जब युवा सड़कों पर उतरता है तो बदलाव की बयार आती है. इसकी एक बानगी हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए धरना प्रदर्शन के रूप में देखने को मिली. जहां युवा अपनी मांगों को लेकर डटे तो सरकार को झुकना पड़ा, लेकिन इस प्रोटेस्ट ने एक नई बहस छेड़ दी. जिसके बाद Gen-Z के बारे में एक धारणा बना ली गई. कुछ लोग Gen-Z को गालीबाज़, अधीर और विद्रोही बताने लगे तो कुछ उसकी सत्ता से सवाल पूछने की क्षमता की तारीफ कर रहे हैं, लेकिन ये दोनों ही नजरिए अधूरे हैं. इतिहास गवाह है कि समाज अक्सर अपनी नई पीढ़ी को सही ढंग से समझ नहीं पाता. मुझे लगता है कि Gen-Z के साथ भी हम वही गलती दोहरा रहे हैं.
यूनिसेफ इंडिया के आंकड़ों की मानें तो देश में 15 से 29 वर्ष की आयु के युवाओं की संख्या लगभग 37.5 करोड़ है. ये दुनिया में सबसे बड़ी युवा आबादी है. इस दशक के अंत तक Gen-Z और मिलेनियल्स मिलकर देश की लगभग आधी आबादी होंगे. यही पीढ़ी आने वाले वर्षों में भारत के वर्कफोर्स, इनोवेशन और चुनावी राजनीति की दिशा तय करेगी. इसलिए इन्हें समझना भारत के भविष्य को समझने जैसा है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत भी कह चुके हैं कि 'अगर Gen-Z आंदोलन कर रहे हैं, तो वे एंटी-नेशनल नहीं है. हमारी अगली पीढ़ी हैं. उन्हें हमारी बात समझनी चाहिए और हमें उनकी बात समझनी चाहिए.'
सबसे पहले हमें इस पीढ़ी को पुरानी सोच के चश्मे से देखना बंद करना होगा. सबसे बड़ी भूल यह है कि सोशल मीडिया पर जो दिखाई देता है, उसे पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधि मान लिया जाता है. Gen-Z भारत की पहली ऐसी पीढ़ी है, जो पूरी तरह डिजिटल माहौल में पली-बढ़ी है. जहां मिलेनियल्स ने इंटरनेट का आगमन देखा, वहीं Gen-Z के लिए स्मार्टफोन, डिजिटल पेमेंट, AI और सोशल मीडिया जीवन का सामान्य हिस्सा हैं. तकनीक उनके लिए कोई विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी जरूरत है.
भारत के प्रसिद्ध शोध संगठन PRICE (पीपुल रिसर्च ऑन इंडियाज कंज्यूमर इकॉनमी) की इसी साल फरवरी में एक स्टडी सामने आई, जिसमें कहा गया कि 44 प्रतिशत Gen-Z किसी प्रोडक्ट की जानकारी सबसे पहले इंस्टाग्राम से लेते हैं, जबकि लगभग 80 फीसदी युवा कोई फैसला लेने से पहले अलग-अलग विकल्पों की तुलना करते हैं. ऑनलाइन रिव्यू, इंटरनेट, दोस्तों की सलाह और अब AI भी उनके फैसलों में अहम भूमिका निभाता है. इस युवा पीढ़ी का जानकारी हासिल करने का तरीका भी पिछली पीढ़ियों से अलग है. जहां पुरानी पीढ़ियां अखबार और टेलीविजन पर निर्भर थीं, वहीं Gen-Z यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स (पहले ट्विटर), व्हाट्सऐप और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स जैसे माध्यमों से जानकारी जुटाता है. इस पीढ़ी के पास इन्फॉर्मेशन और नॉलेज का कोई एक सोर्स नहीं, बल्कि अनेक साधन हैं. यही वजह है कि सरकारों, कंपनियों और शिक्षण संस्थानों के लिए उनसे संवाद करना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन है.
नई पीढ़ी एक साथ कई दुनियाओं में जीती है. वह दुनिया की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों से सीखती है, कई देशों के लोगों के साथ काम करती है, अंतरराष्ट्रीय कंटेंट क्रिएटर्स को फॉलो करती है, भारतीय त्योहार मनाती है, कई भाषाएं बोलती है और नई तकनीकों को सहजता से अपनाती है. कुछ लोगों को यह अटपटा लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह उनके विस्तार का संकेत है. वे पूरी तरह भारतीय हैं और उतने ही सहज रूप से वैश्विक भी.
इतिहास बताता है कि हर नई पीढ़ी को शुरुआत में गलत समझा गया.आजादी के बाद शहरों की ओर जाने वाले युवाओं पर परंपराएं छोड़ने के आरोप लगे. 1990 के आर्थिक सुधारों के दौर की पीढ़ी को अत्यधिक भौतिकवादी कहा गया. इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की क्रांति के शुरुआती दौर में युवाओं को विदेशी सपनों के पीछे भागने वाला बताया गया, लेकिन समय ने साबित किया कि इन्हीं पीढ़ियों ने भारत के विकास के नए रास्ते खोले. Gen-Z भी उसी उदार समझ के हकदार हैं.
डिजिटल दौर की स्लैंग्स और बेबाक ज़ुबान के पीछे छिपी चेतना को अनदेखा करना भूल होगी. ये पीढ़ी केवल स्क्रीन तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र की नब्ज पर हाथ रखे खड़ी है. अपशब्दों के सतही आवरण को छीलकर देखें, तो यह Gen-Z आक्रोश की अभिव्यक्ति में नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण के नए और जीवंत संकल्प में तल्लीन है. और हां, Gen-Z को ग्लोबल बनने और भारतीय बने रहने के बीच किसी एक को चुनने की जरूरत भी नहीं है. जो अपनी सांस्कृतिक पहचान में विश्वास रखता है, वही सबसे सहज तरीके से दुनिया के साथ कदम मिला सकता है. अगर सरकारें अपनी युवा शक्ति का पूरा लाभ उठाना चाहती हैं तो उन्हें इस नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को भी समझना होगा.
हेमंत पाठक