Shri Krishna Janmashtami 2026: बांके बिहारी मंदिर में बार-बार पर्दा क्यों लगाया जाता है? जानें कारण

Shri Krishna Janmashtami 2026: विश्व प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर, वृंदावन में अन्य मंदिरों की तरह निरंतर दर्शन नहीं होते, बल्कि हर दो-तीन मिनट में प्रभु के आगे पर्दा खींचा जाता है. लेकिन, इसके पीछे क्या कारण है. आइए जानते हैं.

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बांके बिहारी जी (Photo: ITG) बांके बिहारी जी (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 3:11 PM IST

Shri Krishna Janmashtami 2026: उत्तर प्रदेश के पावन धाम वृंदावन में स्थित बांके बिहारी मंदिर की महिमा अद्भुत और असीम है. दुनिया भर के मंदिरों में जहां श्रद्धालु अपने प्रभु को जी भरकर निहारते हैं, वहीं बांके बिहारी मंदिर में एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है जो इसे दुनिया के अन्य सभी मंदिरों से बिल्कुल अलग और अनोखा बनाती है. यह परंपरा है- 'झांकी दर्शन' या पर्दा प्रथा.

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यहां भक्तों को भगवान के निरंतर दर्शन नहीं करने दिए जाते. हर दो से तीन मिनट के अंतराल पर मंदिर के सेवक (गोस्वामी जी) प्रभु के सम्मुख एक भारी मखमली पर्दा खींच देते हैं और फिर कुछ ही पलों बाद उसे हटा देते हैं. पहली बार आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह थोड़ा कौतूहल भरा हो सकता है, लेकिन इस प्रथा के पीछे की मान्यता इतनी अलौकिक है कि जानकर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं.

क्यों लगाया जाता है बांके बिहारी जी के आगे बार-बार पर्दा?

धार्मिक मान्यताओं और ब्रज की परंपरा के अनुसार, बांके बिहारी जी की आंखें अत्यंत नशीली, दिव्य और प्रचंड वशीकरण की शक्ति से परिपूर्ण हैं. कहा जाता है कि यदि कोई निष्कपट भाव और पूरी तन्मयता से ठाकुर जी की आंखों में आंखें डालकर देख ले, तो बिहारी जी उस भक्त के भक्ति-भाव के इतने वशीभूत हो जाते हैं कि अपना दिव्य सिंहासन छोड़कर उसके पीछे-पीछे ही चल देते हैं. इसी आलौकिक प्रेम-बंध को बनाए रखने और बिहारी जी को वृंदावन में ही रोके रखने के लिए यह पर्दा प्रथा शुरू की गई थी.

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जब वृद्ध भक्त के पीछे मंदिर छोड़ चले थे बिहारी जी

इस परंपरा के पीछे एक अत्यंत भावुक और प्राचीन कथा प्रचलित है. वर्षों पहले एक वृद्ध भक्त बांके बिहारी जी के दर्शनों के लिए मंदिर आया. वह प्रभु की मनमोहक छटा में ऐसा लीन हुआ कि बिना पलक झपकाए टकटकी लगाकर उन्हें देखता ही रह गया. भक्त का प्रेम इतना निश्छल और गहरा था कि ठाकुर जी से भी रहा न गया. बिहारी जी अपने भक्त के प्रेम के वश में होकर उसकी उंगली थामे मंदिर की दहलीज पार कर गए और उसके साथ उसके गांव की ओर चल दिए.

जब मंदिर के सेवादारों ने देखा कि गर्भगृह से बिहारी जी की मूर्ति गायब है, तो हाहाकार मच गया. सेवादार तुरंत भक्त की खोज में भागे. काफी दूर जाने पर उन्होंने उस वृद्ध भक्त को देखा, जिसके पीछे स्वयं बांके बिहारी जी मुस्कुराते हुए चले जा रहे थे. सेवादारों ने बहुत प्रार्थना की, प्रभु के आगे अपने आंसुओं का अर्घ्य दिया और विनती की कि वे वापस मंदिर पधारें. भक्त के प्रेम और सेवादारों की प्रार्थना के बाद बिहारी जी पुनः मंदिर लौटने को तैयार हुए.

प्रेम युद्ध और मर्यादा का प्रतीक

इस ऐतिहासिक घटना के बाद ही मंदिर के प्रबुद्ध जनों और सेवादारों ने यह व्यवस्था बनाई कि अब से भगवान के दर्शन केवल चंद लम्हों के लिए 'झांकी' के रूप में ही होंगे. यह पर्दा सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच बहने वाले उस अगाध प्रेम-समुद्र पर लगाई गई मर्यादा की एक सीमा है. यह झांकी दर्शन इस बात का प्रमाण है कि सनातन परंपरा में ईश्वर केवल मूर्ति नहीं, बल्कि प्रेम के भूखे साक्षात चैतन्य रूप हैं, जो अपने भक्त के एक सच्चे भाव पर सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहते हैं.

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