अफगानिस्तान के नूरिस्तान प्रांत की राजधानी पारुन में 20 जुलाई 2026 को अचानक आई फ्लैश फ्लड ने भारी तबाही मचा दी है. हीटवेव के बाद भारी मॉनसून बारिश ने पहाड़ी इलाके में अचानक बाढ़ ला दी. इस घटना में कम से कम 20 लोगों की मौत हो चुकी है. 80 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. 100 से अधिक लोग लापता हैं.
लापताओं में शहर के मेयर और कई सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं. तालिबान के राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बताया कि इलाके में भारी नुकसान हुआ है. खुरदुरे पहाड़ी इलाके में बचाव कार्य चल रहा है. प्रारंभिक नुकसान 35 मिलियन डॉलर यानी करीब 290 करोड़ रुपये का अनुमान लगाया गया है.
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प्रांतीय टीमों और अफगान रेड क्रिसेंट सोसाइटी राहत सामग्री पहुंचा रही हैं. अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि मौतों की संख्या और बढ़ सकती है. मानवीय संगठनों ने वैश्विक मदद की अपील की है.
यह घटना दिखाती है कि जलवायु परिवर्तन और एक्स्ट्रीम मौसम कैसे गरीब और भौगोलिक रूप से कमजोर इलाकों को प्रभावित कर रही हैं. नूरिस्तान पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित है. यह क्षेत्र घने जंगलों, ऊंची पहाड़ियों और संकरी घाटियों वाला है. यहां बारिश का पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है और फ्लैश फ्लड बन जाता है.
फ्लैश फ्लड कैसे आया?
हीटवेव के बाद अचानक भारी मॉनसून बारिश फ्लैश फ्लड का मुख्य कारण बनी. लंबे समय तक सूखा और गर्मी पड़ने से जमीन सूख जाती है. ऐसी जमीन पानी को अच्छी तरह सोख नहीं पाती. जब तेज बारिश होती है तो पानी सतह पर बहने लगता है. नूरिस्तान की पहाड़ियों में ढलान ज्यादा होने से यह पानी तेज गति से बहता है. नदियां और नाले उफान पर आ जाते हैं. कुछ ही घंटों में यह तबाही मचा देते हैं.
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मॉनसून सिस्टम दक्षिण एशिया में सक्रिय है. अफगानिस्तान के पूर्वी हिस्सों में भी इसकी छाप पड़ रही है. जुलाई में मॉनसून की सक्रियता बढ़ती है. भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में ऐसी घटनाएं आम हो गई हैं. क्लाइमेट चेंज के कारण हीटवेव लंबी और तेज हो रही हैं. उसके तुरंत बाद अचानक भारी बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं. यह पैटर्न फ्लैश फ्लड को और खतरनाक बना रहा है.
पारुन शहर में फ्लैश फ्लड ने घरों, दुकानों, सड़कों और सरकारी इमारतों को नुकसान पहुंचाया. लापता लोगों में मेयर और सरकारी कर्मचारी शामिल होने से प्रशासनिक कामकाज भी प्रभावित हुआ है. घायलों का इलाज चल रहा है. रेड क्रिसेंट और प्रांतीय टीमें खाना, पानी, दवाइयां और तंबू जैसी जरूरी चीजें पहुंचा रही हैं. लेकिन ऊबड़-खाबड़ इलाका बचाव कार्य को मुश्किल बना रहा है. हेलिकॉप्टर से या पैदल ही पहुंचा जा सकता है.
अफगानिस्तान पहले से ही आर्थिक और राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है. तालिबान प्रशासन के पास सीमित संसाधन हैं. घर गंवाने वाले लोग बेघर हो गए हैं. फसलें बर्बाद हुई हैं. पशु मारे गए हैं. सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हो गए हैं. इससे इलाके का संपर्क बाकी दुनिया से कट सकता है. मौतों की संख्या बढ़ने की आशंका इसलिए है क्योंकि कई लोग अभी भी मलबे में दबे हो सकते हैं.
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पाकिस्तान बॉर्डर के पास नूरिस्तान
नूरिस्तान पाकिस्तान की सीमा के पास है. पहाड़ी इलाके, कम जंगल और ढलानदार जमीन पानी को तेजी से बहाती है. भारत के हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भी इसी तरह की घटनाएं होती रहती हैं. पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में भी मॉनसून फ्लैश फ्लड आम हैं.
दक्षिण एशिया में मॉनसून बारिश जीवन देती है लेकिन जब अधिक हो जाए तो विनाशकारी बन जाती है. 2026 में भारत में भी मॉनसून एक्टिव फेज चल रहा है. वहीं अफगानिस्तान में भी यही सिस्टम तबाही ला रहा है. यह दिखाता है कि मौसम की घटनाएं सीमाओं का ध्यान नहीं रखती.
वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग से वायुमंडल में ज्यादा नमी रहती है. इससे भारी बारिश की घटनाएं बढ़ रही हैं. हीटवेव जमीन को सूखा बनाती है. फिर अचानक बारिश फ्लैश फ्लड पैदा करती है. अफगानिस्तान जैसे देश जहां इंफ्रास्ट्रक्चर कमजोर है. ड्रेनेज सिस्टम नहीं है. वहां नुकसान ज्यादा होता है.
तालिबान प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मदद मांगी है. यूनाइटेड नेशंस और अन्य ह्यूमैनिटेरियन ग्रुप्स सहायता के लिए आगे आए हैं. बचाव टीमें दिन-रात काम कर रही हैं. लेकिन खराब मौसम, अंधेरा और पहाड़ी रास्ते काम को मुश्किल बना रहे हैं. लापता लोगों की तलाश में डॉग स्क्वॉड और लोकल लोगों की मदद ली जा रही है. अगले कुछ दिनों में और बारिश होने की संभावना है, इसलिए अलर्ट जारी रखा गया है.
आजतक साइंस डेस्क