उत्तरकाशी के हर्षिल क्षेत्र पर एक बार फिर बड़ा खतरा मंडराने लगा है. पिछले साल धराली-हर्षिल आपदा की भयावह यादें अभी भी ताजा हैं, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि अब तक स्थाई सुरक्षा कार्य नहीं किए गए. भागीरथी नदी का जलस्तर बढ़ने और लगातार हो रहे कटाव से स्थानीय लोग दहशत में हैं. उनका कहना है कि रातभर जागकर नदी पर नजर रखनी पड़ रही है. जल्द प्रभावी सुरक्षा उपाय नहीं किए गए तो हर्षिल का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है.
आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव विनोद कुमार सुमन ने कहा कि हर्षिल क्षेत्र में भागीरथी नदी के बढ़े जलस्तर को देखते हुए सुरक्षात्मक कार्यों में तेजी लाई जा रही है.
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वहीं, जिलाधिकारी प्रशांत आर्य ने निरीक्षण कर नदी तट सुरक्षा, बाधा बन रहे पेड़ों को हटाने और संवेदनशील क्षेत्रों की लगातार निगरानी के निर्देश दिए हैं. उन्होंने कहा कि लोगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है. सभी विभाग कॉर्डिनेशन के साथ काम कर रहे हैं.
नीचे देखिए पिछले साल बनी झील का वीडियो
मानसून सामान्य से कम लेकिन तीव्र बारिश के बाद बाढ को नहीं नकार सकते
मौसम विभाग के निदेशक डॉ. सीएस तोमर ने कहा कि इस वर्ष मानसून सामान्य से थोड़ा कमजोर रहने की संभावना है. कुल बारिश सामान्य का लगभग 90–92 प्रतिशत रहने का अनुमान है. हालांकि, अधिक तेज बारिश की घटनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता, जिसके कारण नदियों और बरसाती नालों का जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है. ऐसे में लोगों और प्रशासन को सतर्क रहने की आवश्यकता है.
धराली में झील बनने की आशंका
वरिष्ठ जियोलॉजिस्ट डॉ. एमपीएस बिष्ट ने कहा कि धराली में दोबारा बनने से मना नहीं कर सकते. वास्तव में हमारे पहाड़ों की ऐसी स्थिति सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि कई जगह है. पहाड़ों से आने वाले छोटे-छोटे चैनल अपने साथ भारी मात्रा में मलबा लाकर मुख्य नदी में जमा करते हैं. इससे अल्लुवियल फैन बनते हैं.
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अलकनंदा, भागीरथी, काली गंगा और यमुना जैसी सभी नदियों के दोनों किनारों पर छोटी-छोटी सहायक नदियां (ट्रिब्यूटरी) अपने साथ काफी मलबा लेकर आती हैं और ऐसे फैन बनाती हैं. बाद में लोगों ने इन्हीं जगहों पर बसावट कर ली. लोगों को लगा कि नदी किनारे समतल जमीन बन गई है, इसलिए वहां घर बना लिए गए. लेकिन इसके नकारात्मक पहलुओं पर ध्यान नहीं दिया गया.
उन्होंने कहा कि धराली में यह घटना पहली बार नहीं हुई है. पहले भी कई बार ऐसी स्थिति बन चुकी है. भविष्य में भी दोबारा बन सकती है. ऊपर ग्लेशियर क्षेत्र में जो मलबा जमा है, वह बारिश बढ़ने पर फिर नीचे आएगा. जैसे ही उसकी गति कम होगी, वह मुख्य धारा में जमा हो जाएगा.
उन्होंने कहा कि इससे भागीरथी नदी में बॉटलनेक जैसी स्थिति बन जाती है. जब नदी का रास्ता संकरा हो जाता है तो पानी का बहाव रुकता है, भंवर बनते हैं और धीरे-धीरे बड़ी झील बनने लगती है.
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डॉ. बिष्ट ने कहा कि शासन को उन सभी बॉटलनेक पॉइंट्स पर विशेष निगरानी रखनी चाहिए, जहां छोटी-छोटी सहायक नदियां मुख्य नदी से मिलती हैं.धराली क्षेत्र को पूरी तरह साफ कर देना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. थोड़ा-बहुत काम करने के बाद उसे उसी हालत में छोड़ दिया गया.
उन्होंने कहा कि बारिश होगी, मलबा आएगा और वहां फिर से बांध जैसी स्थिति बन जाएगी. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले झाला क्षेत्र में करीब 14 किलोमीटर लंबी झील बन गई थी, जिसमें तीन गांव समा गए थे. भविष्य में भी ऐसी आपदा की स्थिति बन सकती है.
अंकित शर्मा