सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की आवाजाही, पत्रकारों की एंट्री, यूट्यूबरों की कैमरा टीम और सोशल मीडिया पर स्कूलों की तस्वीरें दिखाने पर रोक लगाने वाले उत्तर प्रदेश और राजस्थान के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है. अदालत ने इस स्तर पर अनुच्छेद 32 के तहत याचिका सुनने से इनकार किया है. फिलहाल इसका मतलब यही है कि सरकारी स्कूलों में प्रवेश, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, इंटरव्यू और लाइव स्ट्रीमिंग के लिए पूर्व अनुमति की व्यवस्था लागू रहेगी.
फैसले का स्वागत होना चाहिए. आखिर स्कूल कोई सार्वजनिक पार्क नहीं हैं कि कोई भी कैमरा उठाकर भीतर चला जाए. बच्चों की सुरक्षा, शिक्षकों की निजता, पढ़ाई का माहौल और स्कूल का अनुशासन इन सबकी अपनी अहमियत है. लखनऊ के एक स्कूल में बिना अनुमति पहुंचकर शिक्षिकाओं पर दबाव बनाने जैसी घटनाओं ने यह साबित भी किया कि सोशल मीडिया की लोकप्रियता किसी को कानून और संस्थागत मर्यादा से ऊपर नहीं कर सकती.
लेकिन इस फैसले का दूसरा पहलू भी है, और वह ज्यादा महत्वपूर्ण है.सरकारी स्कूलों में बाहरी लोगों की अनियंत्रित एंट्री रोकना ठीक है, लेकिन क्या इस बहाने सरकारी स्कूलों के भीतर की बदहाली को बाहर नहीं आने से नहीं रोक दिया जाएगा? क्या अनुमति की ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए जिसमें पत्रकार, सामाजिक संगठन, अभिभावक या कोई जिम्मेदार नागरिक उचित प्रक्रिया के तहत स्कूल की स्थिति देख सके और उसकी रिपोर्टिंग कर सके? लेकिन सवाल फिर वही उठेगा कि जब अनुमति लेनी होगी तो फिर क्या अनुमति ऐसे लोगों को मिलेगा जो तथ्यों को ज्यों का त्यों लोगों के सामने रखें. क्या ऐसा नहीं होगा कि अनुमति ऐसे लोगों को ही दी जाएगी जो स्कूल की केवल पीआर ही करें.
यह सवाल इसलिए जरूरी है क्योंकि जिन स्कूलों पर ये पाबंदियां लागू हुई हैं, वे निजी स्कूल नहीं, सरकारी स्कूल हैं. उनके शिक्षक सरकारी हैं, उनकी इमारत सरकारी पैसे से बनी है, बच्चों की शिक्षा पर खर्च सरकारी बजट से होता है और मिड-डे मील से लेकर शौचालय, पेयजल और बुनियादी सुविधाओं तक की जिम्मेदारी सरकार की है. जनता के पैसे से चलने वाले संस्थान जनता से पूरी तरह पर्दे के पीछे नहीं रह सकते.
पिछले दिनों ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के दौरान यही हुआ. कॉकरोच जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं और दूसरे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने सरकारी स्कूलों में जाकर वहां की कमियों के वीडियो बनाए और उन्हें सार्वजनिक किया. कई जगह यह अभियान व्यवस्था की खामियां सामने लाने का माध्यम बना, तो कुछ जगहों पर बिना अनुमति प्रवेश और शिक्षकों के साथ बदसलूकी के आरोप भी लगे. यही वह सीमा है जिसे सरकारों को स्पष्ट करना होगा.
किसी आंदोलनकारी को स्कूल में घुसकर शिक्षक को कैमरे के सामने कटघरे में खड़ा करने का अधिकार नहीं हो सकता. लेकिन सरकार को भी यह अधिकार नहीं मिलना चाहिए कि वह अनुमति की ऐसी दीवार खड़ी कर दे जिसके पीछे सरकारी स्कूलों की सारी कमियां गायब हो जाएं.
भारत में सरकारी स्कूलों की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि वहां कैमरे बहुत ज्यादा पहुंचते हैं. समस्या यह है कि वहां निगरानी अक्सर बहुत कम पहुंचती है. एक सरकारी स्कूल में छह महीने पुराना एक्सपायर्ड मसाला मिलता है तो सवाल उठना ही चाहिए. शौचालय खराब है तो सवाल उठना चाहिए. बच्चों को पीने का साफ पानी नहीं मिलता तो सवाल उठना चाहिए. शिक्षक नहीं हैं तो सवाल उठना चाहिए. भवन जर्जर है तो सवाल उठना चाहिए. मिड-डे मील की गुणवत्ता खराब है तो सवाल उठना चाहिए.और सवाल उठाने के लिए हमेशा किसी राजनीतिक दल या यूट्यूबर की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए.
सरकारी स्कूलों की निगरानी का एक संस्थागत सिस्टम होना चाहिए. जिला शिक्षा अधिकारी नियमित निरीक्षण करें. स्थानीय जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय हो. स्कूल प्रबंधन समितियों को मजबूत किया जाए. अभिभावकों को शिकायत का अधिकार मिले. और पत्रकारों को भी स्पष्ट नियमों के तहत स्कूलों की रिपोर्टिंग की अनुमति मिले. अभी स्थिति कुछ उलटी दिखाई देती है. सरकारी स्कूलों में एक तरफ व्यवस्था की कमी है और दूसरी तरफ व्यवस्था की तस्वीर दिखाने वाले कैमरे पर रोक है.
यहां एक और विडंबना है. देश के बड़े निजी स्कूलों में बिना अनुमति प्रवेश करना तो दूर, कई बार अभिभावकों के लिए भी स्कूल परिसर में पहुंचना आसान नहीं होता. छोटे निजी स्कूलों में भी किसी बाहरी या अभिभावकों का प्रवेश आसान नहीं होता है. बड़े और महंगे स्कूल अपनी सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक तंत्र के कारण बाहरी लोगों को नियंत्रित करते हैं. कई बार जिला प्रशासन के अधिकारी भी बिना पूर्व अनुमति के ऐसे स्कूलों के भीतर नहीं जा सकते.नोएडा के एक फेमस निजी स्कूल में कुछ साल पहले फूट पॉइजनिंग हो गई. कई छात्रों के बीमार होने की खबर मिलते ही स्कूल के बाहर पैरंट्स पहुंच गए. जिले के सिटी मजिस्ट्रेट और एसपी सिटी भी पहुंचे पर स्कूल प्रशासन ने किसी को भी स्कूल के अंदर नहीं घुसने दिया.
लेकिन जब स्कूल सरकारी होता है तो वह अचानक सबके लिए खुला मैदान बन जाता है. नेता पहुंच जाता है. यूट्यूबर पहुंच जाता है. कैमरा पहुंच जाता है. सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर पहुंच जाता है. और कभी-कभी ऐसा व्यक्ति भी पहुंच जाता है जिसका उद्देश्य स्कूल की समस्या दिखाना कम और अपने चैनल की लाइक्स और व्यूज बढ़ाना ज्यादा होता है.
यह स्थिति भी स्वीकार्य नहीं है.स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई होनी चाहिए, राजनीतिक तमाशा नहीं. शिक्षक पढ़ाएं, कैमरे के सामने सफाई न देते रहें. प्रधानाध्यापक प्रशासन चलाएं, वायरल वीडियो की चिंता न करें. बच्चों की निजता सुरक्षित रहे और उनके चेहरे बिना अनुमति सोशल मीडिया पर न दिखाए जाएं. सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा फैसला इसी दिशा में व्यवस्था को सांस लेने की जगह देता है. अदालत ने फिलहाल राज्यों की अनुमति वाली व्यवस्था को हटाने से इनकार किया है.
लेकिन अब गेंद राज्य सरकारों के पाले में है.उन्हें इस फैसले को सरकारी स्कूलों को बंद कमरों में बदलने का लाइसेंस नहीं बनाना चाहिए. अनुमति की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए. किसी पत्रकार को रिपोर्टिंग करनी है तो आवेदन का स्पष्ट रास्ता हो. किसी नागरिक संगठन को स्कूल की स्थिति देखनी है तो कारण के आधार पर अनुमति मिले. किसी शिकायत की जांच करनी है तो प्रशासन खुद निरीक्षण करे और रिपोर्ट सार्वजनिक करे.
सबसे बड़ा खतरा यह होगा कि सरकारें कहे कि अब किसी को अंदर आने की जरूरत नहीं, हम खुद सब देख लेंगे. सरकारों के अपने निरीक्षण तंत्र होते हैं, लेकिन स्वतंत्र निगरानी का महत्व अपनी जगह है. लोकतंत्र में सरकार को यह सुविधा नहीं मिल सकती कि वह अपनी व्यवस्था की जांच भी खुद करे और जनता को परिणाम भी खुद बताए.
‘स्कूल ठीक करो’ अभियान में अतिशयोक्ति हो सकती है, राजनीतिक एजेंडा हो सकता है, अव्यवस्था भी हुई होगी. लेकिन अगर इस बहाने सरकारी स्कूलों की वास्तविक समस्याओं पर पर्दा पड़ गया तो नुकसान बच्चों का होगा.
संयम श्रीवास्तव