ईरान की जंग से कतर पर बड़ा संकट... दुनियाभर में चिप और मेडिकल इंडस्ट्री पर असर

कतर एनर्जी ने ईरान के ड्रोन-मिसाइल हमलों के बाद रास लैफन फैसिलिटी बंद कर दी है. इससे दुनिया भर में हीलियम सप्लाई का 33% हिस्सा रुक गया है. इससे MRI मशीनें, सेमीकंडक्टर चिप प्रोडक्शन और रॉकेट फ्यूल पर असर पड़ रहा है. अगर यह बंदी 60-90 दिन चली तो सेमीकंडक्टर और मेडिकल क्षेत्र में बड़ा संकट आ सकता है.

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ये है कतर एनर्जी की मेसाइड इंडस्ट्रियल सिटी जो बंद कर दी गई. यहां से हीलियम और एलएनजी प्रोडक्शन होता था. (Photo: Getty) ये है कतर एनर्जी की मेसाइड इंडस्ट्रियल सिटी जो बंद कर दी गई. यहां से हीलियम और एलएनजी प्रोडक्शन होता था. (Photo: Getty)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 16 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 8:36 PM IST

कतर एनर्जी ने ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद लगभग 2 मार्च से रास लैफन फैसिलिटी बंद कर दी है. यह फैसिलिटी दुनिया के कुल हीलियम का लगभग 33% हिस्सा बनाती है. हर महीने करीब 52 लाख क्यूबिक मीटर हीलियम उत्पादन रुक गया है. हीलियम बहुत महत्वपूर्ण गैस है, जो एमआरआई मशीनों को ठंडा रखती है. सेमीकंडक्टर चिप बनाने में हवा साफ करती है. रॉकेट ईंधन को दबाव में रखती है. 

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इस बंदी से दक्षिण कोरिया और ताइवान के चिपमेकर दो हफ्ते में बंद होने की कगार पर हैं. अस्पतालों में एमआरआई स्कैनर बंद होने का खतरा है. विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर बंदी 60-90 दिन चली तो कीमतें और भी आसमान छू सकती हैं. यह संकट दिखाता है कि दुनिया कुछ ही देशों पर हीलियम के लिए कितनी ज्यादा निर्भर है.

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कतर का रास लैफन फैसिलिटी क्यों बंद हुआ?

ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध में ईरान ने कतर के करीब के इलाकों में ड्रोन और मिसाइल हमले किए. खतरे के कारण कतर एनर्जी ने रास लैफन फैसिलिटी को बंद करना पड़ा. यह दुनिया का सबसे बड़ा हीलियम उत्पादन केंद्र है. कतर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा हीलियम उत्पादक देश है. 

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अमेरिका, रूस और अल्जीरिया के बाद कतर का योगदान सबसे बड़ा है. इस फैसिलिटी से हीलियम प्राकृतिक गैस के साथ निकलता है. उसे अलग करके पैक किया जाता है. हमलों के डर से फैसिलिटी बंद होने से वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह टूट गई है.

हीलियम की जरूरत कहां-कहां है?

हीलियम बहुत हल्की और ठंडी रखने वाली गैस है. एमआरआई मशीनों में सुपरकंडक्टर मैग्नेट को -269 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा रखने के लिए हीलियम का इस्तेमाल होता है. अगर हीलियम खत्म हो गया तो MRI स्कैनर काम नहीं करेंगे. अस्पतालों में मरीजों के ब्रेन, स्पाइन और हार्ट की जांच रुक सकती है. 

सेमीकंडक्टर फैक्टरियों में चिप बनाने के दौरान हीलियम हवा को साफ करता है. प्रोसेस को बिना प्रदूषण के चलाता है. अगर सप्लाई रुकी तो साउथ कोरिया और ताइवान की बड़ी कंपनियां जैसे सैमसंग, TSMC बंद हो सकती हैं. इससे मोबाइल, कंप्यूटर, कार और इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमतें बढ़ सकती हैं. रॉकेट और स्पेस मिशन में भी हीलियम ईंधन को दबाव में रखता है.

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कीमतें क्यों दोगुनी हो गईं?

हीलियम की सप्लाई रुकने से स्पॉट मार्केट में कीमतें पहले ही दोगुनी हो चुकी हैं. पहले जहां एक क्यूबिक मीटर की कीमत 10-15 डॉलर थी, अब 25-30 डॉलर तक पहुंच गई है. विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर बंदी 60-90 दिन चली तो कीमतें 50-100 डॉलर तक जा सकती हैं. 

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दुनिया में हीलियम के उत्पादन के लिए कुछ ही देश हैं – अमेरिका, कतर, रूस और अल्जीरिया. इनमें से कतर का हिस्सा बहुत बड़ा है. अमेरिका भी अपना उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रहा है लेकिन इतनी जल्दी नहीं हो पाएगा. रूस और अल्जीरिया पर भी युद्ध और प्रतिबंधों का असर है. इसलिए वैश्विक स्तर पर हीलियम की कमी बहुत गंभीर हो गई है.

भारत पर क्या असर?

भारत में भी MRI मशीनें, सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री और स्पेस मिशन हीलियम पर निर्भर हैं. अगर सप्लाई लंबे समय तक रुकी तो अस्पतालों में MRI जांच महंगी और मुश्किल हो जाएगी. चिप बनाने वाली कंपनियां और मोबाइल-कंप्यूटर की कीमतें बढ़ सकती हैं. इसरो के रॉकेट लॉन्च पर भी असर पड़ सकता है. भारत सरकार अब दूसरे सोर्स ढूंढ रही है. स्टॉक बढ़ाने की कोशिश कर रही है. संकट बढ़ने पर भारत को भी महंगा हीलियम खरीदना पड़ेगा.

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युद्ध का छिपा खतरा

ईरान युद्ध सिर्फ तेल और मिसाइलों तक सीमित नहीं रहा. यह अब हीलियम जैसी जरूरी चीजों की सप्लाई को भी प्रभावित कर रहा है. कतर का रास लैफन बंद होना वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका है. सेमीकंडक्टर, मेडिकल और स्पेस इंडस्ट्री पर असर पड़ रहा है. यह दिखाता है कि दुनिया कुछ ही देशों पर कितनी ज्यादा निर्भर है. अगर युद्ध लंबा चला तो हीलियम की कमी और महंगाई बहुत बड़ी समस्या बन सकती है.

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