बाहुबल की जमीन पर जनहित की छत, योगी मॉडल से बदल रही UP की तस्वीर

योगी सरकार द्वारा अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी की जब्त जमीनों पर गरीबों के लिए ईडब्ल्यूएस आवास बनाना सिर्फ कब्जा हटाना नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय है. यह पहल अपराधियों के आर्थिक साम्राज्य को ध्वस्त कर आम नागरिकों में कानून के प्रति विश्वास जगाती है.

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अतीक-मुख्तार की जमीन पर गरीबों को मिले आशियाने (Photo-ITG) अतीक-मुख्तार की जमीन पर गरीबों को मिले आशियाने (Photo-ITG)

सुरेश बहादुर सिंह

  • लखनऊ,
  • 15 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:27 AM IST

न्याय का अर्थ केवल कब्जा हटाना नहीं, बल्कि उस जमीन को उसके वास्तविक सामाजिक उद्देश्य से जोड़ना भी है. माफिया की जमीन पर गरीबों को आवास देने की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल इसी धारणा को सार्वजनिक जीवन में स्थापित करने का प्रयास है.

लोकतंत्र में सत्ता की असली कसौटी यह नहीं कि उसके पास कितने अधिकार हैं, बल्कि यह है कि वह उन अधिकारों का इस्तेमाल समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के हित में कैसे करती है. जब किसी बाहुबली की हैसियत के आगे गरीब की जमीन, उसकी आजीविका और उसके परिवार का भविष्य असुरक्षित हो जाए, तब चुनौती सिर्फ अवैध कब्जे की नहीं रहती. तब कानून के राज की विश्वसनीयता दांव पर लग जाती है.

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ऐसे में न्याय का अर्थ केवल कब्जा हटाना नहीं, बल्कि उस जमीन को उसके वास्तविक सामाजिक उद्देश्य से जोड़ना भी है. माफिया की जमीन पर गरीबों को आवास देने की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पहल इसी धारणा को सार्वजनिक जीवन में स्थापित करने का प्रयास है.

यह जमीन के उपयोग में बदलाव भर नहीं है. यह शासन की प्राथमिकताओं और राज्य की शक्ति के उद्देश्य को लेकर दिया गया स्पष्ट संकेत है. प्रयागराज के लूकरगंज में माफिया अतीक अहमद से जुड़ी जमीन पर 76 फ्लैट बने. लखनऊ के डालीबाग में माफिया मुख्तार अंसारी से जुड़ी जमीन पर 72 ईडब्ल्यूएस फ्लैट तैयार हुए.

अब प्रयागराज के कसारी-मसारी में अतीक की जमीन पर 602 आवासों की परियोजना प्रस्तावित है, जिसके पद्मलोक अपार्टमेंट का भूमि पूजन 15 अक्टूबर को होना है. इन सबके केंद्र में एक ही संदेश है: जिस जमीन पर कभी बाहुबल और अवैध कब्जे का साया था, वहां अब गरीब परिवारों को छत मिलेगी. गरीब के लिए जमीन मिट्टी का टुकड़ा नहीं, परिवार की सुरक्षा, बच्चों का भविष्य और जीवन भर की कमाई का आधार होती है. जब कोई दबंग अपने भय और रसूख के सहारे यह आधार छीन लेता है, तब चोट एक व्यक्ति के अधिकार पर ही नहीं, पूरी व्यवस्था की साख पर पड़ती है.

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने व्यवस्था की साख लौटाने के लिए ही माफिया की जड़ पर प्रहार करने की सोच को आगे बढ़ाया है. लूकरगंज में अतीक अहमद के कब्जे से मुक्त कराई गई जमीन पर प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने फ्लैटों की चाबियां जून 2023 में लाभार्थियों को सौंपी गईं. इसी तरह नवंबर 2025 में डालीबाग (लखनऊ) के 72 फ्लैटों के आवंटन पत्र आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को दिए गए. दो परियोजनाओं में 148 परिवारों को घर मिले. इन अवसरों पर मुख्यमंत्री का संदेश साफ था कि सार्वजनिक या गरीबों की जमीन पर कब्जा करने वालों को शासन में कोई संरक्षण नहीं मिलेगा,और ऐसी जमीन का उपयोग जनकल्याण के लिए होगा.

कवच नहीं बन सकता धनबल-बाहुबल

इस पहल का पहला संदेश यह है कि कानून के सामने बाहुबल, धनबल या राजनीतिक प्रभाव सुरक्षा कवच नहीं बन सकता. उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का कानून-व्यवस्था संबंधी नैरेटिव इसी बिंदु से आकार लेता है. सरकार ने संगठित अपराध और माफिया नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई को शीर्ष प्राथमिकताओं में रखा है और आंकड़े इसकी गवाही देते हैं. राज्य स्तर पर चिह्नित 68 माफिया और उनके गैंग के सदस्यों-सहयोगियों में 1,494 के विरुद्ध 909 अभियोग दर्ज किए गए और 651 की गिरफ्तारी हुई. 18 के विरुद्ध राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) और 802 के विरुद्ध गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की गई. अपराध के सहारे अवैध रूप से अर्जित 4,309  करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की गई है. ठोसअदालती पैरवी का नतीजा यह रहा कि 36 माफिया और 104 संगठित अपराधियों को आजीवन कारावास तथा 2 अभियुक्तों को मृत्युदंड की सजा दिलाई गई.

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ये आंकड़े बताते हैं कि इस दृष्टिकोण में कार्रवाई का अर्थ गिरफ्तारी और मुकदमों तक सीमित नहीं, बल्कि अपराध से अर्जित संपत्ति और उसके सहारे कायम प्रभाव को भी चुनौती देना है. जमीन पर कब्जा आपराधिक नेटवर्क की आर्थिक ताकत का स्रोत होता है. जब ऐसी संपत्ति वैधानिक प्रक्रिया से मुक्त कराई जाती है, तो चोट उसी आर्थिक आधार पर पड़ती है, जिसके सहारे दबंगई और भय का माहौल टिका रहता है. पर इस कार्रवाई का सबसे अहम पहलू माफिया की संपत्ति का अंत नहीं, उसकी जगह जनहित की शुरुआत है. जमीन को कब्जे से छुड़ाकर सरकारी अभिलेखों में दर्ज कर देना एक प्रशासनिक कदम है. उसी जमीन पर किसी गरीब परिवार के लिए घर बनाना उस कदम को सामाजिक अर्थ देता है. एक तरफ वह भूखंड है, जिस पर कभी अवैध कब्जे का आरोप था, दूसरी तरफ उसी जगह एक परिवार अपने भविष्य की नींव रख रहा है. संदेश यह है कि सार्वजनिक संसाधनों का अंतिम उद्देश्य किसी प्रभावशाली की संपन्नता नहीं, नागरिकों का कल्याण होना चाहिए.

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बदलेंगी अगली पीढ़ी की संभावनाएं

इसीलिए इन परियोजनाओं को शहरी विकास की सामान्य योजनाओं की तरह नहीं देखा जा सकता. प्रधानमंत्री आवास योजना और ईडब्ल्यूएस प्रावधानों से जुड़कर ये सामाजिक न्याय के व्यापक विचार को सामने लाती हैं. गरीब के लिए घर केवल छत नहीं, सम्मान, स्थिरता और आत्मविश्वास का आधार है. किराये के असुरक्षित कमरे या अस्थायी ठिकाने में जीने वाले परिवार के लिए अपना घर अगली पीढ़ी की संभावनाएं बदल सकता है. जब यह घर उस जमीन पर मिलता है, जो कभी शक्तिशाली लोगों के कथित कब्जे से जुड़ी थी, तो न्याय की अनुभूति में एक प्रतीकात्मक आयाम भी जुड़ जाता है.

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इस प्रतीकात्मक पक्ष को समझना जरूरी है. राज्य में शासन की चुनौती सिर्फ अपराध रोकना नहीं, आम नागरिक के मन में सुरक्षा और न्याय का भरोसा जगाना भी है. व्यापारी चाहता है कि उसकी दुकान और कारोबार सुरक्षित रहें. किसान चाहता है कि कोई दबंग उसकी जमीन पर कब्जा न करे. महिला चाहती है कि सार्वजनिक स्थानों पर वह सुरक्षित रहे. गरीब चाहता है कि प्रशासन तक उसकी पहुंच किसी सिफारिश या रसूखदार की मध्यस्थता की मोहताज न हो. कानून-व्यवस्था का वास्तविक अर्थ इन्हीं अपेक्षाओं की पूर्ति में है. माफिया की जमीन पर बने घर इसी बड़े नैरेटिव का दृश्य रूप हैं, जहां कार्रवाई का नतीजा सरकारी बयानों में नहीं, उन घरों में दिखता है जिनमें परिवार रहने लगते हैं.

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इस पहल का एक आर्थिक पक्ष भी है. शहरों में जमीन सीमित और महंगी होती जा रही है, ऐसे में सरकारी जमीन का जनोपयोगी इस्तेमाल आवास, पार्क, स्वास्थ्य केंद्र या विद्यालय जैसी सुविधाओं का अवसर देता है. भूमि का मोल केवल बाजार भाव से नहीं, उससे मिलने वाले सामाजिक लाभ से भी तय होता है. यह भी संभव है कि भविष्य में हर मुक्त जमीन पर आवास न बने. स्थानीय जरूरत, नियोजन और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुरूप भी इसका इस्तेमाल हो सकता है. जहां गरीबों को घर की जरूरत है, वहां आवास प्राथमिकता हो सकता है,कहीं और सार्वजनिक सुविधाएं ज्यादा उपयोगी साबित हो सकती हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की इस पहल का केंद्रीय संदेश यही है कि शासन की शक्ति भय को संरक्षण देने के लिए नहीं, भय से मुक्ति दिलाने के लिए होनी चाहिए. माफिया के कब्जे से मुक्त जमीन पर गरीब का घर इस विचार का मूर्त प्रतीक है.
 

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