भारत का डिफेंस GPS 'नाविक' संकट में... 11 में सिर्फ 3 सैटेलाइट कर रहे हैं काम, जानिए इसके खतरे

भारत का स्वदेशी GPS 'नाविक' गंभीर संकट में है. 11 सैटेलाइट में से सिर्फ 3 ही काम कर रहे हैं. इनमें से एक किसी भी समय फेल हो सकता है क्योंकि उसकी उम्र 10 साल से ज्यादा हो चुकी है. नेविगेशन के लिए कम से कम 4 सैटेलाइट जरूरी हैं. इससे सेना की मिसाइल मार्गदर्शन, जहाजों-विमानों की लोकेशन और युद्ध क्षमता पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है.

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इसरो ने स्वदेसी जीपीएस सैटेलाइट लॉन्च किए थे लेकिन उनकी हालत खराब चल रही है. (Photo: ITG) इसरो ने स्वदेसी जीपीएस सैटेलाइट लॉन्च किए थे लेकिन उनकी हालत खराब चल रही है. (Photo: ITG)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 16 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 3:19 PM IST

भारत का अपना स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम 'नाविक' (NAVIC) आज गंभीर संकट में है. इस समय 11 सैटेलाइट में से सिर्फ 3 ही अपना मुख्य काम कर पा रहे हैं. इनमें से एक सैटेलाइट कभी भी फेल हो सकता है क्योंकि उसकी उम्र 10 साल से ज्यादा हो चुकी है. नाविक को मिनिमम 4 सैटेलाइट की जरूरत होती है, लेकिन अभी सिर्फ 3 काम कर रहे हैं. इससे सेना की नेविगेशन, मिसाइल मार्गदर्शन और सटीक हमलों की क्षमता पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है.

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नाविक क्या है और क्यों बनाया गया?

1999 के कारगिल युद्ध में अमेरिका ने भारत को GPS की सटीक जानकारी देने से इनकार कर दिया था. इससे भारतीय सेना को हिमालय की ऊंची चोटियों में नेविगेशन और सटीक हमले करने में बड़ी मुश्किल हुई. इसी समस्या को देखते हुए भारत सरकार ने अपना स्वदेशी सिस्टम बनाने का फैसला किया.

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इसरो ने 2013 से 2018 के बीच IRNSS (Indian Regional Navigation Satellite System) सैटेलाइट्स लॉन्च किए, जिसे बाद में नाविक नाम दिया गया. नाविक भारत और उसके 1500 किमी आसपास के क्षेत्र में पोजीशन, नेविगेशन और टाइमिंग सर्विस देता है. यह सिर्फ भारत के लिए है, जबकि अमेरिका का GPS, चीन का बीडौ, यूरोप का गैलीलियो और रूस का ग्लोनास पूरे विश्व में काम करते हैं.

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पहली पीढ़ी के सैटेलाइट्स की दुर्दशा

इसरो ने पहले 9 सैटेलाइट लॉन्च किए. इनमें से 8 अंतरिक्ष में पहुंचे, लेकिन 5 सैटेलाइट (IRNSS-1A, 1C, 1D, 1E, 1G) में सभी तीन एटॉमिक क्लॉक फेल हो गए. एटॉमिक क्लॉक सैटेलाइट का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो समय की सटीक गणना करता है. इनकी विफलता से ये सैटेलाइट बेकार हो गए. 

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अब सिर्फ 3 सैटेलाइट (IRNSS-1B, 1F, 1I) बचे थे। IRNSS-1B की उम्र 11 साल हो चुकी है. IRNSS-1F का आखिरी एटॉमिक क्लॉक भी 13 मार्च 2026 को फेल हो गया. इसरो ने कहा कि यह सैटेलाइट अब सिर्फ मैसेजिंग सर्विस देगा, नेविगेशन नहीं. यानी अब सिर्फ 2 सैटेलाइट किसी तरह काम कर रहे हैं.

दूसरी पीढ़ी के सैटेलाइट्स भी फेल

पहली पीढ़ी की गलतियों से सीखकर इसरो ने NVS सीरीज (दूसरी पीढ़ी) शुरू की. NVS-01 मई 2023 में लॉन्च हुआ और ठीक काम कर रहा है. लेकिन NVS-02 जनवरी 2025 में लॉन्च हुआ और गलत ऑर्बिट में फंस गया. इसका इंजन नहीं जला, इसलिए यह नेविगेशन सर्विस नहीं दे पा रहा. 

इसरो को कुल 5 NVS सैटेलाइट की जरूरत है, लेकिन सिर्फ एक ही ठीक से काम कर रहा है. बाकी लॉन्च में देरी हो रही है. 2025 में सरकार ने कहा था कि 2026 तक बाकी सैटेलाइट लॉन्च हो जाएंगे, लेकिन अभी कोई संकेत नहीं है.

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अमेरिका और चीन के साथ तुलना

अमेरिका का GPS हमेशा 30 सैटेलाइट रखता है, जबकि जरूरत सिर्फ 24 की है. चीन का बीडौ भी 35 सैटेलाइट के साथ चलता है. लेकिन भारत का नाविक, जो सिर्फ 4 सैटेलाइट पर चलना चाहिए, आज सिर्फ 3 पर टिका है. यह स्थिति भारत की रक्षा के लिए बहुत खतरनाक है. सेना को विदेशी GPS पर निर्भर रहना पड़ता है, जो युद्ध के समय बंद हो सकता है.

पिछले साल राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने इस मुद्दे पर जवाब भी दिया था. (Photo: Rajyasabha)

खतरे क्या हैं?  

  • सेना की नेविगेशन और मिसाइल मार्गदर्शन प्रभावित होगा.  
  • दुश्मन देशों के साथ युद्ध में सटीक हमले नहीं हो पाएंगे.  
  • जहाजों, विमानों और जमीनी सैनिकों की लोकेशन गलत हो सकती है.  
  • अगर नाविक पूरी तरह फेल हो गया तो भारत को विदेशी सिस्टम पर निर्भर होना पड़ेगा, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है.

इसरो अब NVS-03 और बाकी सैटेलाइट जल्द लॉन्च करने की कोशिश कर रहा है. लेकिन फिलहाल नाविक की हालत चिंताजनक है. यह सिर्फ एक टेक्निकल समस्या नहीं, बल्कि भारत की रक्षा क्षमता का संकट है. सरकार और इसरो को जल्दी से जल्दी इस समस्या को हल करना होगा, वरना युद्ध के समय बड़ा नुकसान हो सकता है.

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