अगर आपने बाकी सभी समझदार लोगों की तरह सोशल मीडिया पर अनगिनत दिन और रातें बिताई हैं, तो आप इस जाने-माने तथ्य से जरूर वाकिफ होंगे, एक दिन जब यह दुनिया परमाणु हमले की आग में झुलस जाएगी और यहां की हवा-पानी चेरनोबिल जैसी जहरीली हो जाएगी, तब इस धरती पर सिर्फ दो ही चीजें जिदा बचेंगी एक कॉकरोच और दूसरे हम भारतीय.
यह एक ऐसा सच है जिसे बाकायदा सत्यापित और प्रमाणित किया जा सकता है, जैसा कि हम सभी जानते हैं, अगर आपको मेरी बात पर यकीन न हो, तो बस किसी भी समझदार इंसान की तरह रेडिट (Reddit) पर जाइए और खुद पढ़कर देख लीजिए.
लेकिन अब, तुकाराम मुंडे जैसे अधिकारियों और मुंबई, बेंगलुरु व हैदराबाद के कुछ जरूरत से ज़्यादा उत्साही खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के अफसरों की बदौलत, इस बात का खतरा पैदा हो गया है कि हम अपनी इस 'सुपरह्यूमन' क्षमता को हमेशा के लिए खो देंगे. इसलिए आदरणीय तुकाराम मुंडे जी, हमारी सेहत के वास्ते... कृपा करके हमारे खाने-पीने पर यह जो जंग छेड़ी है, इसे बंद कर दीजिए!
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बात दरअसल यह है, कॉकरोचों की तरह हमें प्रकृति से ऐसा कोई वरदान नहीं मिला कि हम कुछ भी खा लें और किसी भी हवा में सांस ले लें, हमने तो अपनी यह सहनशक्ति बहुत जतन से, एक-एक छोले-भटूरे के साथ मेहनत करके कमाई है. हम हर तरह का खाना, हर तरह की हवा और किसी भी पानी में जिंदा रहने वाले 'सुपरमैन' बने हैं, क्योंकि हमने इसके लिए सोच-समझकर रास्ते चुने हैं. यह कोई आसान काम नहीं रहा. इंटरनेट पर लोगों ने हमें न जाने क्या-क्या कहा, हमारे स्ट्रीट फूड का मजाक उड़ाया, पर वे इस बात का असली निचोड़ समझ ही नहीं पाए. हम ऐसे लोग बन चुके हैं जो जहर को भी पचा सकते हैं.
अगर आपको मेरी बात पर यकीन न हो, तो इंडिया गेट पर घूमते किसी 'गोरे' को पकड़ लीजिए, उसे पुरानी दिल्ली ले जाइए और मक्खन में तैरते रेशमी कबाब खिलाइए, साथ में आलू की सब्जी और करारी कचौड़ी भी. उस सब्जी का रंग चाहे कितना भी गहरा-गाढ़ा हो और कबाब कितने भी तेल-मक्खन से लथपथ हों, आपको उससे पोषण ही मिलेगा, लेकिन अगले ही दिन वह गोरा पेट पकड़कर बैठा होगा.
वह 'गोरा' सिर्फ एक इंसान है, हम भारतीय सुपरह्यूमन हैं और तुकाराम मुंडे इस पूरी मेहनत पर पानी फेरने पर तुले हुए हैं. दुनिया के सबसे सहनशील इंसान बनने के इस मुकाम तक पहुंचना कोई बच्चों का खेल नहीं है, जहां हमारा पेट पराठे वाली गली के खुले नाले के बगल में बिकने वाली हर चीज को चुटकियों में पचा सकता है. यह एक ऐसी ताकत है जो हमने सालों-साल अपने शरीर को कड़ी ट्रेनिंग देकर हासिल की है.
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हम इसके लिए ट्रेनिंग तो पैदा होते ही शुरू कर देते हैं. बचपन में हम ऐसा दूध पीते हैं, जिसे डिटर्जेंट की ताकत से झागदार और पौष्टिक बनाया जाता है. हम वो टॉफियां खाते हैं जिन्हें नंगे पैरों से कूटकर आकार दिया जाता है और फिर नंगे फर्श पर बेला जाता है. हम पीले रंग के किसी घोल से मिला हुआ 'मैंगो जूस' पीते हैं. हम नकली पनीर से ठुसे हुए वो समोसे खाते हैं, जिन्हें 10 दिन पुराने डालडा में तला जाता है. हम ऐसे गोलगप्पे खाते हैं जिनका तीखा पानी गोलगप्पे वाले भैया ने अपने नंगे हाथों से मिलाया हो, जिसमें उनकी पांचों उंगलियां कोहनी तक बर्तन में डूबी हों.
और जब हमारी यह शुरुआती ट्रेनिंग पूरी हो जाती है, तो हम अमेरिकी सील्स की तरह अगले लेवल पर पहुंच जाते हैं अपनी ट्रेनिंग को तब तक और सख्त बनाते हुए जब तक कि हम युद्ध के लिए पूरी तरह से फिट न हो जाएं.
बस हमारे मामले में यह युद्ध जर्म्स के खिलाफ है, उस टीडीएस वाले पानी के खिलाफ जिसे पीते ही किसी कैनेडियन के प्राण पखेरू उड़ जाएं, या उस हवा के खिलाफ जो हमारे चमचमाते इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से बाहर कदम रखते ही किसी नॉर्वेजियन को खांसते-हांफते सीधे अस्पताल पहुंचा दे. अपनी जंग लड़ने और जिंदा रहने के लिए हम ट्रेनिंग पर ट्रेनिंग लेते हैं. इतनी कड़ी ट्रेनिंग कि जब हम ट्रेन के सफर में आईआरसीटीसी से खाना ऑर्डर करते हैं, तब भी हमारी ट्रेनिंग जारी रहती है.
टॉफियों और स्नैक्स पर विजय पाने के बाद, हम और भी कठिन पड़ाव की ओर बढ़ते हैं वह पड़ाव जहां हमें सड़े हुए मांस और एक्सपायर खाने को पचाना सीखना होता है. और 'आग' नाम के उस दिव्य चमत्कार की बदौलत हम यह भी कर दिखाते हैं. आखिर मुर्गे की टांग चाहे कितनी भी सड़ चुकी हो, एक बार तंदूर की अग्नि परीक्षा से गुजरने के बाद वह हमारे चटपटे पेट और तेल से लथपथ प्लेट में सजने के लिए बिल्कुल खरी हो जाती है. मटन के टुकड़े भले ही सड़कर हरे पड़ रहे हों, पर एक बार हमारी बिरयानी में 'दम' लगने के बाद उनका क्या बिगाड़ लेंगे और अगर टुकड़े फिर भी हरे दिखें, तो कोई बात नहीं हम उस पर थोड़ी हरी चटनी और मिला सकते हैं.
हफ़्ते भर पुरानी खट्टी टमाटर की ग्रेवी और पाम ऑयल की चिकनाहट के सहारे, हम बटर पनीर और बटर चिकन में यह सब डकार जाते हैं और अगर किसी मामले में, गलती से भी कोई अजीब महक आ जाए, तो हम मतली को दूर भगाने के लिए मुट्ठी भर देगी मिर्च उड़ेल देते हैं.
पिछले कुछ दिनों से मैं इस बात से बेहद परेशान हूं कि तुकाराम मुंडे जैसे लोग इस बात की गंभीरता को समझ ही नहीं पा रहे हैं. मुंबई जैसी जगहों पर वे सिर्फ इसलिए रेस्तरां बंद करवा रहे हैं क्योंकि उन्हें वहां एक्सपायर कर चुका खाना मिल गया. भाई, किसके लिए एक्सपायर? शायद अमेरिकियों के लिए, जो जितना खाना खाते हैं उससे ज्यादा तो बर्बाद कर देते हैं. या फिर यूरोपीय लोगों के लिए, जिन्हें दुनिया भर में घूमने और यह सीखने से पहले कि गर्म खाना ठंडे खाने से बेहतर लगता है, ठीक से खाना-पीना तक नहीं आता था.
हमारे लिए कुछ भी एक्सपायर नहीं होता, इसमें से कुछ भी नहीं. खाना भले ही गंध मार रहा हो, हमें बस उसमें थोड़ा टमाटर का प्यूरी मिलाना है... बाकी का काम हमारी अच्छी-भली ट्रेंड आंतें खुद-ब-खुद संभाल लेती हैं.
ऐसे ही नजारे हैदराबाद और बेंगलुरु जैसी जगहों से भी सामने आ रहे हैं. अचानक ऐसा लग रहा है मानो एफडीए (FDA) के अधिकारी किसी जुनूनी धुन में आ गए हैं वे एक के बाद एक रेस्तरां पर छापे मार रहे हैं और उन्हें सील कर रहे हैं. हो सकता है दुनिया में कहीं कोई हमारी इस सहनशक्ति और मबूत पेट से जल रहा हो क्या पता यह सब जॉर्ज सोरोस की रची कोई साजिश ही हो.
और मुझे तो लगता है कि हमें इसका खुलकर विरोध करना चाहिए. अपनी सेहत के खातिर, हमें तुकाराम और उनके इस जरूरत से ज़्यादा उत्साही साथियों को रोकना ही होगा.
एक कहावत है न किसी चीज को बनाने में सालों-साल लग जाते हैं, लेकिन उसे तबाह करने में बस कुछ सेकंड. हमने अपनी यह सहनशक्ति बरसों की लगन, निष्ठा और कठिन तपस्या से हासिल की है. अपनी इन्हीं 'सुपरह्यूमन' क्षमताओं के दम पर तो हम दिल्ली की जहरीली हवा में भी शान से सांस ले रहे हैं. हम मिलावटी और केमिकल से रंगे फल पचा सकते हैं, चॉक मिला गाढ़ा दूध डकार सकते हैं, और चाय के साथ सिंथेटिक पनीर की चुस्कियां ले सकते हैं क्योंकि हम असल में कॉकरोच जैसे जिद्दी और प्रतिरोधी हैं असली वाले कॉकरोच, जंतर-मंतर वाले नहीं!
लेकिन अगर तुकाराम और उनकी टोली की यह मुहिम यूं ही चलती रही, तो हम भी एक दिन ताजा खाना खाने और शुद्ध दूध पीने के आदी हो जाएंगे और बस, वहीं हमारी सारी बरसों की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी. एक बार साफ-सुथरे खाने की आदत पड़ गई, तो अगली बार भजन लाल के भटूरे खाते ही हमारा पेट जवाब दे जाएगा. हम वो लजीज चपली कबाब और सोया चाप कभी नहीं खा पाएंगे. हमारी जुबान विद्रोह कर देगी और प्लेट देखते ही घिन आने लगेगी. और यकीन मानिए, यही नजाकत एक दिन हमारी जान ले लेगी.
जावेद अनवर