भारतीय सेना चीन और पाकिस्तान से सटी सीमाओं पर अपनी वॉर पावर बनाए रखने के लिए बड़ा कदम उठा रही है. रक्षा मंत्रालय ने 2715 लॉजिस्टिक्स ड्रोन खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. यह भारतीय सेना के लिए आपूर्ति मिशनों के लिए ड्रोन की अब तक की सबसे बड़ी प्रस्तावित खरीद होगी.
मंत्रालय ने इंडस्ट्री से जानकारी मांगने के लिए आरएफआई जारी किया है. इन ड्रोनों से दूर-दराज के सीमा चौकियों पर तैनात सैनिकों तक राशन, गोला-बारूद, चिकित्सा सामग्री और अन्य जरूरी सामान पहुंचाया जा सकेगा.
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तीन ऊंचाई कैटेगरी में काम करने वाले ड्रोन
प्रस्तावित बेड़ा तीन अलग-अलग ऊंचाई कैटेगरी में काम करेगा- 6000 फीट तक, 6000 से 12000 फीट और 12000 से 20000 फीट तक. इससे मैदानी इलाकों से लेकर चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) और पाकिस्तान के साथ नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर ऊंचे पहाड़ी पोस्ट तक संचालन आसान होगा.
गलवान संघर्ष 2020 के बाद से सेना एलएसी के ऊंचे इलाकों में बड़ी संख्या में तैनात है. वहां ऊंचाई वाली रसद व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रही है. ये ड्रोन उसी दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे. यह योजना सेना की स्वायत्त रसद व्यवस्था पर बढ़ते जोर को दर्शाती है. अब सैनिकों, कुलियों और खच्चरों पर निर्भरता कम होगी.
संघर्ष की स्थिति में रसद मार्ग अक्सर दुश्मन की निगरानी और गोलाबारी का पहला निशाना बनते हैं. ड्रोन आधारित आपूर्ति से सैनिकों को बिना जोखिम के जरूरी सामग्री मिल सकेगी.
कठिन इलाके या बाधित मार्गों पर भी अलग-थलग पड़े पोस्ट को बनाए रखा जा सकेगा. दुनिया भर के हालिया संघर्षों ने साबित किया है कि लॉजिस्टिक्स ड्रोन युद्ध के मैदान पर सहनशक्ति और प्रतिक्रिया क्षमता को काफी बढ़ा देते हैं.
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ऊंचाई वाले अभियानों के लिए विशेष डिजाइन
आरएफआई के अनुसार हर ड्रोन सिस्टम में बिना चालक विमान, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन, रिमोट वीडियो टर्मिनल, दिन और थर्मल इमेजिंग कैमरे, जीपीएस, नेविगेशन सिस्टम और लीडार जैसी बाधा से बचने वाली तकनीक शामिल होगी. सेना चाहती है कि ये ड्रोन ऑटोनॉमस, मैन्युअल और रिटर्न-टू-होम मोड में काम कर सकें.
साथ ही बिना तैयार सतह पर उड़ान भरने और उतरने में सक्षम हों क्योंकि हिमालयी पोस्ट पर लैंडिंग जोन नहीं होते. तापमान माइनस 30 डिग्री से लेकर 50 डिग्री तक झेलने वाले ये ड्रोन कम से कम सात साल तक चलेंगे, एक हजार से ज्यादा लैंडिंग सह सकेंगे और ऊंचाई के अनुसार 10 से 20 किलोमीटर तक मिशन रेंज रखेंगे.
कॉम्पीटीटिव माहौल में बचने के लिए एंटी-जैमिंग, एंटी-स्पूफिंग क्षमता और आईएफएफ सुविधा भी मांगी गई है ताकि भारतीय वायु रक्षा प्रणालियां इन्हें दुश्मन का विमान न समझें.
यह प्रस्ताव पिछले कुछ वर्षों में सेना की लॉजिस्टिक्स ड्रोन आवश्यकताओं में तेज वृद्धि दिखाता है. 2022 में 570 ड्रोन के लिए आरएफआई जारी हुआ था, फिर 363 ड्रोन की फास्ट-ट्रैक खरीद हुई. 2025 में मध्यम व उच्च ऊंचाई वाले अभियानों पर केंद्रित एक और आरएफआई आया.
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अब 2715 ड्रोन की मांग सेना के रसद सिद्धांत में बड़े बदलाव का संकेत है. बिना चालक हवाई आपूर्ति अब सिर्फ सहायक व्यवस्था नहीं बल्कि उत्तरी सीमाओं पर सैनिकों को बनाए रखने की मुख्य क्षमता बनने जा रही है.
यह कदम सेना को आधुनिक, तेज और सुरक्षित रसद प्रणाली देने की दिशा में महत्वपूर्ण है. ऊंचे पहाड़ों में तैनात जवानों के लिए यह जीवन रेखा साबित हो सकता है. सीमा सुरक्षा को और मजबूत बनाएगा.
शिवानी शर्मा