एशिया में चावल की खेती को अब और आसानी से समझा जा सकेगा. नासा और IBM के AI मॉडल की मदद से वैज्ञानिकों ने पूरे मॉनसून एशिया में चावल की खेती का एक नया मैप बनाया है. इसमें 30 मीटर तक की बारीकी से पता लगाया जा सकता है कि किस जगह धान की खेती हो रही है. यह मैप 2018 से 2023 के सैटेलाइट डेटा की मदद से तैयार किया गया है.
यह जानकारी इसलिए जरूरी है क्योंकि एशिया दुनिया में चावल की खेती का सबसे बड़ा इलाका है. यहां बहुत बड़े पैमाने पर धान उगाया जाता है. धान की खेती में काफी पानी लगता है और इसके खेतों से मीथेन गैस भी निकलती है. ऐसे में यह पता होना जरूरी है कि धान कहां और कितने इलाके में उगाया जा रहा है.
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AI ने कैसे बनाया यह मैप?
वैज्ञानिकों ने नासा और IBM के पृथ्वी AI मॉडल की मदद ली. इसमें सैटेलाइट से मिली तस्वीरों का इस्तेमाल किया गया. Landsat और Sentinel-2 सैटेलाइट से मिले डेटा की मदद से अलग-अलग जगहों पर धान के खेतों की पहचान की गई.
इस मैप में 30 मीटर तक की बारीकी है. आसान भाषा में कहें तो यह जमीन के छोटे हिस्सों में भी धान की खेती पहचानने में मदद करता है. रिसर्च के मुताबिक, मैप ने औसतन करीब 84% सटीक नतीजे दिए. अलग-अलग इलाकों में इसकी सटीकता करीब 83% से 90% तक रही.
पहले पूरे एशिया में छोटे-छोटे खेतों की सही जानकारी जुटाना आसान नहीं था. खासकर उन जगहों पर जहां खेत बहुत पास-पास होते हैं. AI और सैटेलाइट की मदद से अब यह काम ज्यादा तेजी से किया जा सकता है.
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धान की खेती में इतना पानी क्यों लगता है?
धान की खेती में दूसरी कई फसलों के मुकाबले ज्यादा पानी की जरूरत होती है. खेती के दौरान खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है. एक पुराने वैश्विक अनुमान के मुताबिक, दुनिया में इंसानों की ओर से इस्तेमाल किए जाने वाले मीठे पानी का करीब 24 से 30% हिस्सा चावल की खेती में जाता है.
एशिया में यह बात और अहम हो जाती है क्योंकि दुनिया का ज्यादातर चावल इसी इलाके में पैदा होता है. नया मैप यह समझने में मदद कर सकता है कि किस इलाके में चावल की खेती ज्यादा है और वहां पानी की जरूरत कितनी है.
धान के खेतों से निकलती है मीथेन
धान की खेती का असर सिर्फ पानी तक सीमित नहीं है. खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहने से मीथेन गैस बनती है. यह एक ऐसी गैस है जो धरती के बढ़ते तापमान में योगदान देती है. वैज्ञानिकों के अनुमान के मुताबिक, दुनिया में चावल के खेतों से हर साल करीब 32 टेराग्राम मीथेन निकलती है. इसका बड़ा हिस्सा एशिया से आता है.
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आगे कैसे काम आएगा यह मैप?
इस मैप से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि एशिया में धान कहां उगाया जा रहा है, कितने इलाके में उगाया जा रहा है और समय के साथ इसमें क्या बदलाव हो रहे हैं. इस जानकारी का इस्तेमाल आगे पानी की खपत और मीथेन उत्सर्जन का बेहतर अनुमान लगाने में किया जा सकता है.
इससे खेती और पर्यावरण से जुड़ी योजनाएं बनाने में भी मदद मिल सकती है. कुल मिलाकर, AI की मदद से तैयार यह मैप एशिया में चावल की खेती का ज्यादा साफ और बारीक डेटा देता है. इससे वैज्ञानिकों के लिए धान, पानी और मीथेन के बीच के संबंध को समझना पहले से आसान हो सकता है.
आजतक साइंस डेस्क