कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी...
सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-ज़मां हमारा.
इकबाल की ये पक्तियां भले ही एक सदी से ज्यादा पुरानी हैं. लेकिन भारत के स्वाधीनता संग्राम और फिर आजादी के बाद की राजनीतिक यात्रा को दर्शाने में सटीक बैठती हैं. आजादी के बाद 8 दशक बीत चुके हैं. आज भी सामाजिक कुरीतियां हैं, आर्थिक चुनौतियां हैं, बदलता वैश्विक परिदृश्य है. जंग है, महामारी है, प्राकृतिक आपदाएं हैं. लेकिन अस्सी साल के इस सफर में देश ने इन सब मुश्किलों से लड़ना सीख लिया है.
एक देश के तौर पर हमारा लोकतांत्रिक ढांचा मजबूत हुआ है. सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ है. एक दलीय व्यवस्था से शुरू कर हमने गठबंधन की राजनीति देखी है. और उसके बाद फिर से पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी देखी है. देश चलाने के लिए जरूरी सरकार का कामकाज देखा, विपक्ष की भूमिका भी देखी. इस सियासी सफर ने हमारे देश को ज्यादा परिपक्व बनाया है.
आजादी के शुरुआती दौर में हमने लड़खड़ाते हुए चलना सीखा. पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और सरदार पटेल ने देश को राष्ट्र के तौर पर एकीकृत किया, लोकतांत्रिक संस्थाओं की नींव रखी गई. संसदीय प्रक्रियाओं को संविधान के हिसाब से अपनाना शुरू किया. भाषाओं के आधार पर राज्य बने, देश के विकास के लिए योजनाओं का खाका तैयार किया गया. वो एकछत्र कांग्रेस का दौर था, लेकिन तब भी विपक्ष की जगह रही. हमने संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया और उसकी मजबूती के लिए काम करना शुरू किया.
इसके बाद इंदिरा गांधी का दौर शुरू हुआ. हालांकि इससे पहले और बाद में छोटे-छोटे कार्यकाल के लिए लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारी लाल नंदा, मोरारजी देसाई और चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने. लेकिन तब अलग-अलग कारणों से राजनीतिक अस्थिरता बनी रही. देश में गठबंधन की राजनीति शुरू हो चुकी थी. इंदिरा गांधी के जमाने में ही पहली बार कांग्रेस के प्रभुत्व को सियासी चुनौती मिली और जनता पार्टी की अगुवाई में मोरारजी देसाई पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने.
देश ने 1975 में आपातकाल भी देखा और इंदिरा गांधी के इस फैसले को लोकतंत्र का काला अध्याय तक कहा गया. लेकिन इस मुश्किल वक्त में भी लोकतंत्र की जड़ें हिली नहीं, बल्कि कमजोर हो चुकी व्यवस्था को पुनर्जीवित किया गया. यह वो समय था, जब देश में क्षेत्रीय दलों का उभार हो चुका था और उनकी महत्वाकांक्षाएं बढ़ रही थीं. छात्रों के आंदोलन, मजदूरों के आंदोलन और क्षेत्रीय दलों की आवाज ने देश में एक ध्रुवीय सत्ता को बदल डाला था. लेकिन इसी दौर में पार्टी और काडर की राजनीति से इतर व्यक्ति केंद्रित राजनीति पनपना भी शुरू हो गई.
इंदिरा गांधी चुनौतियों को सामना कर 1980 में फिर से सत्ता में वापस आईं. उनके पिछले कार्यकाल में ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' का जो नारा था, उसका नतीजा देश देख चुका था. हालांकि देश में फिर से राजनीतिक अस्थिरता का दौर शुरू हो गया. क्योंकि 1984 में इंदिरा गांधी और फिर 1991 में राजीव गांधी की हत्या हुई. देश ने दो पूर्व प्रधानमंत्रियों की निर्मम हत्या तक देखी. सिख विरोधी दंगे हुए, लेकिन अतीत से उबरकर एक बार फिर खड़ा होना भी सीखा.
90 का दशक बदलाव का दशक रहा. राजीव गांधी की हत्या के बाद वीपी सिंह और चंद्रशेखर की अगुवाई में गठबंधन की सरकारें बनी. फिर पीवी नरसिम्हा राव के दौर में आर्थिक उदारीकरण का दौर आया, जो कि आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम था. इस दौर में राम मंदिर आंदोलन हुआ और मंडल-कमंडल की लड़ाई ने आरक्षण की बहस को नई हवा दी. जाति और धर्म आधारित राजनीति की जड़े अब पहले से मजबूत होने लगी थीं. इस दौर में आज की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी का उत्थान हो चुका था.
बीसवीं सदी नया भारत लेकर आई. जब देश में गठबंधन सरकारों का स्वर्ण काल शुरू हुआ. बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृ्त्व में पहली बार एनडीए की सरकार बनी. फिर 2004 में बीजेपी की ओर से 'इंडिया शाइनिंग' का नारा दिया गया. लेकिन कांग्रेस ने फिर से यूपीए के छाते तले गठबंधन की सरकार बनाई. 2009 में यूपीए की सरकार की वापसी हुई. लेकिन दूसरा कार्यकाल विवादों और भ्रष्टाचार के आरोप में ही गुजर गया. अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली का रामलीला मैदान नए दौर के जनआंदोलन का गवाह बना. इसके बाद 2014 में कांग्रेस की सरकार का पतन हुआ और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की वापसी हुई.
बीजेपी ने पहली बार अकेले अपने दम पर सरकार बनाई. गठबंधन की बैसाखियों से अलग देश ने तीन दशक बाद पूर्ण बहुमत वाली मजबूत सरकार देखी. नरेंद्र मोदी की रिकॉर्ड जीत ने इंदिरा गांधी के दौर को ताजा कर दिया. अब डिजिटल क्रांति और सोशल मीडिया कैंपेन का जमाना आ चुका था. चुनाव में युवाओं और महिलाओं पर ज्यादा फोकस किया जाने लगा, उनके हिसाब से चुनावी कैंपेन डिजाइन होने लगे. 2019 में फिर से नरेंद्र मोदी की वापसी हुई और इस बार बहुमत और बड़ा था. साल 2024 में नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने.
देश अब आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ रहा है. सिंगल पार्टी सिस्टम से शुरू हुई सियासत ने गठबंधन की राजनीति से गुजरते हुए पूर्ण बहुमत की सरकारों का उत्थान भी देखा. राजनीतिक अस्थिरता से लेकर हाल के दिनों में लगातार दो बार पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली सरकार भी देखी. यही हमारे प्रजातांत्रिक ढांचे की मजबूती का पर्याय है. जब पड़ोसी मुल्कों में आर्थिक संकट, सियासी उठापटक और गंभीर अस्थिरता आई, तब भी भारत की राजनीति ने देश को एक सूत्र में बांधे रखा.
संस्थाओं की स्वायत्तता, चुनाव में धनबल का इस्तेमाल और वंशवाद की राजनीति जैसी बहस हर दौर में रही. फिर भी कभी निरंकुशता इस देश की सियासत पर हावी नहीं हो सकी. पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के सिद्धांत- जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा... पर देश आगे बढ़ा. कभी पथ से डिगा भी तो जनता ने ही सरकारों को सबक भी सिखाया. और याद दिलाया कि देश में सरकार, जनता की भलाई और विकास के लिए है. चुनावों के माध्यम से जनता ने ही लोगों को सत्ता पर बैठाया है और फिर उतारा भी दिया है. यहां कुछ भी स्थाई नहीं है और जनता ही जनार्दन है.
अनुग्रह मिश्रा