खबरों की सुर्खियां बता रही हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो ईरान से पीस डील करना चाहते हैं, लेकिन ये इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हैं जो अमन के दुश्मन बन गए हैं. पिछले एक महीने में ऐसा कई बार हुआ, जब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की सुगबुगाहट होती है, और तभी खबर आती है कि इजरायल ने ईरान या लेबनान पर बमबारी कर दी.
इस पेंचीदगी को समझने के लिए ईरान के साथ ‘पीस’ को लेकर अमेरिकी और इजरायली नजरिए का फर्क जानना जरूरी है. अमेरिका के लिए ईरान के साथ जंग 28 फरवरी 2026 को शुरू हुई होगी. लेकिन इजरायल के लोग ऐसा नहीं मानते. उनके लिए यह जंग 7 अक्टूबर 2023 को ही शुरू हो गई थी. जब हमास के आतंकियों ने इजरायल में घुसकर भयंकर कत्लेआम मचाया था. ईरान जंग के 110 दिन बाद अमेरिका कभी भी पीछे हट सकता है, लेकिन इजरायल और नेतन्याहू के डटे रहने के अपने बेहद ठोस कारण हैं.
इजरायल का पीएम होने का मतलब क्या है?
इजरायल का प्रधानमंत्री होना दुनिया के बाकी देशों जैसा नहीं है. यहां पीएम की कुर्सी पर बैठने का एक ही मतलब है. हर पल देश को नक्शे से मिटने से बचाना.
बेंजामिन नेतन्याहू का पूरा राजनीतिक करियर इसी सोच पर टिका है. वह सिर्फ 28 साल की उम्र में डिप्लोमेसी की दुनिया में आए थे. बाद में वह संयुक्त राष्ट्र (UN) में इजरायल के सबसे युवा राजदूत बने. उनके पास सुरक्षा मामलों का बहुत लंबा अनुभव है. उनकी लिकुड पार्टी की विचारधारा बहुत साफ है. वे दुश्मनों के आगे झुकने की बजाय उन्हें मुंहतोड़ जवाब देने पर यकीन रखते हैं.
इजरायल के प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी चुनौती अपने दुश्मनों को जवाब देना नहीं, बल्कि अपने सबसे बड़े मददगार अमेरिका को अपने हितो के हिसाब से साधना है. नेतन्याहू ने खुद एक बार यह बात कही थी. उन्होंने कहा था, "एक इजरायली प्रधानमंत्री में इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वह अमेरिकी राष्ट्रपति को भी 'ना' कह सके." खासकर तब, जब देश की सुरक्षा खतरे में हो. इसलिए जब अमेरिका अपने फायदे के लिए ईरान से हाथ मिलाना चाहता है, तब इजरायल का पीएम अपनी सुरक्षा को पहले देखता है. भले ही इससे अमेरिका नाराज हो जाए.
अंदरूनी राजनीति और जनता का मूड
इजरायल की अंदरूनी राजनीति हमेशा उथल-पुथल से भरी रहती है. वहां की संसद (नेसेट) में कुल 120 सीटें हैं. किसी एक पार्टी को बहुमत मिलना बहुत मुश्किल होता है. इसलिए वहां हमेशा मिली-जुली सरकार बनती है.
नेतन्याहू के विरोधी उन पर आरोप लगाते हैं कि वे अपनी कुर्सी बचाने के लिए युद्ध को लंबा खींच रहे हैं. उन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और वे जेल जाने से डर रहे हैं. यह सच है कि इजरायल की 20 फीसदी आबादी नेतन्याहू को पसंद नहीं करती. इतनी ही (20 फीसदी) आबादी उनकी पक्की समर्थक भी है.
लेकिन इस राजनीति के बीच एक और बड़ा सच है. देश की 60 फीसदी जनता इस समय केवल एक चीज चाहती है. वह चाहती है कि ईरान और उसके पाले हुए आतंकी संगठनों के खिलाफ यह जंग अपने अंजाम तक पहुंचे. दुश्मनों का पूरी तरह सफाया हो. इजरायल के लोग पुरानी गलतियों को भूल नहीं सकते. पहले जब भी देश में कमजोर सरकारें आईं, उन्होंने अमेरिका को खुश करने के लिए दुश्मनों को रियायतें दीं. नतीजा यह हुआ कि इजरायल पर और बड़े हमले हुए. इसलिए आज इजरायल की बड़ी आबादी एक मजबूत नेता के साथ खड़ी है.
विदेश नीति और घरेलू राजनीति का कनेक्शन
इजरायल में विदेश नीति और देश की अंदरूनी राजनीति आपस में जुड़ी हुई हैं. जब भी सरकार विदेश में कोई बड़ी कामयाबी पाती है, देश के भीतर उसकी ताकत बढ़ जाती है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण 2020 का 'अब्राहम अकॉर्ड' था. तब नेतन्याहू ने यूएई (UAE) और बहरीन जैसे अरब देशों के साथ ऐतिहासिक शांति समझौते किए. इससे देश में बिजनेस और टूरिज्म बढ़ा. नेतन्याहू की लोकप्रियता आसमान पर पहुंच गई.
इसके उलट जब कोई विदेशी ताकत इजरायल पर दबाव बनाती है, तो वहां के लोग सरकार के पीछे खड़े हो जाते हैं. जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इजरायल को पुरानी सीमाओं पर लौटने की सलाह दी थी, तो नेतन्याहू ने साफ मना कर दिया था. उन्होंने कहा था कि उन सीमाओं के साथ इजरायल सुरक्षित नहीं रह सकता. इजरायल का कोई भी नेता अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुककर अपनी राजनीति नहीं बचा सकता.
बाहरी खतरा बनाम अंदरुनी एकता
इजरायल की एक खास बात और है. जब भी देश पर कोई बड़ा बाहरी संकट आता है, वहां के सारे आपसी मतभेद खत्म हो जाते हैं. सड़कों पर होने वाले विरोध-प्रदर्शन पल भर में गायब हो जाते हैं. पूरा देश एक झंडे के नीचे आ जाता है.
7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने हमला किया, तो देश हिल गया था. जो विपक्ष कुछ दिन पहले तक सड़कों पर नेतन्याहू सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहा था, वह तुरंत सरकार के साथ 'वॉर कैबिनेट' (युद्ध समिति) में शामिल हो गया. जब अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकेन इजरायल आए, तो उन्होंने सेना के जमीनी हमले पर हिचक जताई थी. तब नेतन्याहू ने दोटूक कहा था, "अगर हमें अपने नाखूनों से भी लड़ना पड़ा, तो हम लड़ेंगे." यह केवल नेतन्याहू का बयान नहीं था. यह पूरी इजरायली सोसायटी की सामूहिक आवाज थी.
अंतरराष्ट्रीय संबंध और रणनीतिक सोच
इजरायल के लिए अंतरराष्ट्रीय रिश्ते किसी भावुकता पर नहीं चलते. वे जमीनी हकीकत पर चलते हैं. अमेरिका इजरायल का सबसे पक्का दोस्त है. लेकिन इजरायल जानता है कि वाशिंगटन में बैठी सरकारें अपने फायदे के लिए नीतियां बदलती रहती हैं. डोनाल्ड ट्रंप अपने देश के फायदे के लिए जल्द से जल्द शांति समझौता करना चाहते हैं. अमेरिका इस युद्ध से हजारों मील दूर सुरक्षित बैठा है. उसे कोई सीधा खतरा नहीं है.
लेकिन इजरायल ऐसा नहीं कर सकता. इजरायल का मानना है कि यदि ये युद्ध अमेरिका और इजरायल ने मिलकर शुरू किया था, तो ट्रंप अकेले समझौता नहीं कर सकते. इतिहास गवाह है कि जब भी इजरायल ने "जमीन के बदले शांति" की नीति अपनाई, उसे धोखा ही मिला. 2005 में इजरायल ने गाजा पट्टी से अपनी सेना और बस्तियां पूरी तरह हटा ली थीं. उसका नतीजा क्या हुआ? गाजा हमास का सबसे बड़ा गढ़ बन गया. उसी का नतीजा 7 अक्टूबर जैसी त्रासदी के रूप में सामने आया. इसलिए नेतन्याहू की नीति साफ है. शांति सिर्फ ताकत के दम पर मिल सकती है, कमजोरी दिखाकर नहीं.
आतंकी गुटों को पड़ोस से हमेशा के लिए मिटा देना चाहता है इजरायल
इजरायल आज किसी एक देश से नहीं लड़ रहा है. वह ईरान के इशारे पर काम करने वाले कई खतरनाक आतंकी संगठनों से घिरा हुआ है.
गाजा में हमास है. यह संगठन इजरायल को पूरी तरह तबाह करना चाहता है. 7 अक्टूबर को इसने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी थीं. दूसरी तरफ लेबनान में हिजबुल्लाह है. इसके पास आधुनिक रॉकेटों और मिसाइलों का बहुत बड़ा स्टॉक है. इसने उत्तरी इजरायल के लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है.
ये संगठन आम नागरिकों को ढाल बनाते हैं. ये सुरंगों का इस्तेमाल करते हैं और ड्रोन से हमले करते हैं. ऐसी स्थिति में इजरायल को अपने सैन्य ऑपरेशन पूरी तरह गुप्त रखने पड़ते हैं. हिजबुल्लाह के खिलाफ किया गया "पेजर अटैक" इसका बड़ा उदाहरण था. इसकी भनक इजरायल ने अमेरिका तक को नहीं लगने दी थी.
अब इजरायल की नीति साफ है, वह गाजा में कोई चुनौती नहीं पनपने देगा. उत्तर में लेबनान के भीतर वह लितानी नदी तक वह अपना कब्जा बनाना चाहता है. ताकि हिजबुल्लाह के रॉकेट उसका कुछ न बिगाड़ पाएं. वह दक्षिणी लेबनान को हमेशा-हमेशा के लिए खामोश कर देना चाहता है.
युद्ध के सिवाय रास्ता क्या है?
आज की तारीख में बेंजामिन नेतन्याहू और इजरायल के पास युद्ध को बीच में रोकने का कोई विकल्प नहीं है. अगर अमेरिकी दबाव में आकर इजरायल अभी पीछे हट जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे.
सबसे पहले, हमास और हिजबुल्लाह जैसे दुश्मनों को फिर से खड़े होने का मौका मिल जाएगा. वे फिर से हथियार इकट्ठा करेंगे. वे भविष्य में और बड़े हमले की प्लानिंग करेंगे. ईरान से उनकी सप्लाई फिर शुरू हो जाएगी.
दूसरा बड़ा नुकसान यह होगा कि मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) जैसे अशांत इलाके में इजरायल का डर खत्म हो जाएगा. वहां कमजोरी दिखाने का मतलब है खुद को खत्म करना. अगर इजरायल बिना जीते पीछे हटा, तो ईरान के हौसले बढ़ जाएंगे.
तीसरी बात नागरिकों की सुरक्षा की है. जब तक हिजबुल्लाह और हमास का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं होता, तब तक बॉर्डर के इलाकों से भागे लाखों इजरायली नागरिक अपने घरों को नहीं लौट पाएंगे. कोई भी प्रधानमंत्री अपने लोगों को हमेशा के लिए शरणार्थी बनाकर नहीं रख सकता.
अमेरिका के लिए ईरान के साथ पीस डील करना उसकी ग्लोबल पॉलिटिक्स का एक हिस्सा हो सकता है. वह इसे जब चाहे बदल सकता है. लेकिन इजरायल के लिए यह कोई राजनीतिक खेल नहीं है. यह अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है. युद्ध को मझधार में छोड़ना डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक कूटनीतिक फैसला हो सकता है. लेकिन इजरायल के लिए यह एक आत्मघाती कदम होगा. यही वजह है कि अमेरिकी शांति समझौते की कोशिशें अपनी जगह चलती रहेंगी. और इजरायल अपने दुश्मनों को खत्म करने के लिए हमले जारी रखेगा. भले मिडिल-ईस्ट में पीस हो, या न हो.
धीरेंद्र राय