देवेंद्र फडणवीस पर डोरे क्‍यों डाल रही है शिवसेना यूबीटी? | Opinion

महाराष्ट्र में अगर बीजेपी के अच्छे दिन लौट आये हैं, तो देवेंद्र फडणवीस के सबसे अच्छे दिन चल रहे हैं. विधानसभा चुनाव में पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलाने के बाद देवेंद्र फडणवीस अपने राजनीतिक विरोधियों के भी 'देवाभाऊ' बन गये हैं.

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उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस की मुलाकात की ये खुशहाल तस्वीर दिसंबर, 2024 में आई थी. उद्धव ठाकरे और देवेंद्र फडणवीस की मुलाकात की ये खुशहाल तस्वीर दिसंबर, 2024 में आई थी.

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 06 जनवरी 2025,
  • अपडेटेड 3:54 PM IST

महाराष्ट्र की राजनीति में बीता 5 साल राजनीतिक रोमांच से भरपूर रहा है. बीजेपी से गठबंधन तोड़कर उद्धव ठाकरे का महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बन जाना. सत्ता परिवर्तन के बाद देवेंद्र फडणवीस का एकनाथ शिंदे का डिप्टी सीएम बन जाना. उद्धव ठाकरे और शरद पवार जैसे नेताओं का पार्टियां टूट जाने से अर्श से फर्श पर पहुंचा जाना - और आखिर में देवेंद्र फणवीस का समंदर की तरह सूबे की सत्ता के शिखर पर लौट आना. 

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लोकसभा चुनाव में चूक जाने के बाद देवेंद्र फडणवीस ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के जरिये ऐसी जोरदार वापसी की है कि सब कुछ बदला बदला नजर आ रहा है. फडणवीस के चुनावी प्रदर्शन ने सारे ही राजनीतिक विरोधियों को पस्त कर दिया है. परास्त होने वालों में उद्धव ठाकरे और शरद पवार ही नहीं, पूर्व मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे भी शामिल हैं. 

शिवसेना-यूबीटी के मुखपत्र सामना के संपादकीय में देवेंद्र फडणवीस की तारीफ, और संजय राउत के साथ साथ सुप्रिया सुले के मुंह से तारीफ में कसीदे तो जैसे कहर ढा रहे हैं - और हाल ये है कि देवेंद्र फडणवीस के करीबियों को भी ताज्जुब हो रहा है कि अचानक माजरा कैसे बदल गया. 

जब राजनीतिक विरोधी तारीफ में कसीदे पढ़ने लगें

देवेंद्र फडणवीस के करीबियों में उनके राजनीतिक विरोधियों के रिएक्शन से हैरानी होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि राजनीति में यूं ही कोई पाला तो बदलता नहीं है.

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तो क्या ये सब बीएमसी चुनावों के मद्देनजर हो रहा है?
 
क्या ये सब एकतरफा प्रयासों का हिस्सा है? या कोई बाहरी शक्ति भी परोक्ष रूप से रिंग मास्टर की भूमिका निभा रही है? कुछ मीडिया रिपोर्ट में इशारे तो ऐसे ही किये जा रहे हैं, और किसी उद्योगपति की भूमिका भी मानी जा रही है. 

महाराष्ट्र चुनाव के दौरान मराठी में बने 4 मिनट एक वीडियो में ‘देवा भाऊ’ खासा लोकप्रिय हुआ था. वीडियो में देवेंद्र फडणवीस को आधुनिक महाराष्ट्र के निर्माता के रूप में प्रोजेक्ट किया गया था - और बीजेपी की जीत में मराठी गीत की भी खास भूमिका मानी गई. 

हाल ही में, उसी अंदाज में शिवसेना-यूबीटी का एक संपादकीय भी आया - ‘अभिनंदन देवाभाऊ’

और ये संपादकीय महाराष्ट्र की राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले ज्यादातर लोगों को हैरान कर रहा है. हैरानी इसलिए भी हो रही है, क्योंकि उद्धव ठाकरे के सहयोगी नेता संजय राउत वाली ही भाषा शरद पवार की सांसद बेटी सुप्रिया सुले भी बोल रही हैं. 

सुप्रिया सुले का बयान ज्यादा हैरान करने वाला है. देवेंद्र फडणवीस शुरू से ही शरद पवार के निशाने पर रहे हैं. एक बार खबर तो ये भी आई थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शरद पवार की मुलाकात में बात इसलिए आगे नहीं बढ़ पाई थी, क्योंकि सुप्रिया सुले के लिए केंद्रीय कैबिनेट में जगह से साथ साथ किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की सलाह दे रहे थे. ये 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के कुछ दिन बात की ही बात है. 

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साल 2025 के पहले दिन नक्सल प्रभावित क्षेत्र गढ़चिरौली में देवेंद्र फडणवीस के दौरे के बारे में सुप्रिया सुले ने ये जरूर कहा है, देवेंद्र फडणवीस पहले दिन से ही एक्शन मोड में हैं… ऐसा लगता है कि वो अकेले हैं, जो सक्रिय होकर काम कर रहे हैं… कोई अन्य मंत्री एक्टिव नहीं है.

चुनावों से पहले जब देवेंद्र फडणवीस डिप्टी सीएम हुआ करते थे और गृह मंत्रालय उनके पास हुआ करता था, तो सुप्रिया सुले ने उनको पार्ट-टाइम होम मिनिस्टर बताया था, और आरोप लगाया था कि वो महाराष्ट्र के मसलों को हल करने के बजाय दिल्ली में ज्यादा व्यस्त रहते हैं.

सुप्रिया सुले का ये बयान ऐसे वक्त आया है जब महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम अजित पवार की मां आशा पवार परिवार के फिर से एक होने के लिए भगवान विट्ठल से प्रार्थना कर रही हैं.

और इसी दौरान शरद पवार के जन्मदिन के मौके पर हुआ एक दिलचस्प वाकया भी सुनने को मिला है. बताते हैं कि शरद पवार को बर्थडे की बधाई देने 12 दिसंबर को अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल केक लेकर पहुंचे थे, और केक पर लिखा था - ‘एक हैं तो सेफ हैं’.

आखिर प्रधानमंत्री मोदी का ये स्लोगन शरद पवार के बर्थडे केक पर लिखने का क्या मतलब है? 

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क्या उद्धव ठाकरे बीजेपी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं?

कोई दो राय नहीं कि उद्धव ठाकरे को भी बीजेपी की मदद की जरूरत महसूस हो रही होगी. और, बीजेपी ने चिराग पासवान से छीनी हुई गद्दी उनको फिर से दिलाकर एक उम्मीद तो जगा ही दी है. अगर बीजेपी की मेहरबानी हो तो फिर से उद्धव ठाकरे के भी अच्छे दिन लौट सकते हैं. 

‘देवाभाऊ, अभिनंदन!’ शीर्षक से प्रकाशित सामना के संपादकीय में लिखा गया है, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नये साल में काम की शुरुआत की और इसके लिए उन्होंने गढ़ चिरौली जिले को चुना. जब मंत्रिमंडल के कई मंत्री मलाईदार महकमों और विशेष जिले के ही पालकमंत्री पद के लिए अड़े हुए बैठे थे.
सामना लिखता है, जब पूरा देश नये साल के स्वागत और जश्न में मग्न था तब मुख्यमंत्री फडणवीस ने साल का पहला दिन गढ़चिरौली में बिताया... सिर्फ बिताया ही नहीं, बल्कि कई विकास परियोजनाओं का भूमिपूजन, उद्घाटन किया... कुछ परियोजनाओं का लोकार्पण किया... उन्होंने गढ़चिरौली के विकास के नये दौर का हवाला दिया... अगर मुख्यमंत्री ने जो कहा वो सच है तो ये न केवल गढ़चिरौली, बल्कि कहना होगा कि पूरे महाराष्ट्र के लिए सकारात्मक होगा.

सवाल ये उठता है कि अगर उद्धव ठाकरे दोस्ती का हाथ बढ़ाना चाहते हैं, तो चिराग पासवान की तरह बदले में देने के लिए उनको पास भी कुछ है क्या? चिराग पासवान ने तो बिहार से 5 लोकसभा सीटें भी जीतकर बीजेपी के सहयोग में दे रखी है. 

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उद्धव ठाकरे कैंप की तरफ से सामना में देवेंद्र फडणवीस की तारीफ के बाद कुछ और तो नहीं कहा गया है, लेकिन आने वाले दिनों में बीएमसी चुनाव के लिए उद्धव ठाकरे उपयोगी तो साबित हो ही सकते हैं - बल्कि, एकनाथ शिंदे से ज्यादा उपयोगी भी साबित हो सकते हैं. 

अगर उद्धव ठाकरे के पास अब भी कुछ बचा है, तो मुंबई में एकनाथ शिंदे के मुकाबले उनका प्रभाव ज्यादा होना चाहिये. एकनाथ शिंदे का प्रभाव ठाणे में ज्यादा है, मुंबई के मुकाबले - और लगता है यही सोचकर उद्धव ठाकरे की तरफ से देवेंद्र फडणवीस के बहाने बीजेपी को सिग्नल दिया गया है. 

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