सहारनपुर की मिट्टी अब कुम्हारों के लिए खुशहाली और आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही है. कभी ऐसा समय था, जब मिट्टी के बर्तनों की मांग कम होने से इनका कारोबार बंद होने की कगार पर पहुंच गया था. लोग मिट्टी के बर्तनों को छोड़कर स्टील और पीतल के बर्तनों की ओर बढ़ने लगे थे. ऐसे में कुम्हारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया था और उन्हें मिट्टी के काम के साथ दूसरे काम भी करने पड़ते थे. लेकिन अब तस्वीर बदल रही है. त्योहारों पर बढ़ती मांग और आधुनिक मशीनों की मदद से मिट्टी का कारोबार एक बार फिर रफ्तार पकड़ रहा है. सहारनपुर के रहने वाले दीपक प्रजापति ने भी इसी कारोबार को अपनी आजीविका का जरिया बनाया है. वह पहले दूसरे काम करते थे. लेकिन अब मिट्टी के बर्तन बनाकर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं.
करवा चौथ का पर्व नजदीक आते ही दीपक प्रजापति के यहां काम ने रफ्तार पकड़ ली है. उनके परिवार के तीन सदस्य दिन-रात मिट्टी के बर्तन तैयार करने में जुटे हैं. इस समय करवा चौथ पर इस्तेमाल होने वाले करवे, उनकी कटोरियां और मिट्टी के दूसरे बर्तन बनाए जा रहे हैं. करवे भी कई तरह के तैयार किए जा रहे हैं, जिनमें साधारण लाल रंग के पेंट किए हुए और खास डिजाइन वाले करवे शामिल हैं. दीपक बताते हैं कि करवे की कीमत डिजाइन और कारीगरी के हिसाब से 20 रुपये से लेकर 50 रुपये तक है. इस बार उनके पास करीब 40 हजार करवे बनाने के ऑर्डर हैं. मांग इतनी ज्यादा है कि परिवार के तीनों सदस्य लगातार काम करने के बावजूद ऑर्डर पूरे करने में जुटे हैं.
12 महीने लोगों को मिल रहा रोजगार
दीपक प्रजापति के मुताबिक, पहले मिट्टी के बर्तन बनाने का काम केवल दीपावली तक सीमित रहता था. त्योहार खत्म होते ही काम बंद करना पड़ता था और परिवार चलाने के लिए दूसरे काम तलाशने पड़ते थे. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की मदद से कम समय में ज्यादा बर्तन तैयार हो रहे हैं. पहले जिन कामों में काफी समय लगता था, वे अब मशीनों की सहायता से तेजी से पूरे हो जाते हैं. दीपक का कहना है कि मिट्टी के काम को बढ़ावा मिलने और संसाधन उपलब्ध होने से कारोबार को नई दिशा मिली है. अब उनका परिवार साल के 12 महीने इसी काम से रोजगार हासिल कर रहा है और किसी दूसरे के यहां नौकरी करने की जरूरत नहीं पड़ती है.
लाखों दीपक तैयार करने के ऑर्डर
सहारनपुर में तैयार होने वाले मिट्टी के करवे और दूसरे बर्तन अब स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं हैं. हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, अंबाला, यमुनानगर, चंडीगढ़ और दिल्ली समेत कई क्षेत्रों से इनके ऑर्डर मिल रहे हैं. दीपक बताते हैं कि उनका परिवार हर साल करीब 30 से 35 हजार करवे और तीन से चार लाख दीपक तैयार करता है.
उन्होंने बताया कि पूजा-पाठ में मिट्टी के बर्तनों के महत्व को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है, जिससे मांग में इजाफा हुआ है. सहारनपुर की मिट्टी और कारीगरों की मेहनत ने इस पारंपरिक कारोबार को नई पहचान दी है. कभी जिस काम को छोड़ने की नौबत आ गई थी, आज वही काम दीपक प्रजापति के परिवार की आत्मनिर्भरता और खुशहाल जीवन का आधार बन गया है.
राहुल कुमार