तेजस्वी ने अपने बड़े भाई तेज प्रताप यादव के खिलाफ महुआ सीट पर रचा चक्रव्‍यूह

तेजस्वी यादव अभी तक लालू परिवार से निष्कासित अपने बड़े भाई तेज प्रताप यादव के खिलाफ चुनाव प्रचार करने नहीं पहुंचे हैं. तेजप्रताप ने कुछ दिनों पहले कहा था कि अगर तेजस्वी उनके खिलाफ प्रचार करने महुआ आते हैं तो वो भी राघोपुर अपने भाई के खिलाफ प्रचार करने जाएंगे. पर महुआ में तेजस्वी ने अपने खास मुकेश रोशन को दुबारा टिकट देकर अपना इरादा स्पष्ट कर दिया है.

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तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव तेजप्रताप यादव और तेजस्वी यादव

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 29 अक्टूबर 2025,
  • अपडेटेड 7:15 PM IST

बिहार की राजनीति में वैशाली जिले की महुआ विधानसभा सीट इस बार हॉट हो गई है. इस बार के विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव यहां से एक बार फिर मैदान में उतर चुके हैं. 2015 में इसी सीट से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने वाले तेज प्रताप अब अपनी नई पार्टी जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) के बैनर तले चुनाव लड़ रहे हैं. जिस तरह तेजप्रताप यादव के पर्चा दाखिला के दिन उनके साथ परिवार का कोई सदस्य साथ नहीं था उससे साफ है कि तेजस्वी यादव किसी भी कीमत पर उन्हें यह सीट जीतने नहीं देना चाहते. पर तेजप्रताप यादव को हल्के में लेना भी राजनीतिक भूल साबित होगी. उनके अंदर अपने पिता लालू प्रसाद का ह्यूमर है जो सोशल मीडिया के जमाने में उन्हें लोकप्रिय बनाता है.

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धीरे-धीरे वह अपनी अदा से अपने विरोधियों को भी अपना समर्थक बना रहे हैं. घर से बाहर होने के बाद उन्होंने अपनी जिह्वा पर नियंत्रण कर लिया है. वह बेहद संतुलित और सोच समझकर ही कुछ बोल रहे हैं. जाहिर है कि इन सबका इंपैक्ट पड़ना तय है. यह सीट आरजेडी का पारंपरिक गढ़ रही है, लेकिन आम लोग उन्हें लालू परिवार से बाहर का नहीं मानते हैं.

इस भावना को अगर तेजप्रताप कैश करा लेते हैं तो जाहिर है कि तेजस्वी के लिए एक बड़ी मुश्किल बनकर उभर सकते हैं. फिलहाल बिहार की अन्य विधानसभा सीटों की तरह यहां की जीत-हार का समीकरण भी यादव वोटबैंक, दलित समुदाय की भूमिका, मुस्लिम समर्थन और विकास के मुद्दों पर टिका हुआ है. 

आरजेडी का किला है महुआ सीट

महुआ विधानसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई, लेकिन इसका राजनीतिक इतिहास लालू यादव की सामाजिक न्याय की राजनीति से गहराई से जुड़ा है. 2000 और 2005 के चुनावों में आरजेडी ने यहां मजबूत पकड़ बनाई, जब लालू की लोकप्रियता चरम पर थी. 2010 में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के रविंद्र राय ने 21,925 वोटों के अंतर से जीत हासिल की, जो एनडीए की लहर का प्रमाण था. लेकिन 2015 में तेज प्रताप यादव ने हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के रविंद्र राय को 28,155 वोटों (18.46% अंतर) से हराकर सीट पर आरजेडी का झंडा फिर फहरा दिया. उन्होंने कुल 66,927 वोट हासिल किए, जो कुल वैध वोटों (1,54,435) का लगभग 43% था. यह जीत महागठबंधन की लहर और यादव-मुस्लिम गठजोड़ की ताकत का प्रतीक थी.

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2020 में तेज प्रताप को हसनपुर (समस्तीपुर) शिफ्ट कर दिया गया, जहां वे 21,139 वोटों से जीते. महुआ पर आरजेडी के मुकेश कुमार रौशन ने जेडीयू की आशमा परवीन को 13,770 वोटों (8.08% अंतर) से हराया. कुल वैध वोट 1,72,026 थे, जिसमें रौशन को 62,747 (36.48%) मिले. लोजपा के संजय कुमार सिंह तीसरे स्थान पर रहे. यह चुनाव कोविड की छाया में लड़ा गया था. 

जेजेडी के तेज प्रताप, आरजेडी के मुकेश रौशन (तेजस्वी के करीबी), एनडीए के लोजपा (रामविलास) के संजय कुमार सिंह और जन सुराज पार्टी के इंद्रजीत प्रधान का यहां सीधा मुकाबला है. कुल मतदाता 2,86,501 हैं, जिसमें 21.17% दलित, 15.10% मुस्लिम और बाकी यादव (लगभग 25-30%), कोइरी-कुर्मी (20%) और अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) प्रमुख हैं. युवा मतदाता (18-30 वर्ष) बहुमत में हैं, जो विकास और रोजगार के मुद्दों पर संवेदनशील हैं.

किस आधार पर खटाई में नजर आ रही है तेज प्रताप की लड़ाई

1- यादव वोटों का बंटवारा और एनडीए की मजबूत लॉबी

तेज प्रताप की हार का सबसे बड़ा खतरा वोटों का बंटवारा है. आरजेडी के मुकेश रौशन तेजस्वी के समर्थन से यादव वोट का बड़ा हिस्सा (50-60%) ले सकते हैं. 2020 में रौशन ने स्थानीय मुद्दों (जैसे सड़क, बिजली) पर फोकस किया, जो ग्रामीण मतदाताओं को प्रभावित करता है. तेज प्रताप का आरजेडी से निष्कासन (मई 2025 में सोशल मीडिया पोस्ट के कारण) परिवारिक दरार को दुनिया के सामने ला चुका है. लालू परिवार के अंध भक्त कहते हैं कि तेजस्वी का करीबी रौशन तेज प्रताप को घर में ही हरा देगा. इसका कारण यह है कि बहुत से लोग मानते हैं कि तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने के रास्ते में तेजप्रताप कांटा बन रहे हैं. अगर यादव वोट 50-50 बंटा, तो तेज प्रताप का स्कोर 50,000 से भी कम हो सकता है.

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एनडीए के संजय कुमार सिंह (लोजपा) दलित वोट (21%) और पासवान समुदाय को एकजुट करने में सफल हो रहे हैं. 2024 लोकसभा में चिराग पासवान ने हाजीपुर (जिसमें महुआ आती है) में 1.7 लाख वोटों से जीत हासिल की, जो एनडीए की ताकत दिखाता है. जेडीयू-बीजेपी का संगठन मजबूत है, और मोदी लहर का फायदा मिलना भी संजय कुमार के लिए तय है. जन सुराज का इंद्रजीत प्रधान युवा असंतोष (रोजगार, शिक्षा) को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं.

तेज प्रताप की छवि एक समस्या है. उनकी विवादास्पद बयानबाजी (जैसे 'आरजेडी में वापसी से बेहतर मौत') और पुरानी शादियों के अफवाहें कुछ वोटरों को दूर कर सकती हैं. तेजस्वी के समर्थक उन्हें 'अस्थिर' बताकर अगर घर से निकलवा सकते हैं तो आम लोगों का कहना ही क्या है. अगर मतदान प्रतिशत 60% रहा (2020 जैसा), तो कम वोटर टर्नआउट में एनडीए को फायदा हो सकता है.

2-जातिगत और सामाजिक समीकरण 

अगर दलित 80% एनडीए को गया और यादव बंटा, तो तेज प्रताप तीसरे स्थान पर रह सकते हैं.  पूरे देश की तरह यहां भी जीत-हार की कुंजी महुआ के जाति समीकरण में है. यादव (25-30%) तेज प्रताप का कोर वोटबैंक है, लेकिन रौशन के साथ बंटवारा तय है. मुस्लिम (15%) आरजेडी की ओर, लेकिन तेज प्रताप का 'लालू का बेटा' टैग 30-40% खींच सकता है. दलित (21%, मुख्यतः पासवान) लोजपा का गढ़ हैं; 2010 और 2020 में इन्होंने एनडीए को मजबूत किया है. OBC (कोइरी-कुर्मी, 20%) जेडीयू की ओर झुकते हैं. महिलाएं (48% मतदाता) विकास वादों पर वोट देंगी, जहां तेज प्रताप का मेडिकल कॉलेज प्लस पॉइंट है.

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किन बातों से है तेज प्रताप को उम्‍मीद: 

1-पारिवारिक विरासत और स्थानीय अपील

तेज प्रताप की जीत का समीकरण उनकी 2015 वाली सफलता पर टिका है, लेकिन अब यह अधिक जटिल है. सबसे बड़ा प्लस पॉइंट लालू परिवार की विरासत है. महुआ में लालू का नाम अभी भी यादव समुदाय (जो कुल वोटों का 25-30% है) को एकजुट करने वाला है. 2015 में तेज प्रताप ने इसी वोटबैंक का 80% से अधिक हिस्सा हासिल किया था. हाल के सर्वे और सोशल मीडिया ट्रेंड्स (जैसे X पर #TejPratapYadav) दिखाते हैं कि लालू के समर्थक उन्हें 'परिवार से निकाले गए बेटे' के रूप में देख रहे हैं, जो भावनात्मक अपील पैदा कर रहा है. एक यूजर का कहना है कि तेज प्रताप भले ही आरजेडी से बाहर हैं, लेकिन लालू के बेटे हैं. यादव वोट बंटेगा, लेकिन ज्यादातर उनके पक्ष में जाएगा. 

विकीपीडिया के अनुसार मुकेश रौशन भी यादव समुदाय से आते हैं. दूसरे तेजस्वी ने उन्हें दुबारा महुआ से टिकट भी दिया है. जाहिर है कि यादव बंटेगा. पर जिस तरह तेजप्रताप विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं उससे साफ लगता है कि यादव वोट की बरसात तेजप्रताप के लिए ही होगी. क्योंकि एनडीए भी तेजस्वी को लालू परिवार में विघटन का जिम्मेदार मानती है. अगर रोहिणी आचार्य का अंदर अंदर भी समर्थन तेजप्रताप को मिल जाता है तो जाहिर है कि यादव वोटर्स एकमुश्त लालू परिवार के बड़े बेटे के लिए वोट करेगा.

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2- महुआ में मेडिकल कॉलेज

तेजप्रताप की जीत के लिए माहौल बनाने का काम महुआ में बन रहा मेडिकल कॉलेज भी हो सकता है. 2015-2020 के दौरान तेज प्रताप के स्वास्थ्य मंत्री रहते हुए महुआ में मेडिकल कॉलेज (465 करोड़ की लागत वाला) का काम शुरू कराया. जिसका काम धीरे-धीरे पूरा होने के करीब है. ग्रामीण इलाके के लिए यह बहुत बड़ा मुद्दा है. अब वे इंजीनियरिंग कॉलेज और क्रिकेट स्टेडियम (जिसमें भारत-पाक मैच कराने का वादा) जैसे भव्य वादे कर रहे हैं. ये वादे युवाओं को आकर्षित कर सकते हैं, खासकर जब बेरोजगारी दर 15% से ऊपर है.

सोशल मीडिया पर तेजप्रताप के समर्थक कह रहे हैं, मेडिकल कॉलेज का श्रेय तेज प्रताप को जाता है; रौशन ने कुछ नहीं किया. इसके साथ ही तेजप्रताप की सादगी भरी प्रचार शैली जैसे ट्रैक्टर चलाकर खेत जोतना ग्रामीण वोटरों को पसंद आ रहा है.

अगर यादव वोट 70% और मुस्लिम का 40% मिल जाए, तो तेज प्रताप 70,000-80,000 वोट पार कर सकते हैं, जो 2020 के रोशन के 62,747 से ज्यादा है. उनकी पार्टी ने 22 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जो उनकी राज्यव्यापी अपील को बढ़ा सकता है. अगर बिहार में त्रिशंकु विधानसभा बनती है और तेजप्रताप 2 सीट भी जीत लेते हैं तो वो बार्गेनिंग करके बढ़िया पद हासिल कर सकते हैं.

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