सॉरी बाबासाहेब, अब प्रोटेस्ट का संविधान बदलना पड़ेगा!

हाथों में बाबासाहेब की तस्वीरें, जुबां पर गालियां और सड़कों से संसद के फैसले सुनाने की जिद- क्या यही है नया 'अंबेडकरवादी' प्रोटेस्ट? पेपर लीक से परेशान Gen-Z युवाओं के आक्रोश से लेकर सरकार के रवैये तक, कुछ भी ऐसा नहीं हो रहा है जिसे डॉ. भीमराव अंबेडकर के 25 नवंबर 1949 को दिए गए ऐतिहासिक भाषण 'ग्रामर ऑफ अनार्की' की कसौटी पर खरा कहा जा सके.

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बाबासाहेब आंबेडकर ने प्रोटेस्ट को लेकर जो बातें कही थीं, वो नई पीढ़ी के आगे आने के साथ पीछे छूटती जा रही हैं. (Photo- PTI) बाबासाहेब आंबेडकर ने प्रोटेस्ट को लेकर जो बातें कही थीं, वो नई पीढ़ी के आगे आने के साथ पीछे छूटती जा रही हैं. (Photo- PTI)

धीरेंद्र राय

  • नई दिल्ली,
  • 10 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:28 AM IST

‘हम हर पीढ़ी को एक अलग देश की तरह मान सकते हैं. हर पीढ़ी को केवल खुद के लिए नियम-कानून बनाने का अधिकार है, आने वाली अगली पीढ़ी पर अपने नियम थोपने का कोई अधिकार नहीं है- ठीक वैसे ही जैसे किसी एक देश के लोग दूसरे देश के लोगों पर अपने कानून नहीं थोप सकते.’

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने थॉमस जेफरसन के इस विचार को जब संविधान सभा में दोहराया था, तब शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं रहा होगा कि उनकी यह बात भारत का Gen-Z इतने बिंदास अंदाज में लागू कर देगा.

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अगर आप 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में दिया गया डॉ. आंबेडकर का आखिरी भाषण पढ़ लेंगे, तो आप समझ जाएंगे कि जंतर-मंतर की सड़कों पर जो कुछ हुआ, उसे बाबासाहेब 'न्यू एज प्रोटेस्ट' नहीं, बल्कि 'अराजकता का व्याकरण' (Grammar of Anarchy) कहकर खारिज कर चुके हैं.

लेकिन, आज का युवा सीधा संदेश दे रहा है कि जमाना बदल गया है. 1949 वाली गाइडबुक 2026 के इंस्टा-रील्स और वायरल ट्रेंड्स वाले दौर में आउटडेटेड हो गई है.

गाली देना कोई क्राइम थोड़ी है!

हाल ही में जब जंतर-मंतर पर पेपर लीक और बेरोजगारी से तंग आए Gen-Z युवाओं का हुजूम उमड़ा, तो हाथों में बाबासाहेब की तस्वीरें भी थीं. लेकिन इस बार का 'आंबेडकरवादी प्रोटेस्ट' थोड़ा अपग्रेड हो चुका था.

जब भीड़ में से प्रधानमंत्री को गालियां उछाली गईं. कुछ पर केस भी दर्ज हुए. लेकिन, नए जमाने के 'क्रांतिकारियों' के पास इसका बड़ा कूल जवाब था- ‘गुस्सा आ रहा है तो गाली दे दी. प्रोटेस्ट में गाली देना कोई क्राइम थोड़े ही है.’

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बात यहीं नहीं रुकी. बुद्धिजीवियों की तरफ से भी यह बात आई कि ‘अब इस देश के फैसले संसद में नहीं होंगे, फैसले तो सीधे सड़कों पर होंगे.’

आंबेडकर के प्रोटेस्ट पर विचार

बाबासाहेब का मानना था कि जब तक देश में अंग्रेजों का राज था, तब तक सड़कें जाम करना, कानून तोड़ना और सत्याग्रह करना सही था. लेकिन एक बार जब देश का अपना संविधान बन गया, संसद आ गई और हाथ में वोट का अधिकार मिल गया तो उसके बाद सड़कों पर जाकर विरोध-प्रदर्शन करना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता, बल्कि उसे दीमक की तरह चाट जाता है. अपने भाषण में तो डॉ. आंबेडकर ने सविनय अवज्ञा, अनशन, और सत्याग्रह का नाम लेकर विरोध किया, ऐसा करना लोकतंत्र को कमजोर करना होगा. जबकि ये विरोध के सारे तरीके महात्मा गांधी ने अपनाए हुए थे.

आज के दौर में प्रोटेस्ट का एक नया फॉर्मेट बन चुका है. क्रांतियां सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक हो रही हैं. अब मुद्दा क्या है, यह बात उतनी मायने नहीं रखती, जितना यह कि उस मुद्दे को लीड कौन सा 'इन्फ्लुएंसर' या 'यूट्यूबर' कर रहा है. रील रिवॉल्यूशन के दौर में जंग है इन्फ्लुएंसर बनाम इन्फ्लुएंसर की. Gen-Z प्रोटेस्ट रातोंरात इंस्टाग्राम में कई मिलियन फॉलोअर बटोर लेने वाले अभिजीत दिपके (कॉकरोच जनता पार्टी) लीड कर रहे थे, तो उनके सामने पीएम मोदी खुद थे. वन मैन इन्फ्लुएंसर.

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आंबेडकर ने राजनीति में इसी 'व्यक्ति-पूजा' और 'नायक-पूजा' (Hero-worship) के खिलाफ सबसे कड़ा अलर्ट जारी किया था. उन्होंने कहा था कि किसी भी महान व्यक्ति के चरणों में अपनी आजादी समर्पित मत कर दो.

आंबेडकर का मतलब 'गवर्नेंस' था, सिर्फ ’दलित’ नहीं, सरकार!

अगर आपको लगता है कि सिर्फ सड़कों पर उतरने वाले युवाओं ने आंबेडकर के विचारों को 'अपग्रेड' किया है, तो जरा सरकार बहादुर की ओर भी नजर-ए-इनायत कीजिये.

आज की सरकारें बाबासाहेब के विचारों की बात करते नहीं थकती हैं. उनके नाम पर भव्य स्मारक बनते हैं, तीर्थ सजते हैं और हर भाषण में संविधान का नमन होता है. लेकिन इस पूरे तमाशे में सरकार ने बाबासाहेब के साथ सबसे बड़ी चालाकी यह की है कि उन्हें 'गवर्नेंस' (सुशासन) के प्रतीक की जगह केवल एक 'दलित सिंबल' में समेटकर रख दिया है.

सरकार जब भी आंबेडकर को याद करती है, तो ऐसा लगता है मानो उनका काम सिर्फ एक वर्ग विशेष के अधिकारों तक सीमित था. सरकारें यह पूरी तरह भूल जाती हैं कि बाबासाहेब सिर्फ सामाजिक अधिकार कार्यकर्ता नहीं थे. 'आंबेडकरवाद' का मतलब एक ऐसी सरकार जो रोज जनता के सामने अपनी जवाबदेही साबित करे.

4 नवंबर 1948 को संविधान सभा में बोलते हुए डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट कहा था कि संसदीय लोकतंत्र में सरकार को हर दिन, हर मिनट संसद और जनता के सवालों का जवाब देना होगा.

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लेकिन आज जब किसी राज्य में धांधली होती है, पेपर लीक के माफिया खुलेआम घूमते हैं और लाखों नौजवानों का करियर तबाह हो जाता है, तब उस 'आंबेडकरवादी' सरकार की संवेदनशीलता कहां चली जाती है? तब जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले युवाओं पर लाठियां भांजी जाती हैं और पूरे मामले को टाल दिया जाता है. बाबासाहेब ने जिस संवेदनशीलता और पारदर्शी शासन की कल्पना की थी, आज का सरकारी ढांचा उससे मीलों दूर खड़ा नजर आता है.

क्या हुआ प्रोटेस्ट के संविधान का?

प्रोटेस्टर्स ने आंबेडकर की तस्वीर को ढाल तो बना लिया है, लेकिन उनके बनाए अनुशासन, 'संवैधानिक तरीकों' और 'कानून के राज' को उठाकर ताक पर रख दिया है. उधर, सरकार ने भी आंबेडकर की मूर्तियों पर फूल-मालाएं चढ़ाकर उन्हें एक 'चुनावी पोस्टर' बना दिया है, लेकिन जब आंबेडकर वाले 'सुशासन', 'पारदर्शिता' और 'रोजाना जवाबदेही' की बात आती है, तो सरकार कान में रुई डाल लेती है.

अगर यही नया 'संविधान' है, तो फिर हमें मान लेना चाहिए कि हमने बाबासाहेब को सिर्फ एक फोटो फ्रेम में कैद कर दिया है.

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