युद्ध खत्म हो चुका था. ट्रॉय जलकर राख हो गया. योद्धा अपने-अपने घर लौट गए. दस बरस बीत गए लेकिन ओडिसियस अब तक घर नहीं पहुंचा. उसे अपने घर इथाका पहुंचना है. सामने अथाह समंदर है. पत्नी पेनलपी और बेटा टेलीमेकस वर्षों से उसकी बाट जोह रहे हैं. वह जहाज पर सवार है और बस किसी तरह लौटना चाहता है.
कहने को तो वो ट्रॉय का विजेता है लेकिन क्रिस्टोफर नोलन की द ओडिसी में ओडिसियस अपने ही फैसलों और उससे उपजी पीड़ा की ग्लानि लिए आगे बढ़ रहा है. वह अपराध बोध से भरा हुआ है. यह उस आदमी की दास्तां है जो युद्ध जीतने के बाद अपने जमीर तक लौटने की कोशिश कर रहा है.
नोलन की द ओडिसी को अगर सिर्फ एक भव्य पौराणिक फिल्म समझा जाए तो सरासर नाइंसाफी होगी. ओडिसियस एक ऐसा इंसान है, जो अपने अतीत के बोझ तले दबा हुआ है. यहां उसे सिर्फ एक नायक की नजर से देखना गलत होगा. ओडिसी किसी नायक की विजय गाथा से कहीं ज्यादा एक ऐसे मनुष्य की कहानी है, जो अपनी गलतियों के साथ आगे बढ़ना सीख रहा है.
ट्रॉय पर फतह के लिए ट्रोजन हॉर्स की योजना ओडिसियस के ही दिमाग की उपज थी, जिसने इस युद्ध का रुख बदल दिया था. लेकिन नोलन की ये फिल्म इसी फैसले को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर देती है कि क्या युद्ध में हासिल की गई फतह इंसान के जमीर को भी संतुष्ट कर सकती है?
द ओडिसी का पूरा कथानक मानो इसी सवाल का उत्तर खोजता है. ओडिसियस जितना समंदर में भटकता है, उससे कहीं अधिक वह अपने अतीत में भटक रहा है. उसके सामने आने वाली हर मुश्किल सिर्फ बाहरी चुनौती नहीं, बल्कि उसके भीतरी संघर्ष का आईना है. समंदर का हर टापू, हर तूफान और हर दैत्य उसके भीतर छिपे किसी डर, लालच या किसी अपराधबोध का चेहरा बन जाता है.
नोलन की फिल्मों की खासियत यही है कि वे बाहर से जितनी भव्य दिखती हैं, भीतर से उतनी ही मानवीय और उलझी हुई होती हैं. द ओडिसी में भी एक तरफ समंदर, युद्ध और पौराणिक दुनिया का विराट कैनवस है तो दूसरी तरफ एक ऐसे आदमी का भीतरी संघर्ष है, जो अपने ही बोझ के साथ जी रहा है. ओडिसियस का सफर सिर्फ घर लौटने की यात्रा नहीं है, बल्कि खुद को समझने, अपनी सीमाओं को स्वीकार करने और टूटे हुए मन के साथ आगे बढ़ने की कहानी है.
इस फिल्म की खूबी यही है कि यहां कोई भी किरदार बस किरदार भर नहीं है. वो किसी लड़ाई का प्रतीक है इसलिए ओडिसियस का हर पड़ाव उसके चरित्र की एक परीक्षा है. ट्रॉय युद्ध के बाद जब ओडिसियस समुद्र में भटकता है, तो उसका जहाज नष्ट हो जाता है और वह बहकर ओगीजिया द्वीप पर पहुंचता है, जहां कैलिप्सो उसे बचाती है और उससे प्रेम करने लगती है. वह चाहती है कि ओडिसियस हमेशा उसके साथ रहे. लेकिन ओडिसियस घर लौटना चाहता है. यहां कैलिप्सो और उसके द्वीप को आकर्षण से जोड़कर देखा जा सकता है.
समंदर में भटक रहे ओडिसियस और उसके साथियों का सामना ऐसे कई दैत्यों और देवी-देवताओं से होता है जो इथाका लौटने की उनकी राह में रोड़ा बन जाते हैं. चाहे बात एक आंख वाले दैत्य पॉलीफेमस की हो, जो समुद्र के देवता पोसाइडन का बेटा है. ओडिसियस उसकी आंख फोड़कर अपने साथियों के साथ बच निकलता है.
सर्सी नाम की जादूगरनी ओडिसियस के साथियों को सुअरों में तब्दील कर देती है. इस दृश्य में नोलन का सिनेमाई करिश्मा बखूबी झलकता है. ओडिसियस मृतकों की दुनिया में अपने अतीत से मिलता है, जो असल में उसके अतीत के अपराध हैं, जिन्हें वो पीछे छोड़ आया है. ओडिसियस जिन-जिन राक्षसों से लड़ता है, वे समुद्र में नहीं रहते. वे इंसान के भीतर रहते हैं. कभी वे अहंकार बन जाते हैं. कभी लालच, कभी मोह, कभी झूठी प्रसिद्धि और कभी प्रलोभन.
ओडिसियस के किरदार को और गहरा बनाता है, उसके पश्चाताप का पहलू. ओडिसियस की बुद्धिमानी उसकी ताकत है लेकिन वही उसकी नैतिक कमजोरी भी बन जाती है. फिल्म में बार-बार Zews law की बात की गई है यानी देवताओं के नियम, जिनका सभी पालन करने की बात करते हैं लेकिन जब ओडिसियस के सैनिक पूरे ट्रॉय शहर को तबाह कर देते हैं तो मंदिर की एक पुजारिन का सिर कलम कर दिया जाता है. नोलन ने बड़े असरदार तरीके से इस सीन को पर्दे पर उकेरा है.
लड़की का सिर कलम होते पर्दे पर नहीं दिखाया गया बल्कि सांकेतिक रूप से एथेना की मूर्ति का सिर कलम होते दिखाया गया है. एथेना जिसे प्राचीन यूनान में बुद्धि की देवी माना जाता है. यही वो क्षण है, जब ओडिसियस को अहसास होता है कि उसने देवताओं के नियमों का उल्लंघन कर दिया है और युद्ध जीतकर भी हार गया है. ओडिसियस वर्षों तक ट्रॉय के युद्ध को जस्टिफाई करता रहा लेकिन इस घटना ने उसे झकझोर दिया. वह ग्लानि से भर जाता है.
नोलन ने शुरुआत से लेकर अंत तक कई जगह एथेना को ओडिसियस के गाइड के तौर पर पेश किया है. फिल्म में एथेना का स्वरूप असल में उसी लड़की का है, जिसका ओडिसियस के सैनिकों ने सिर कलम कर दिया था.
नोलन ने एक तरह से एथेना को ओडिसियस के अपराध बोझ से जोड़कर पेश किया है, जो बार-बार उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है, जो इसे और मानवीय बना देता है क्योंकि जब आपको नायक की कमजोरी पता हो तो उसकी जीत और ज्यादा मायने रखती है. ओडिसियस अपनी गलतियों को स्वीकार करता हुआ चलता है और शायद इसी में उसका असली हीरोइज्म छिपा है.
आखिरकार द ओडिसी इसलिए याद रह जाती है क्योंकि यह हीरोइज्म की पारंपरिक परिभाषा को उलट देती है. यह हमें बताती है कि असली नायक वह नहीं होता जो हर लड़ाई जीत जाए बल्कि वह होता है जो अपनी हार, अपनी गलतियों और अपराधबोध के बावजूद इंसान बना रहे. ओडिसियस की सबसे बड़ी जीत जंग में नहीं बल्कि अपनी अतीत की गलतियों से सीख लेने की थी.
इसी वजह से वो आदर्श से कहीं अधिक सच्चा लगता है. नोलन की द ओडिसी का यही सबसे बड़ा असर है कि ये पुरानी कहानी को नई रोशनी में दिखाती है और नायक को देवता के ओहदे से नीचे लाकर एक ऐसे इंसान के रूप में रख देती है जिसका संघर्ष हम सब समझ सकते हैं.
रितु तोमर