44 साल का लंबा इंतजार खत्म हुआ तो भारतीय महिला हॉकी टीम की आंखों में सिर्फ गोल्ड की चमक नहीं थी, बल्कि उस सफर की पूरी कहानी भी थी, जिसने इस टीम को यहां तक पहुंचाया. एशियन गेम्स 2026 के फाइनल में भारत ने पेरिस ओलंपिक की सिल्वर मेडलिस्ट चीन को 1-0 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया. इस जीत के साथ भारतीय महिला हॉकी टीम ने 2028 लॉस एंजेलिस ओलंपिक के लिए भी क्वालिफाई कर लिया.
ड्रेसिंग रूम में जश्न शुरू हुआ तो हेड कोच शोर्ड मारिन भी खिलाड़ियों के साथ इस ऐतिहासिक पल का हिस्सा बने. लेकिन इस जीत की असली कहानी सिर्फ फाइनल के 60 मिनट की नहीं है. इसके पीछे पिछले नौ महीनों में हुआ वह बदलाव है, जिसने आत्मविश्वास की कमी और चोटों से परेशान एक टीम को एकजुट और निडर यूनिट में बदल दिया.
मारिन ने टीम की सोच बदल दी
जनवरी में भारतीय महिला हॉकी टीम के हेड कोच के तौर पर वापसी करने वाले शोर्ड मारिन के सामने आसान चुनौती नहीं थी. टीम का प्रदर्शन अस्थिर था, एफआईएच प्रो लीग से बाहर हो चुकी थी और चोटों ने भी कॉम्बिनेशन को प्रभावित किया था. ऐसे समय में मारिन ने सबसे पहले टीम के भीतर भरोसा पैदा करने पर काम किया. उनका तरीका भी दूसरे कोचों से कुछ अलग रहा. मैदान पर उनकी आवाज अक्सर हिंदी में सुनाई देती थी, 'थोड़ा आगे, पीछे जा, दीपू भाग, शिल्पी पास.'
वह खिलाड़ियों को बहुत ज्यादा निर्देशों में बांधने के बजाय उन्हें अपनी समझ के मुताबिक खेलने की आजादी देते रहे. बड़े मुकाबलों से पहले लंबे भाषणों की जगह उनका भरोसा खिलाड़ियों के काम आया. शोर्ड मारिन का मानना रहा कि मैदान पर उतरने के बाद खिलाड़ियों को अपनी स्थिति के हिसाब से फैसला लेने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए. इसलिए अहम मैचों से पहले लंबी-लंबी '70 मिनट की स्पीच' उनकी शैली का हिस्सा नहीं रही.भारतीय खिलाड़ियों ने भी उनकी इस सोच को महसूस किया. टीम की युवा डिफेंडर साक्षी राणा से लेकर अनुभवी गोलकीपर सविता पूनिया तक, खिलाड़ियों को अपने खेल को खुलकर व्यक्त करने का भरोसा मिला.यही बदलाव धीरे-धीरे टीम के प्रदर्शन में दिखाई देने लगा.
भारत ने एफआईएच नेशन्स कप जीतकर प्रो लीग में वापसी की. इसके बाद वर्ल्ड कप में टीम ने शानदार प्रदर्शन किया और पांचवें स्थान पर रही. यह 52 साल में भारतीय महिला टीम का वर्ल्ड कप में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. इस अभियान की खास बात यह भी रही कि टीम की 11 खिलाड़ियों ने पहली बार वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया था. यानी शोर्ड मारिन के पास सिर्फ अनुभवी खिलाड़ियों का समूह नहीं था, बल्कि युवा चेहरों को भी बड़े मंच पर जिम्मेदारी देनी थी. भारत पूरे टूर्नामेंट में सिर्फ एक मुकाबला हारा. यह हार नीदरलैंड्स के खिलाफ आई, जो सह-मेजबान होने के साथ आखिरकार चैम्पियन भी बना. उस मुकाबले में भारत के खिलाफ दोनों गोल पेनल्टी कॉर्नर से आए थे.
इस बदलाव को सिर्फ हॉकी की रणनीति से समझना पूरी कहानी नहीं होगी. शोर्ड मारिन ने टीम के भीतर एकजुटता बढ़ाने पर भी खास जोर दिया. खिलाड़ियों की कलाई पर यूनिटी बैंड बांधना इसी सोच का हिस्सा था. उनका लक्ष्य था कि टीम में मौजूद किसी भी तरह के मतभेद पीछे छूटें और खिलाड़ी एक-दूसरे के लिए खेलें. इस प्रक्रिया में सपोर्ट स्टाफ ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. साइंटिफिक एडवाइजर वेन लोम्बार्ड, ड्रैग-फ्लिक कंसल्टेंट ताएके ताएकेमा, असिस्टेंट कोच माथियास विला और दूसरे परफॉर्मेंस विशेषज्ञ लगातार खिलाड़ियों के साथ काम करते रहे.
पीएम मोदी भी बने मारिन के फैन
भारतीय महिला हॉकी में शोर्ड मारिन के योगदान की तारीफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी कर चुके हैं. मई में नीदरलैंड्स के हेग में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने भारतीय हॉकी में डच कोचों के योगदान का उल्लेख किया था. पीएम मोदी ने कहा था कि डच कोचों ने भारतीय हॉकी को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और महिला हॉकी टीम के लगातार अच्छे प्रदर्शन में मारिन की अहम भूमिका रही है. अब उनके सामने अगली चुनौती तैयार है.
आइची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में चीन को हराकर गोल्ड जीतना भारतीय महिला हॉकी के लिए 44 साल बाद आया ऐतिहासिक पल है. साथ ही इस जीत ने लॉस एंजेलिस ओलंपिक का रास्ता भी खोल दिया है. मारिन और उनकी टीम के लिए अब असली अगला लक्ष्य 2028 ओलंपिक है.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क