Krishna Janmashtami 2026: जन्माष्टमी का पर्व केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव ही नहीं है, बल्कि यह उनकी अद्भुत लीलाओं, गूढ़ संदेशों और दिव्य प्रेम को पुनः स्मरण करने का एक पावन अवसर है. भाद्रपद मास की कृष्णाष्टमी को जब कान्हा की मनमोहक छटा घर-घर में जीवंत हो उठती है, तब उनकी बाल-लीलाओं से लेकर उनके जीवन के अनेक अनछुए पहलू हमारे हृदय को आनंदित कर देते हैं.
श्रीकृष्ण का जीवन केवल महाभारत के युद्धक्षेत्र या श्रीमद्भागवत गीता के उपदेशों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी ऐसी कई कथाएं और लोकमान्यताएं भी हैं जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. जन्माष्टमी के इस शुभ अवसर पर, आइए प्रवेश करते हैं भगवान श्रीकृष्ण की उन्हीं अनोखी, रहस्यमयी और मर्मस्पर्शी पौराणिक कथाओं की दुनिया में.
कान्हा को लड़की की तरह क्यों सजाती थीं माता यशोदा?
शायद ही कोई ऐसा लड़का होगा जिसे बचपन में उसकी मां ने कभी लड़की की तरह तैयार न किया हो. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बच्चों को इस तरह सजाने के पीछे भी एक प्रचलित मान्यता जुड़ी हुई है, जिसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण से बताया जाता है?
कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और उन्हें माता यशोदा के पास पहुंचाया गया, तब कंस लगातार उन्हें मारने की कोशिश करता रहा. कंस ने कभी पूतना को भेजा तो कभी बकासुर और अन्य राक्षसों को. ऐसी नकारात्मक शक्तियों से अपने कान्हा की रक्षा करने के लिए माता यशोदा उन्हें कभी-कभी लड़की के रूप में सजाती थीं, ताकि कोई उन्हें पहचान न सके और उन्हें नुकसान न पहुंचा सके.
लोकमान्यता है कि इसी परंपरा के कारण आज भी कई जगहों पर छोटे बच्चों को बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाने के लिए लड़की की तरह सजाया जाता है. जिस तरह बच्चे को बुरी नजर से बचाने के लिए काला टीका लगाया जाता है, उसी तरह यह भी एक पारंपरिक मान्यता मानी जाती है.
श्रीकृष्ण बंदरों को माखन क्यों खिलाते थे?
आपने यह तो सुना ही होगा कि भगवान श्रीकृष्ण बचपन में माखन चुराते थे और उसे अपने दोस्तों के साथ मिल-बांटकर खाते थे. लेकिन कई कथाओं में यह भी कहा गया है कि कान्हा माखन बंदरों को भी खिलाया करते थे. लेकिन आखिर ऐसा क्यों?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को अपने पिछले अवतार यानी भगवान श्रीराम का स्मरण था. त्रेता युग में भगवान राम को माता सीता की खोज और रावण के विरुद्ध युद्ध में वानर सेना का साथ मिला था. वानरों ने भगवान राम की बहुत सहायता की थी. कहा जाता है कि इसी कारण श्रीकृष्ण वानरों के प्रति विशेष स्नेह रखते थे और उन्हें माखन खिलाते थे. इसे भगवान के विभिन्न अवतारों के बीच प्रेम, कृतज्ञता और संबंध की एक रोचक कथा के रूप में देखा जाता है.
जब श्रीकृष्ण समुद्र की गहराइयों में उतरे
आपने कालिया नाग की कहानी तो जरूर सुनी होगी, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण यमुना के जल में उतरकर कालिया नाग का सामना करते हैं. लेकिन एक प्रचलित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण एक अन्य अवसर पर भी समुद्र की गहराइयों में गए थे.
भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने उज्जैन में महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की थी. यहीं श्रीकृष्ण की मित्रता सुदामा से भी हुई थी. जब उनकी शिक्षा पूरी हुई तो श्रीकृष्ण अपने गुरु सांदीपनि के पास पहुंचे और उनसे गुरुदक्षिणा मांगने के लिए कहा. गुरु ने पहले तो कुछ भी मांगने से इनकार कर दिया, लेकिन श्रीकृष्ण के बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने अपने पुत्र को वापस लाने की इच्छा जताई.
कथा के अनुसार, उनका पुत्र समुद्र तट पर गया था और फिर लापता हो गया. श्रीकृष्ण ने समुद्र से उसके बारे में पूछा. इसके बाद वे समुद्र की गहराइयों में पहुंचे और वहां एक असुर से उनका सामना हुआ.
प्रचलित कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने उस असुर से युद्ध किया और गुरु सांदीपनि के पुत्र को वापस लाने का प्रयास किया. कुछ पौराणिक संस्करणों में इस कथा में पंचजन नामक असुर और यमलोक का भी उल्लेख मिलता है. अंततः श्रीकृष्ण अपने गुरु की इच्छा पूरी करते हैं और इसे उनकी गुरुदक्षिणा के रूप में देखा जाता है.
जब राधा ने श्रीकृष्ण के लिए अपने पैरों की धूल भेजी
एक बार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की बड़ी तैयारियां की गई थीं. चारों तरफ उत्सव का माहौल था. नाच-गाना हो रहा था, पकवान बनाए गए थे और बड़ी संख्या में लोग उत्सव में शामिल होने पहुंचे थे. किन उस दिन श्रीकृष्ण उत्सव में शामिल नहीं हुए.
माता रुक्मिणी उनके पास पहुंचीं और उनसे पूछा कि आखिर वे इतने उदास क्यों हैं और उत्सव में शामिल क्यों नहीं हो रहे हैं. श्रीकृष्ण ने कहा कि उनके सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है. कहा जाता है कि तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति जो उनसे सच्चा प्रेम करता है, अपने पैरों की धूल उनके सिर पर लगा दे, तो उनका दर्द ठीक हो सकता है.
यह सुनकर सभी लोग हैरान रह गए. रुक्मिणी और सत्यभामा ने कहा कि वे श्रीकृष्ण से बहुत प्रेम करती हैं, लेकिन अपने पैरों की धूल भगवान के सिर पर रखना उनके लिए संभव नहीं है. उन्हें लगा कि ऐसा करना भगवान का अपमान होगा. नारद मुनि भी इस काम के लिए तैयार नहीं हुए. उन्हें भय था कि भगवान के सिर पर अपने पैरों की धूल रखने से उन्हें पाप लगेगा. धीरे-धीरे यह बात वृंदावन पहुंच गई.
जब राधा रानी और गोपियों को पता चला कि श्रीकृष्ण के सिर में तेज दर्द है और उसके उपचार के लिए पैरों की धूल चाहिए, तो उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी चरण रज देने का निर्णय लिया.
एक प्रचलित कथा के अनुसार, राधा रानी ने अपनी साड़ी का पल्लू जमीन पर बिछाया और गोपियों से उस पर चलने या नृत्य करने को कहा, ताकि उस कपड़े पर उनके पैरों की धूल लग जाए. इसके बाद वह धूल भरा कपड़ा नारद मुनि को देते हुए बोलीं कि इसे लेकर जाएं और श्रीकृष्ण के सिर पर बांध दें. नारद मुनि वह कपड़ा लेकर श्रीकृष्ण के पास पहुंचे और जैसे ही उसे उनके सिर पर रखा गया, उनका दर्द दूर हो गया. तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि सच्चे प्रेम में भय, स्वार्थ और अपने परिणाम की चिंता नहीं होती.
राधा रानी और गोपियों को इस बात की चिंता नहीं थी कि उन्हें इसके बदले क्या मिलेगा या क्या दंड भुगतना पड़ेगा. उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण केवल श्रीकृष्ण का सुख था. इसलिए इस कथा को निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है.
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