डंडे नहीं, झंडे वाली आज़ादी… विविधताओं से रंगी

आजादी सिर्फ सत्ता या व्यवस्था से मुक्ति का नाम नहीं, बल्कि हर नागरिक के अपने हिस्से की स्वतंत्रता, सम्मान और बेहतर जीवन की तलाश है. 79 साल की लोकतांत्रिक यात्रा में भारत ने भूख, गरीबी, अशिक्षा और अभावों से काफी दूरी तय की है, लेकिन नई पीढ़ी के लिए आजादी के मायने अब बदल गए हैं.

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तिरंगे के रंगों में भारत की विविधता, लोकतंत्र और हर नागरिक की अपने हिस्से की आजादी की कहानी. (Photo- ITG) तिरंगे के रंगों में भारत की विविधता, लोकतंत्र और हर नागरिक की अपने हिस्से की आजादी की कहानी. (Photo- ITG)

पाणिनि आनंद

  • नई दिल्ली,
  • 15 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:31 AM IST

जहां भी एक झंडा होता है, उसमें एक डंडा होता है. झंडे को साधे. तटस्थ भाव से. डंडा डटा रहता है. एक व्यवस्था की तरह. झंडा लहराता है. हवाओं के साथ इतराता है. झूमता है. जीवन और बयार का संकेत देता है. डंडा मगर इस झंडे को नियंत्रित नहीं करता. बस थामे रहता है. ताकि व्यवस्था बनी रहे. झंडा फहरता रहे. लहरता रहे. परचम ऊंचा रहे. बुलंद रहे. हवा पूरब से आए या पश्चिम से. उत्तर से बहे या दक्खिन का जोर हो. झंडे को हवाओं से बातें करने दे. यही आदर्श अवस्था है सत्ता और समाज की. यही तरीका है लोकतंत्र में एक व्यवस्था और जनता के बीच तालमेल का. यही सीमाएं भी हैं. डंडे की भी और झंडे की भी.

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हालांकि एक बिंब एकदम इससे उलट भी है. लोकशाही की आदर्श अवस्था है कि सरकार झंडे की तरह अपना परचम लहराए लेकिन हमेशा याद रखे कि जनता डंडे की तरह है. वो ही उसे साधे है और वो संभाले भी रह सकती है और गिरा भी सकती है. लेकिन सत्ता का यथास्थितिवादी स्वभाव डंडे की तरह स्थूल है. चेहरे बदल जाते हैं लेकिन सवाल, लाचारी, गैरबराबरी और भ्रष्टाचार वैसे ही बना रहता है. लोग आज़ादी के दिन भी पीने का साफ़ पानी खोज रहे थे और आज भी. लोग आज़ादी के दिन भी दवा-डॉक्टर और सही परामर्श चाहते थे और आज भी. एक बहुमत आबादी अभी भी सच से ज्यादा उम्मीद पर और अपेक्षा से ज्यादा उपेक्षा पर जिंदा है. सिनेमा जिसे गोरे अंग्रेज़ गए और काले अंग्रेज़ आए वाला डायलॉग कहता है वो डायलॉग नहीं, आधे भारत के अनुभवों और अनुभूतियों का सच है.

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भारत आज अपनी आज़ादी का 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है. 79 वर्षों की यात्रा पूरी हो चुकी है. इस दौरान दुनिया में बहुत कुछ बदला. लेकिन तमाम बाहरी परिस्थितियों और आंतरिक संकटों के बीच भी भारत एक लोकतंत्र के रूप में मजबूती के साथ दुनिया के सामने खड़ा है. यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है. यह हमारी ताक़त भी है और खूबसूरती भी. हमारी शक्ति भी है और हमारी विशेषता भी. देश ने आज़ादी को इन 79 सालों में कई तरीकों के देखा और समझा है. उसके नए प्रतिमान, उसकी नई अवधारणाएं और उसके नए प्रयोग गढ़े हैं. इन प्रयोगों ने राजनीति की धारा में नाव कभी एक किनारे लगाई है तो कभी दूसरे किनारे. किनारों से जब ठांव नहीं मिला तो बीच धाराओं में भी कश्ती चलती रही. संसद में सत्ता के झंडे ऐसे ही अलग-अलग समयों की गवाही देते रहे और भारत के लोकतंत्र का कारवां आगे बढ़ता रहा.

लेकिन बात तो हो रही है आज़ादी की. और आज़ादी के मायने इन 79 सालों में अपने मूल को साधते हुए भी नए विस्तारों की टोह लेते रहे हैं. सोचिए, हम एक भूखे देश थे 1947 में. सबसे बड़ी भूख थी आज़ादी की भूख. गुलामी से निकलने की बेचैनी लिए. इसके साथ-साथ भूख पेट की भी थी. न पर्याप्त अनाज था और न पर्याप्त साधन. विज्ञान, तकनीक, अनुसंधान के क्षेत्र में भारत दुनिया से लगातार पिछड़ता जा रहा था. अंग्रेजों ने जो कुछ दिया, वो दरअसल उनकी सुविधा के लिए तैयार किया गया ताना-बाना था. निरक्षरता व्यापी हुई थी. स्वास्थ्य की व्यवस्था पारंपरिक तरीकों पर ज्यादा आश्रित थी. खाने, बनाने और रहने के साधन कम थे. अकाल, महामारी, संचार, परिवहन, सड़क और बिजली दुर्लभ चीजें थीं. कल-कारखाने कम. ज़्यादातर मानव का श्रम. इस देश को आज़ादी चाहिए थी. अंग्रेज़ों से ही नहीं. अभावों से, उपेक्षाओं से, अपनी वर्जनाओं और कुरीतियों से, सामंती ढांचों और जमींदारी, महाराजाओं की मनमानी से. आधुनिक होते विश्व में पिछड़े रह जाने से, औद्योगिक क्रांतियां देख रहे विश्व में सोते रह जाने से, विभाजित पहचानों और कलंकित संज्ञाओं से. जातियां, महिलाएं, ग़रीब लोग आडंबरों, शोषण, भेदभाव, पिछड़ेपन की अनगिनत सच्चाइयों से आजादी का इंतज़ार कर रहे थे.

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और आज़ादी मिली भी. यूनियन जैक उतर गया. परचम क़ायम हुआ. तिरंगा. विविधताओं का संदेश देता. एक वैविध्यपूर्ण राष्ट्र में विविधताओं का सम्मान करता यह झंडा इस बात की भी गवाही था कि हमारी अर्जित आज़ादी कैसी हो. इस आज़ादी ने रंगों को एकसाथ लेकर चलना सिखाया. एकसाथ लहराते विविध रंग. व्यवस्था का डंडा इसे संभालने भर के लिए था. उठाने और लहरने देने के लिए. इसी दृष्टि से बना संविधान और इसी दृष्टि से तय हुई देश की राजनीति.

लेकिन यह जो देश है मेरा, 79 साल बाद भी भूखा है. आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाली पीढ़ी अब जा चुकी. आज़ादी के दर्द को समझने वाले लोग अब अपने उतार पर हैं. बाद की पीढ़ियों ने आज़ादी नहीं देखी लेकिन स्वतंत्रता के संघर्ष की सौंध के साथ वो बड़े हुए. फिर नई सदी आई. नई पीढ़ियां. ये नया भारत है. भूखा भारत. आज़ादी का भूखा भारत. जिसे संघर्ष से ज्यादा गर्व की ज़रूरत है. जो परंपराओं को गले से लपेटे भी है और पूरी दुनिया में फैल जाने को बेताब भी. इसकी आज़ादी के पैमाने अलग हैं. उसे आज़ादी चाहिए लालफीताशाही से. गैर-बराबरी और अतार्किक बंटवारे से. सूचनाओं पर लगाम वो चाहता नहीं. एक ही निज़ाम और एक ही पैग़ाम उसे भाता नहीं. वो बदलना चाहता है देश, समाज, सिस्टम… सब. वो चाहता है कि हम विश्व में सबसे अगली पंक्ति में खड़े दिखें. भूलकर भी उसकी तुलना पड़ोसियों से न हो. विश्व के सबसे विकसित उसको इज़्ज़त और संभावना से देखें. वो तकनीक, आधुनिकता और संसाधनों की पहुंच के मामले में दूसरी पंक्ति का नागरिक और देश न रहे. बाज़ार ने और भूमंडलीकरण ने उसके लिए ये गुंजाइशें खोलीं भी. और इसी ने जिज्ञासाओं को, अभिलाषाओं और आकांक्षाओं को और बड़ा किया है.

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जब-जब इस नई सदी की पीढ़ी को महसूस होता है कि हम पीछे छूट रहे हैं, वो बेचैन हो उठते हैं. हीनता का बोध न उनको है और न उन्हें बर्दाश्त है कि कोई उन्हें इसका बोध कराए. कराए भी तो क्यों. वो किस मामले में दुनिया के किसी भी देश से कम हैं. लेकिन कम तो हैं… दुनिया के कई देशों की तुलना में हम अभी भी कमतर हैं. और इस पीढ़ी को इस कमतर होने की सच्चाई के गर्भ में दिखती है सरकारी व्यवस्था की कार्यशैली, नीतियां और तैयारी. विज्ञान में तकनीक का उजाला अभी भी पश्चिम में ही होता है. भारत तक उसकी रौशनी भर आती है. विश्वभर में आधुनिकता के जितने भी पैमाने हैं, उनके सूत्रधार पश्चिम के देश ही हैं. शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, फ़ैशन हो, सवारी हो, तकनीक हो, दवाएं हों, शोध हों, संगीत हो, सुरक्षा हो, सिनेमा हो, सड़कें हों, समाज हो, हम देखते पश्चिम की तरफ़ ही हैं. अपने यहां मिलता है बस तुलना के बाद दोयम बचा सच.

और सबके केंद्र में वही सिस्टम. इसलिए वो सिस्टम से लड़ता है. अपने सिस्टम से. अपनों के द्वारा और अपनों के लिए बनाए गए सिस्टम से. पुलिस उसे नहीं भाती. क़ानून की बासी होती किताबें उसे तार्किक कम, आदेशात्मक ज्यादा लगती हैं. वो सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, संस्थानों, मंत्रालयों, अधिकारियों और नियमों को संदेह की नज़र से देखता है. उसे लगता है कि सरकारी होना पिछड़े होने का ही दूसरा नाम है. उसके पास हमारे सरकारी सच के धागे से बुने प्रतिमान कम ही हैं. ओलंपिक, अनुसंधान, सिनेमा, ऑटोमोबाइल, सॉफ़्टवेयर और डिजिटल दुनिया के जो नामवर हमारे बीच से होकर हमारे सामने हैं, उन्हें वो अपवाद गिनता है और इसका श्रेय कभी भी सरकारों और उनकी व्यवस्थाओं को नहीं देता. आज भी उपलब्धियां निजी प्रयासों और गुणों के कारण ही चमकती हैं, यह उसकी पहली धारणा है.

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ऐसा नहीं है कि हम बदले नहीं. भारत की इन 79 वर्षों की यात्रा अद्भुत है. लगातार चले हैं. बदले हैं. सुधारा, सजाया और संवारा है. लेकिन स्टैंडर्ड या ट्रेंड सेट करने वाले हम अभी भी नहीं हैं. दुनियाभर में हम मजदूरों की तरह सॉफ़्टवेयर बना रहे हैं, इंफ्रास्ट्रक्चर और सामान तैयार कर रहे हैं. सेवाएं और सुविधाएं दे रहे हैं. लेकिन मालिक नहीं बने. हम, जो 1947 में देश के मालिक बने थे, अभी तक देश को मालिक नहीं बना सके हैं. इस मालिक न बन पाने वाली बेचैनी से आज़ादी चाहती है ये नई पीढ़ी.

इस पीढ़ी को पाबंदियों से आज़ादी चाहिए. पारंपरिक भी और परिवेश की भी. परिवारों की भी और प्रशासनिक भी. वो खुलना चाहता है. और इस खुलने के क्रम में कई बार वो नहीं देखता पिछड़ा रह गया एक बहुमत समाज. उसे पीछे की नहीं, आगे की चिंता है. इस आगे की चिंता में भी केंद्र में वो ख़ुद खड़ा है और इसलिए उसकी आजादी वर्तमान को जीने की आज़ादी है.

नई पीढ़ी जब यह आज़ादी मन में जगाए हुए चल रही है, एक पूरा देश उसको अतीत की ओर देखने के लिए बार-बार कह रहा है. विविधताओं ने हमें सुंदरता भी दी और सीमाएं भी. इसीलिए विविधताओं के देश में आज़ादी के मायने भी अबतक विविध ही हैं. किसान की आज़ादी कामगार की आजादी से अलग है. वकीलों की आज़ादी मास्टरों से अलग. जातियों में जकड़ा समाज यूरोप हो जाना चाहता है लेकिन व्यवहार में वो तुलना करता है अगड़ों से. नक़ल करता है अगड़ों की. और अपने से पिछड़े का शोषण करना नहीं छोड़ना चाहता. उसे काम के वक्त धर्म नहीं दिखता और बिना काम की स्थिति में धर्म सबसे हावी धुआं है. इज़्ज़त अभी भी पैसों से तौली जाती है. वो इसका विरोधी भी है और अथक साधक भी.

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ये कंट्राडिक्शंस का देश है. विविधताओं से भरा. अलग-अलग आज़ादियों का ख़्वाब लिए. अपने अपने हिस्से और मन की आज़ादी का इंतज़ार करता हुआ. वो मिली ही आज़ादियों में जीता भी है और उसके साथ मढ़ी गई गुलामियों पर चिड़चिड़ाता भी है. इसलिए आज़ादी के इतने सालों बाद भी आज़ादी की भूख खत्म नहीं हो रही है. मायने बदल तो गए हैं लेकिन लड़ाई अब भी चल रही है. कभी हमारे अंदर. कभी जंतर-मंतर तक.

और आख़िर में फिर वहीं खड़ा मिलता है एक झंडा. विविधताओं से भरा. विविध आज़ादियों की हवा में पंख खुजाता, फैलाता हुआ. हवाओं से कभी जूझता और कभी हवाओं पर मचलता. डंडा मज़बूत होता गया है. रंग हल्के. और सिलावट में रोशनदान निखर आए हैं. इन उधड़ी हुई जगहों से हवा और तेज़ बहती है. फड़फड़ाहट की तेज़ आवाज़ शोर करती मिलती है. आज़ादी की आकांक्षा फिर भी डंडे पर ही टिकी है. लोकतंत्र इस प्रकार अभी भी मज़बूत है.

आइए, मायनों में मानवता को खोजते हुए अपने-अपने हिस्से और मन की आज़ादियों को एकबार फिर से टटोलें.

जय हिंद

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