तिब्बत में भूकंप के बाद जमीन फटी, 3.5 मीटर खिसकी... वैज्ञानिकों को मिला पहला सबूत

तिब्बत में 7.0 तीव्रता के भूकंप के बाद जमीन पर टूटने के निशान मिले हैं. वैज्ञानिकों ने जांच में 3.5 मीटर तक ऊंचाई में बदलाव, जमीन में दरारें और रेत में पानी भरने के संकेत पाए हैं.

Advertisement
तिब्बत में 7 तीव्रता का भूकंप आने के बाद वहां की जमीन फट गई. (Photo: Getty) तिब्बत में 7 तीव्रता का भूकंप आने के बाद वहां की जमीन फट गई. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 28 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 5:53 PM IST

22 अक्टूबर को तिब्बत में 7.0 तीव्रता का भूकंप आया था, लेकिन अब जमीन पर इसके असर के निशान मिले हैं. वैज्ञानिकों ने भूकंप के केंद्र से करीब 15 किलोमीटर दूर जमीन में टूटने और खिसकने के संकेत देखे हैं. जांच में कुछ जगहों पर जमीन के स्तर में 3.5 मीटर तक का अंतर मिला है. वहीं, कुछ हिस्सों में जमीन 0.9 मीटर तक बाईं ओर खिसकी. जमीन में दरारों के साथ रेत में पानी भरने के संकेत भी मिले हैं. इन निशानों से वैज्ञानिकों को समझने में मदद मिल सकती है कि भूकंप के दौरान धरती के अंदर क्या हुआ था.

Advertisement

USGS के मुताबिक, इस भूकंप का केंद्र चीन के तिब्बत क्षेत्र में नागचू शहर से करीब 191 किलोमीटर पूर्व-उत्तर-पूर्व में था. भूकंप जमीन से करीब 18 किलोमीटर नीचे आया था. वैज्ञानिकों के मुताबिक, जमीन की ऊपरी परत में खिंचाव के कारण चट्टानों में हलचल हुई. इसका असर जमीन की सतह पर भी दिखाई दिया.

भूकंप के बाद वैज्ञानिकों ने जमीन पर टूटने और खिसकने के निशान देखे. जमीन के अंदर चट्टानों के जिस हिस्से में टूटने या खिसकने से दरार बनती है, उसे फॉल्ट कहते हैं. जब टूट-फूट का असर जमीन की सतह पर भी दिखाई देता है, तो इसे सरफेस रप्चर कहा जाता है.

यह भी पढ़ें: 150 KM की रफ्तार से चली हवाएं, समुद्र ने निगली सड़कें, घर भी टूटे… तस्वीरों में देखें साइक्लोन अर्नब की तबाही

जांच में कुछ जगहों पर जमीन के स्तर में करीब 3.5 मीटर तक का अंतर पाया गया. वहीं, कुछ हिस्सों में जमीन बाईं ओर करीब 0.9 मीटर खिसकी. इसका मतलब है कि जमीन के अलग-अलग हिस्सों में बदलाव हुआ. पूरे इलाके में जमीन एक जैसी दूरी तक नहीं खिसकी.

Advertisement

जमीन में दरारों के साथ रेत में भी दिखा बदलाव

वैज्ञानिकों को भूकंप प्रभावित इलाके में जमीन की दरारों के अलावा रेत में पानी भरने के संकेत भी मिले. इसे सैंड लिक्विफैक्शन कहते हैं. आसान भाषा में समझें तो भूकंप के तेज झटकों से जमीन के नीचे मौजूद रेत कमजोर हो सकती है. ऐसा तब होता है, जब रेत के कणों के बीच मौजूद पानी का दबाव बढ़ जाता है. 

इससे जमीन अपनी मजबूती खो सकती है. कुछ जगहों पर रेत और पानी जमीन की सतह पर भी आ सकते हैं. ऐसी स्थिति में इमारतों और दूसरी संरचनाओं को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है. वैज्ञानिकों को जमीन पर कई जगह दरारें भी मिलीं. इनसे पता चलता है कि भूकंप के दौरान जमीन के अंदर हुई हलचल का असर सतह तक पहुंचा था.

जमीन के अंदर खिंचाव से कैसे आया भूकंप?

वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस भूकंप की मुख्य वजह जमीन की ऊपरी परत में खिंचाव था. इसे नॉर्मल फॉल्टिंग कहते हैं. जब जमीन की परत में खिंचाव आता है, तो चट्टानों में दरार बन सकती है. इसके बाद चट्टानों का एक हिस्सा दूसरे हिस्से के मुकाबले नीचे खिसक सकता है. इस दौरान ऊर्जा निकलती है, जिससे भूकंप आता है. 

यह भी पढ़ें: Cyclone Arnab Live: साइक्लोन अर्नब से आंध्र में तबाही, 3 की मौत-30 घर डैमेज, 714 गांवों में नुकसान

Advertisement

तिब्बत का इलाका भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल से जुड़ा है. इन दोनों प्लेटों के टकराने से हिमालय और तिब्बती पठार का निर्माण हुआ है. इन प्लेटों की हलचल से जमीन के अंदर दबाव और खिंचाव बना रहता है. यही इस इलाके में भूकंप आने की एक बड़ी वजह है. USGS के मुताबिक, 22 अक्टूबर को आए इस भूकंप की तीव्रता 7.0 थी और इसका केंद्र जमीन से करीब 18 किलोमीटर नीचे था.

वैज्ञानिकों के लिए क्यों अहम है यह खोज?

जमीन पर मिली दरारों से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलती है कि भूकंप के दौरान चट्टानों में किस तरह हलचल हुई. इससे यह भी पता लगाया जा सकता है कि जमीन के किस हिस्से में कितना बदलाव आया. तिब्बत में मिले इन निशानों से वैज्ञानिकों को भूकंप के असर को समझने में मदद मिलेगी. आगे की जांच से यह पता चल सकता है कि जमीन में आई दरारें कितने बड़े इलाके में फैली हैं और अलग-अलग जगहों पर कितना बदलाव हुआ है.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »