सुबह स्कूल की घंटी बजने से पहले मनियां के रेलवे ट्रैक के दोनों ओर कुछ लोग खड़े हो जाते हैं. उनकी नजर बच्चों पर नहीं, दूर से आती ट्रेन पर होती है. जैसे ही रेल दिखाई देती है, छोटे-छोटे कदम थम जाते हैं. ट्रेन गुजरने के बाद ही बच्चों को पटरियां पार कराई जाती हैं. यह किसी एक दिन की बात नहीं, बल्कि रोज की जिंदगी है.
दरअसल, राजस्थान के धौलपुर जिले के मनियां कस्बे में दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रैक के दूसरी तरफ करीब तीन दर्जन से अधिक गांव बसे हैं. इस तरफ मनियां कस्बा है, जहां पांच सरकारी और करीब एक दर्जन से अधिक निजी स्कूल संचालित होते हैं. मांगरोल रोड की ओर रहने वाले ग्रामीणों और स्कूली बच्चों को कस्बे तक पहुंचने के लिए रेलवे ट्रैक के आसपास से होकर गुजरना पड़ता है.
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बच्चों के लिए यह रास्ता सबसे ज्यादा जोखिम भरा है. छोटे बच्चों को उनके माता-पिता स्कूल छोड़ने और लेने आते हैं, जबकि बड़े बच्चे खुद ही इस खतरनाक रास्ते से गुजरते हैं. बच्चे बताते हैं कि पटरी पार करते समय उन्हें हमेशा डर लगा रहता है. कई बार ग्रामीण दोनों तरफ खड़े होकर ट्रेन देखते हैं और उसके बाद बच्चों को ट्रैक पार कराते हैं.
एक तरफ स्कूल, दूसरी तरफ घर... बीच में रेलवे ट्रैक
मनियां कस्बे में रहने वाले लोगों के लिए यह पटरी सिर्फ रेलवे लाइन नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी के बीच खड़ी एक बड़ी दीवार बन गई है. मांगरोल रोड की तरफ बसे गांवों से लोग बाजार, स्कूल, कॉलेज और दूसरे जरूरी कामों के लिए मनियां आते हैं. गांव और कस्बे के बीच की दूरी भले करीब दो किलोमीटर हो, लेकिन सुरक्षित रास्ता न होने से परेशानी कई गुना बढ़ जाती है.
इसी रास्ते की तरफ मुक्तिधाम भी बना हुआ है. किसी ग्रामीण की मृत्यु होने पर अंतिम संस्कार के लिए शव को वहां तक ले जाना पड़ता है. ग्रामीणों के मुताबिक, रेलवे ट्रैक पार करने के बजाय दूसरे रास्ते से जाने पर करीब दो से ढाई किलोमीटर अतिरिक्त चक्कर लगाना पड़ता है. ऐसे में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए यह दूरी और मुश्किल बन जाती है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले यहां रेलवे फाटक हुआ करता था. उस समय दोनों तरफ रहने वाले लोग आसानी से आ-जा सकते थे. बाद में रेलवे प्रशासन ने फाटक हटाकर रेलवे ओवरब्रिज यानी ROB बना दिया. लोगों को उम्मीद थी कि इससे आवागमन आसान होगा, लेकिन उनके मुताबिक समस्या खत्म होने के बजाय और बढ़ गई.
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ओवरब्रिज बना, लेकिन रास्ता सुरक्षित नहीं हुआ
ग्रामीणों का कहना है कि ROB तक पहुंचने के लिए बनी सीढ़ियों पर पर्याप्त रेलिंग नहीं है. इसके अलावा यहां बंदरों का आतंक भी रहता है. ऐसे में कई लोग सीढ़ियों के रास्ते ओवरब्रिज का इस्तेमाल करने से भी बचते हैं. लोगों का कहना है कि ओवरब्रिज बनने के बाद मनियां कस्बा मानो दो हिस्सों में बंट गया है.
मांगरोल रोड की तरफ बाल गोविंद का पुरा, लूला का पुरा, हेतराम का अड्डा, दूल्हारा, मिश्रिया का पुरा, मांगरोल, मौरेधा, बिचौला, खार का पुरा, लाडमपुर, जलालपुर, चपरोली और रण्डौली समेत कई गांव हैं. इन इलाकों के लोगों का रोजाना मनियां बाजार, स्कूल और कॉलेज आना-जाना रहता है. सुरक्षित रास्ते के अभाव में उनकी आवाजाही बुरी तरह प्रभावित है.
ग्रामीण बताते हैं कि बाजार तक पहुंचने के लिए कई लोगों को 5 से 6 किलोमीटर तक अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है. रोजमर्रा के सामान से लेकर बच्चों की पढ़ाई तक, हर जरूरत के लिए यह अतिरिक्त सफर परिवारों पर बोझ बन गया है. वहीं, जो लोग समय और दूरी बचाने के लिए रेलवे ट्रैक की ओर जाते हैं, उनके सामने हर पल हादसे का खतरा रहता है.
ट्रेन आती है तो थम जाती हैं सांसें
स्कूली बच्चों का कहना है कि जब वे पटरी पार करते हैं तो उनके मन में हमेशा डर रहता है. छोटे बच्चों के साथ उनके माता-पिता होते हैं, लेकिन बड़े विद्यार्थियों को कई बार अकेले ही रास्ता तय करना पड़ता है. ट्रेन आने की आहट मिलते ही वे रुक जाते हैं और सुरक्षित मौका मिलने का इंतजार करते हैं.
ग्रामीणों का दावा है कि रेलवे ट्रैक पार करते समय पहले भी कई लोग ट्रेन की चपेट में आ चुके हैं. इसके बावजूद अब तक स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है. लोगों का कहना है कि ROB मौजूद होने के बावजूद वह उनकी रोजमर्रा की जरूरत के मुताबिक सुरक्षित और सुविधाजनक रास्ता उपलब्ध नहीं करा पा रहा है.
कई बार ज्ञापन, फिर भी इंतजार खत्म नहीं हुआ
अंडरपास या सुरक्षित पुलिया बनवाने की मांग को लेकर मनियां और मांगरोल कस्बे के लोगों ने कई बार बैठकें की हैं. ग्रामीणों ने अधिकारियों को ज्ञापन भी दिए, लेकिन उनका कहना है कि अब तक समस्या का समाधान नहीं हुआ. लोगों की सबसे बड़ी चिंता बच्चों की सुरक्षा को लेकर है, जिन्हें रोजाना स्कूल जाने के लिए रेलवे ट्रैक के पास से गुजरना पड़ता है.
ग्रामीण और स्कूली बच्चे अब प्रधानमंत्री से अंडरपास बनवाने की मांग कर रहे हैं. उनका कहना है कि उन्हें ऐसा रास्ता चाहिए, जहां ट्रेन आने-जाने का डर न हो और बच्चे बिना किसी सहारे के सुरक्षित स्कूल पहुंच सकें. ग्रामीणों की मांग सिर्फ सुविधा की नहीं, बल्कि उस सुरक्षा की है जिसकी कमी उन्हें हर दिन महसूस होती है.
मनियां के लोगों के लिए सवाल सिर्फ दो किलोमीटर की दूरी का नहीं है. सवाल उन बच्चों का है जिनके स्कूल बैग में किताबों के साथ हर सुबह डर भी होता है. सवाल उन परिवारों का है जो बच्चों को लेने-छोड़ने के लिए मजबूर हैं. और सवाल उन गांवों का है जो एक सुरक्षित रास्ते के इंतजार में वर्षों से रेलवे ट्रैक के दोनों ओर बंटे हुए हैं.
उमेश मिश्रा