नागोया में भारत के मैराथन रनर सावन बरवाल ने एशियन गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए सिल्वर मेडल जीत लिया. 28 साल के सावन ने 42.195 किलोमीटर की रेस 2 घंटे 11 मिनट 37 सेकंड में पूरी की और अपना ही नेशनल रिकॉर्ड तोड़ दिया.
सावन के लिए यह लगातार दूसरी मैराथन रेस थी और दोनों में उन्होंने नेशनल रिकॉर्ड बनाया. अप्रैल में रॉटरडैम मैराथन में अपने करियर की पहली मैराथन दौड़ते हुए उन्होंने 2:11:58 का समय निकाला था और शिवनाथ सिंह का 48 साल पुराना नेशनल रिकॉर्ड तोड़ा था.
मेडल जीतने के बाद सावन ने पीटीआई से कहा- यह मेडल मेरे लिए बहुत कीमती है. मैं 15-16 साल से ट्रेनिंग और इवेंट में हिस्सा ले रहा हूं. अगर मुझे यह मेडल नहीं मिलता तो यह सब बेमतलब और समय की बर्बादी लगता. यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है.
पहले 5000 और 10000 मीटर में चमके
हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले के जोगिंदर नगर से आने वाले सावन के पिता कुलदीप दिल्ली में ड्राइवर रहे हैं, जबकि मां सुभद्रा देवी गृहिणी हैं.
सावन का रनिंग से जुड़ना भी संयोग से हुआ. उनके बड़े भाई स्कूल की ट्रैक टीम में थे. 14 साल की उम्र में वह घर के पास एक ट्रैक पर पहुंचे और 1500 मीटर की ट्रेनिंग शुरू कर दी.
2015 में उन्होंने अंडर-18 स्तर पर 3000 मीटर में अपना पहला नेशनल मुकाबला खेला. 2021 में फेडरेशन कप में 5000 मीटर के जरिए सीनियर स्तर पर शुरुआत की. 2025 नेशनल गेम्स में उन्होंने 5000 और 10000 मीटर दोनों में गोल्ड जीता. 2019 में वह स्पोर्ट्स कोटे के तहत अपने बड़े भाई के साथ आर्मी में शामिल हुए.
सावन ने उसी साल मैराथन का रुख किया. आर्मी स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट, पुणे के कोच यूनिस खान और रिलायंस फाउंडेशन के अजित मार्कोस की सलाह पर उन्होंने यह बदलाव किया. उनकी VO2 Max क्षमता काफी अच्छी पाई गई, जिससे कोचों को लगा कि 42.195 किलोमीटर की मैराथन उनके लिए बेहतर हो सकती है.
सावन ने कहा- मुझे भरोसा था कि मैं मैराथन में अपनी पहचान बना सकता हूं. इसलिए यह सही फैसला था. मैराथन शुरू करने का उनका पहला लक्ष्य नेशनल रिकॉर्ड तोड़ना था. उनके मुताबिक भारतीय धावकों के लिए 2 घंटे 12 मिनट की बाधा थी. उन्होंने साफ कहा था कि अगर वह 2:12 से नीचे नहीं दौड़ पाए तो मैराथन करने का कोई मतलब नहीं होगा.
लेकिन एशियन गेम्स में उनका फोकस रिकॉर्ड नहीं, सिर्फ मेडल पर था. सावन ने कहा कि तेज रफ्तार में दौड़ते हुए उन्हें लगा कि रिकॉर्ड टूट सकता है, लेकिन वह लगातार अपनी गति बनाए रखने पर ध्यान दे रहे थे.
कहां-कहां की सावन बरवाल ने ट्रेनिंग?
अप्रैल में नेशनल रिकॉर्ड तोड़ने के बाद सावन ने ऊटी में हाई-एल्टीट्यूड ट्रेनिंग की. इसके बाद फेडरेशन ने उन्हें एशियन गेम्स से पहले दो महीने के लिए कोलोराडो स्प्रिंग्स भेजा. उन्होंने बताया कि रिलायंस फाउंडेशन ने भी उनकी मदद की. वहां उन्होंने एलीट ट्रेनर्स के साथ ट्रेनिंग की, जिससे एशियन गेम्स में अच्छा प्रदर्शन करने का उनका आत्मविश्वास बढ़ा.
भारत को एशियाड में कब-कब मिला मेडल?
सावन का सिल्वर मेडल 1982 के दिल्ली एशियन गेम्स में होसुर कुक्कप्पा सीतारन (Hosur Kukkappa Seetharan) के ब्रॉन्ज के बाद मैराथन में भारत का पहला एशियन गेम्स मेडल है. वह एशियन गेम्स में मैराथन मेडल जीतने वाले सिर्फ चौथे भारतीय हैं. 1951 के पहले एशियन गेम्स में छोटा सिंह ने गोल्ड और सूरत सिंह माथुर ने ब्रॉन्ज जीता था.
अब सावन की नजर 2027 वर्ल्ड चैम्पियनशिप पर है. उन्होंने कहा कि वह एक महीने का ब्रेक लेंगे और उसके बाद 2027 वर्ल्ड चैम्पियनशिप के लिए क्वालिफाई करने की कोशिश करेंगे.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क