नवरात्र का पावन पर्व चल रहा है. नवरात्र शब्द का अर्थ होता है नौ रातें. मां दुर्गा को समर्पित नवरात्र में पूरे नौ दिन तक देवी के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है. क्या आपने कभी सोचा है कि नवरात्र के महापर्व में 9 अंक को ही विशेष महत्व क्यों दिया गया है. मान्यता है कि नवरात्र के नौ दिन, देवी के नौ स्वरूप और नौ कन्याओं के पूजन की परंपरा शक्ति उपासना को विशिष्ट बनाती है. आइए इस दिव्य अंक के बारे में विस्तार से बताते हैं.
अंक ज्योतिष में नौ को मंगल का अंक माना जाता है, जो साहस, पराक्रम और ऊर्जा का प्रतीक है. दक्षिण दिशा को मंगल और दक्षिण-पूर्व दिशा यानी अग्नि कोण को शुक्र से संबंधित माना जाता है. देवी आराधना के संदर्भ में इन दोनों ग्रहों का संबंध शक्ति, स्त्रीत्व, सुख और समृद्धि के बीच संतुलन का संदेश देता है.
नौ अंक और मां दुर्गा का पराक्रम
मंगल की ऊर्जा मां दुर्गा के उस स्वरूप से मेल खाती है, जो अन्याय और अधर्म का नाश कर धर्म की स्थापना करता है. देवी के हाथों में मौजूद अस्त्र-शस्त्र साहस, आत्मरक्षा और बुरी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक माने जाते हैं. नवरात्र के नौ दिन साधक को अपने भीतर आत्मबल और दृढ़ संकल्प जगाने की प्रेरणा देते हैं. वहीं नौ कन्याओं का पूजन देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा के साथ बालिकाओं के सम्मान का संदेश भी देता है.
गणितीय दृष्टि से भी नौ अंक की एक रोचक विशेषता है. अंक नौ को किसी पूर्णांक से गुणा करने पर प्राप्त संख्या के अंकों का योग बार-बार नौ या नौ के गुणज तक पहुंचता है. उदाहरण के लिए 9×7=63 (6+3=9) या 9×3=27 (2+7=9). हालांकि, नवरात्र में नौ अंक की धार्मिक महत्ता का आधार मुख्य रूप से देवी के नौ स्वरूपों और उनसे जुड़ी उपासना परंपराओं में है.
हालांकि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा और महिषासुर के बीच युद्ध पूरे नौ दिन तक चला था. इसके बाद देवी ने दसवें दिन महिषासुर का वध कर दिया. इसलिए नवरात्र के बाद दसवें दिन विजयादशमी भी मनाई जाती है. कुछ ज्योतिषविद मानते हैं कि अंक 9 ब्रह्मांड के ग्रहों का प्रतिनिधित्व भी करता है. फिर हमारे नक्षत्र भी 27 हैं, जिन्हें जोड़ने (2+7=9) पर भी संख्या 9 ही मिलती है.
दक्षिण में मंगल और अग्नि कोण में शुक्र
मंगल ग्रह की दक्षिण दिशा साहस, दृढ़ता और पराक्रम को दर्शाती है. दक्षिण-पूर्व दिशा को अग्नि कोण कहा जाता है, जिसका मूल संबंध अग्नि तत्व से है. इस दिशा का संबंध शुक्र से है. शुक्र प्रेम, सौंदर्य, स्त्रीत्व, वैवाहिक सुख, कला और भौतिक वैभव का कारक है.
अग्नि कोण को ऊर्जा और सक्रियता से जुड़ा मानने के कारण इसे मां दुर्गा की आराधना के लिए उपयुक्त स्थान माना जाता है. देवी का स्वरूप भी ऊर्जा के इसी भाव को प्रकट करता है. वे एक ओर करुणा और ममता की प्रतीक हैं, तो दूसरी ओर अधर्म के विरुद्ध प्रचंड शक्ति का रूप धारण करती हैं.
शक्ति के साथ संवेदनशीलता भी जरूरी
मंगल और शुक्र का यह प्रतीकात्मक संगम जीवन के महत्वपूर्ण संतुलन की ओर संकेत करता है. मंगल लक्ष्य प्राप्त करने का साहस और बाधाओं से लड़ने की क्षमता देता है, जबकि शुक्र संबंधों में प्रेम, मधुरता और जीवन के सौंदर्य का महत्व समझाता है. केवल शक्ति होने से जीवन सुखमय नहीं बनता और केवल सुख-सुविधाएं होने से कठिनाइयों का सामना नहीं किया जा सकता. दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है.
मां दुर्गा की आराधना का संदेश भी यही है कि साहस के साथ करुणा, सामर्थ्य के साथ संवेदनशीलता और सफलता के साथ सदाचार बना रहे. नवरात्र में देवी के नौ स्वरूपों का पूजन व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्ति पहचानने और उसका उपयोग लोककल्याण के लिए करने की प्रेरणा देता है. इस तरह मंगल का पराक्रम और शुक्र का वैभव मिलकर शक्ति, सम्मान और समृद्ध जीवन की व्यापक अवधारणा प्रस्तुत करते हैं.
अंशु पारीक