होगा कि उनकी 'निर्दयी' क्रिकेट की परिभाषा क्या है.
विपक्ष पर निर्दयी होने की बात करने वाली टीम को पहले अपने फैसलों में निरंतरता दिखानी होगी. ऑकलैंड में न्यूजीलैंड ने भारतीय गेंदबाजी की धज्जियां उड़ाईं, लेकिन भारतीय टीम मैनेजमेंट ने अपने ही सफल बल्लेबाजी संयोजन को तोड़कर खुद की मुश्किलें बढ़ा लीं. वैभव को बाहर बैठाकर गंभीर ने क्या पाया? इस सवाल का जवाब अब सिर्फ स्कोरबोर्ड से नहीं, टीम मैनेजमेंट को भी देना होगा.
विश्व मोहन मिश्र