80s की फोटो के लिए AI पर बढ़ी भीड़, सर्वर से लेकर पानी तक क्या है इसका असर?

80s का रेट्रो लुक पाने के लिए लोग धड़ाधड़ AI से तस्वीरें बना रहे हैं. लेकिन हर तस्वीर के पीछे AI सर्वर लगातार काम कर रहे हैं. बढ़ती तस्वीरों के साथ कम्प्यूटिंग, बिजली और कूलिंग की जरूरत भी बढ़ती है, जिसका असर पानी की खपत पर भी पड़ सकता है.

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80 के दशक का लुक पाने के लिए लोग इस समय AI टूल का सहारा ले रहे हैं. (Photo: ITG) 80 के दशक का लुक पाने के लिए लोग इस समय AI टूल का सहारा ले रहे हैं. (Photo: ITG)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 10 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:06 PM IST

इंस्टाग्राम पर इन दिनों 80s लुक वाली AI तस्वीरों का ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है. लोग अपनी सामान्य फोटो को AI की मदद से 1980 के दशक के कपड़े, हेयरस्टाइल, बैकग्राउंड और पुराने कैमरे जैसा लुक दे रहे हैं. इसके लिए फोटो AI टूल में डालनी होती है और कुछ ही समय में उसका नया वर्जन तैयार हो जाता है.

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लोगों के लिए यह काम भले ही कुछ सेकंड का है, लेकिन फोटो बनाने के पीछे AI सिस्टम को काफी काम करना पड़ता है. जब एक साथ बहुत सारे लोग ऐसी तस्वीरें बनाने लगते हैं, तो AI को ज्यादा फोटो बनाने की रिक्वेस्ट मिलती हैं. इन्हें पूरा करने के लिए डेटा सेंटर में लगे जीपीयू और सर्वर को ज्यादा काम करना पड़ता है. इससे बिजली का इस्तेमाल होता है. सर्वर गर्म भी होते हैं.

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AI से फोटो बनती कैसे है?

AI से 80s वाली फोटो बनाना सिर्फ किसी फोटो पर फिल्टर लगाने जैसा नहीं है. AI आपकी फोटो और दिए गए प्रॉम्प्ट को समझकर एक नई इमेज तैयार करता है. इसके लिए AI सर्वर पर कई तरह की कैलकुलेशन होती हैं. 

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एक रिसर्च में अलग-अलग AI इमेज-जनरेशन मॉडल की एनर्जी यूज को देखा गया. इसमें एक AI इमेज बनाने में औसतन करीब 2.9 Wh बिजली लगने का अनुमान मिला. हालांकि हर AI मॉडल में यह जरूरत अलग हो सकती है. 

अब अगर कोई व्यक्ति एक ही फोटो बनाकर रुक जाए तो इस्तेमाल होने वाली एनर्जी कम होगी. लेकिन ट्रेंड में लोग अक्सर कई तस्वीरें बनाते हैं. पहली फोटो पसंद नहीं आई तो फिर से जनरेट करते हैं, प्रॉम्प्ट बदलते हैं या अलग लुक आजमाते हैं. इससे AI को बार-बार नई इमेज बनाने का काम करना पड़ता है.

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ज्यादा काम करेंगे तो सर्वर गर्म होंगे

AI की फोटो बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले जीपीयू और दूसरे कंप्यूटर चिप लगातार काम करते हैं. काम करने के दौरान इनमें गर्मी पैदा होती है. इसलिए डेटा सेंटर में सर्वर को ठंडा रखना जरूरी होता है. इसके लिए अलग-अलग कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं. कौन सा सिस्टम इस्तेमाल होगा, यह डेटा सेंटर की जगह और उसकी टेक्नोलॉजी पर निर्भर करता है.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, दुनिया भर के डेटा सेंटर ने 2024 में करीब 460 TWh बिजली इस्तेमाल की. अनुमान है कि 2030 तक यह खपत करीब 945 TWh हो सकती है. AI का बढ़ता इस्तेमाल इस बढ़ोतरी की बड़ी वजहों में शामिल है.

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यह आंकड़ा सिर्फ 80s वाली AI फोटो का नहीं है. इसमें दुनिया भर के डेटा सेंटर में होने वाला अलग-अलग तरह का काम शामिल है. इससे यह जरूर समझ आता है कि AI का इस्तेमाल बढ़ने पर डेटा सेंटर पर काम और बिजली की जरूरत भी बढ़ती है.

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सर्वर को ठंडा करने में पानी क्यों लगता है?

कुछ डेटा सेंटर में सर्वर से निकलने वाली गर्मी को कम करने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे कूलिंग सिस्टम में पानी गर्मी को बाहर निकालने में मदद करता है. कुछ सिस्टम में पानी का एक हिस्सा भाप बनकर भी बाहर चला जाता है. हालांकि हर डेटा सेंटर में पानी का इस्तेमाल एक जैसा नहीं होता. 

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जगह, मौसम और कूलिंग सिस्टम के हिसाब से पानी की खपत बदल सकती है. अमेरिका के लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में अमेरिकी डेटा सेंटर में औसतन करीब 0.36 लीटर पानी प्रति kWh IT एनर्जी की साइट वॉटर कंजम्पशन थी. यह पूरे डेटा सेंटर सेक्टर का औसत आंकड़ा है

तो 80s ट्रेंड का पानी पर कितना असर?

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ज्यादा लोग AI से तस्वीरें बनाएंगे तो AI को ज्यादा रिक्वेस्ट मिलेंगी. ज्यादा रिक्वेस्ट का मतलब सर्वर को ज्यादा काम करना होगा. ज्यादा कंप्यूटिंग से ज्यादा बिजली की जरूरत होगी और सर्वर ज्यादा गर्म होंगे. इन्हें ठंडा रखने के लिए कूलिंग की जरूरत पड़ेगी. और जिन डेटा सेंटर में पानी वाली कूलिंग इस्तेमाल होती है, वहां पानी की जरूरत भी बढ़ सकती है.

यानी सोशल मीडिया पर दिख रही 80s वाली एक AI फोटो के पीछे सर्वर, बिजली और कूलिंग का पूरा सिस्टम काम कर रहा है. इस एक ट्रेंड की वजह से कितना पानी इस्तेमाल हुआ, यह अभी पता नहीं है. लेकिन AI से बनने वाली तस्वीरों की संख्या बढ़ने के साथ डेटा सेंटर पर कंप्यूटिंग और कूलिंग का काम भी बढ़ता है.     रिपोर्टः साक्षी प्रजापति

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