Maa Mahagauri Vrat Katha: शारदीय नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है. इस दिन को दुर्गा अष्टमी या महाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. इस साल सप्तमी तिथि दो दिन पड़ने के कारण दुर्गा अष्टमी 19 अक्टूबर, सोमवार को मनाई जाएगी. मान्यता है कि मां महागौरी की पूजा करने से दुख-दर्द दूर होते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है. साथ ही, इस दिन व्रत कथा का पाठ करना भी बेहद शुभ माना जाता है. आइए जानते हैं मां महागौरी की संपूर्ण व्रत कथा…
मां महागौरी का स्वरूप
मां महागौरी को बेहद शांत, सौम्य और दिव्य स्वरूप वाली देवी माना जाता है. उनके वस्त्र और आभूषण भी सफेद रंग के होते हैं. इसी वजह से उन्हें श्वेतांबरधरा कहा जाता है. देवी की चार भुजाएं हैं. उनका वाहन वृषभ यानी बैल है. इसलिए उन्हें वृषारूढ़ा भी कहा जाता है. उनके एक दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और दूसरे में त्रिशूल रहता है. वहीं, बाएं हाथों में डमरू और वर मुद्रा दिखाई देती है.
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, मां महागौरी ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी. तप के कारण उनका शरीर सांवला पड़ गया था. देवी की साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गंगाजल से उनके शरीर को स्वच्छ किया, जिसके बाद उनका रंग अत्यंत उज्ज्वल हो गया. तभी से उन्हें महागौरी के नाम से जाना जाने लगा.
मां महागौरी की पहली व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए कठिन तप किया था. वह लंबे समय तक साधना में लीन रहीं. उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उनके शरीर का रंग बदल गया. काफी समय बीतने के बाद भगवान शिव देवी पार्वती को खोजते हुए उनके पास पहुंचे. वहां उन्होंने देवी का अद्भुत और उज्ज्वल रूप देखा. उनका रंग चांदनी और सफेद कुंद के फूल की तरह चमक रहा था. देवी के इस रूप को देखकर भगवान शिव प्रसन्न हुए. धार्मिक मान्यता है कि इसके बाद ही पार्वती को महागौरी के नाम से जाना जाने लगा.
मां महागौरी की दूसरी कथा
एक अन्य प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान शिव को पाने के लिए पार्वती ने वर्षों तक तपस्या की थी. लंबे समय तक धूप, वर्षा और कठिन परिस्थितियों में साधना करने के कारण उनका शरीर काला पड़ गया था.देवी की तपस्या पूरी होने पर भगवान शिव ने उन्हें स्वीकार किया और गंगाजल से उनके शरीर को धोया. इसके बाद उनका रंग पहले की तरह गौर हो गया. इसी घटना के बाद देवी का नाम गौरी पड़ा और उनके इस दिव्य स्वरूप को महागौरी कहा गया.
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