रोज खाने वाली अरहर दाल पर भारत में बड़ी वैज्ञानिक खोज, पहली बार तैयार हुआ पूरा जीनोम

अरहर दाल का पूरा 'जेनेटिक ब्लूप्रिंट' अब वैज्ञानिकों के हाथ में है. भारत की यह बड़ी उपलब्धि भविष्य में ज्यादा पैदावार, कम बीमारियां और बेहतर क्वालिटी वाली दाल विकसित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है.

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अरहर दाल का पूरा जेनेटिक नक्शा अब भारतीय वैज्ञानिकों के पास मौजूद है. (Photo: Getty) अरहर दाल का पूरा जेनेटिक नक्शा अब भारतीय वैज्ञानिकों के पास मौजूद है. (Photo: Getty)

रदीफा कबीर

  • नई दिल्ली,
  • 06 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 5:38 PM IST

भारत में शायद ही कोई घर होगा, जहां अरहर की दाल नहीं बनती हो. अब यही दाल एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि की वजह बनी है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिकों ने पहली बार अरहर दाल का पूरा जीनोम तैयार कर लिया है. आसान भाषा में कहें तो उन्होंने अरहर का पूरा जेनेटिक नक्शा पढ़ लिया है. 

यह काम अप्रैल 2026 में पूरा हुआ. वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे आने वाले समय में ज्यादा पैदावार देने वाली, बीमारियों से बचने वाली और बदलते मौसम को झेलने वाली नई किस्में तैयार करना आसान होगा.

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अरहर भारत की सबसे जरूरी दलहनी फसलों में से एक है. देश में करोड़ों लोग प्रोटीन के लिए इस दाल पर निर्भर हैं. लेकिन इसकी पैदावार कई सालों से ज्यादा नहीं बढ़ी है. यही वजह है कि भारत को अपनी जरूरत पूरी करने के लिए हर साल दूसरे देशों से भी अरहर मंगानी पड़ती है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह नई खोज इस समस्या को कम करने में मदद कर सकती है.

जीनोम को आसान भाषा में समझें तो यह किसी भी पौधे का पूरा ब्लूप्रिंट या पूरी जानकारी की किताब होती है. इससे पता चलता है कि पौधा कैसे बढ़ेगा, उसकी पैदावार कितनी होगी और वह बीमारियों या खराब मौसम का सामना कैसे करेगा. अरहर के जीनोम में करीब 75 करोड़ DNA अक्षर और 11 क्रोमोसोम हैं. अब वैज्ञानिकों ने इसे बिना कोई हिस्सा छोड़े पूरा पढ़ लिया है.

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इस खोज में खास क्या है?

भारत ने 2011 में भी अरहर का जीनोम तैयार किया था, लेकिन वह पूरा नहीं था. इस बार वैज्ञानिकों ने जीनोम का कोई हिस्सा नहीं छोड़ा. उन्होंने सभी 11 क्रोमोसोम, 22 टेलोमियर और 36,557 जीन की पहचान कर ली है. इससे अब यह समझना आसान होगा कि कौन-सा जीन किस काम के लिए जिम्मेदार है.

किसानों को क्या फायदा होगा?

इस जानकारी की मदद से वैज्ञानिक जल्दी पता लगा सकेंगे कि कौन-सा जीन ज्यादा पैदावार देता है, कौन-सा बीमारी से बचाता है और कौन-सा सूखे जैसे हालात में भी फसल को बचा सकता है. इससे नई किस्में पहले के मुकाबले जल्दी तैयार की जा सकेंगी. ऐसी अरहर भी विकसित की जा सकती है जो जल्दी पक जाए और मशीन से आसानी से कट सके.

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क्या दाल सस्ती होगी?

इसका असर अभी तुरंत नहीं दिखेगा. नई किस्में तैयार होने और किसानों तक पहुंचने में अभी कुछ साल लगेंगे. लेकिन अगर पैदावार बढ़ती है तो भविष्य में दाल की कमी कम हो सकती है और आयात पर निर्भरता भी घट सकती है. भारत हर साल करीब 40 लाख टन अरहर पैदा करता है, लेकिन मांग पूरी करने के लिए आयात भी करना पड़ता है. सरकार 2030-31 तक दलहन उत्पादन को करीब 3.5 करोड़ टन तक पहुंचाना चाहती है. यह खोज उस दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है.

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यह खोज आज आपकी थाली में दाल नहीं बदलेगी, लेकिन आने वाले समय में बेहतर, ज्यादा पैदावार देने वाली और मजबूत अरहर की किस्में बनाने में बड़ी मदद करेगी. इसका फायदा किसानों के साथ-साथ आम लोगों को भी मिल सकता है.

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