टूटा पैर, खाली जेब और 150 KM की दूरी... ट्राईसाइकिल से अस्पताल पहुंचा बुजुर्ग, भावुक कर देगी ये कहानी

73 साल की उम्र, बायां पैर फ्रैक्चर, जेब में इलाज के पैसे नहीं और साथ में कोई अपना भी नहीं. लेकिन इलाज की उम्मीद ने ओडिशा के सुकदेव नाहक को हार नहीं मानने दी. उन्होंने करीब 150 किलोमीटर का सफर ट्राईसाइकिल से तय कर दो दिन बाद अस्पताल पहुंचकर दुनिया को बता दिया कि हौसले की कोई उम्र नहीं होती.

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ओडिशा के 73 साल के सुकदेव के हौसले की कहानी. (Photo: Screengrab) ओडिशा के 73 साल के सुकदेव के हौसले की कहानी. (Photo: Screengrab)

अजय कुमार नाथ

  • भुवनेश्वर,
  • 07 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 9:22 AM IST

कुछ सफर मंजिल तक पहुंचने के अलावा इंसान की हिम्मत की कहानी बन जाते हैं. ओडिशा के गंजाम में जब एक बुजुर्ग तीन पहियों वाली ट्राईसाइकिल पर अस्पताल के गेट तक पहुंचे, तो वहां मौजूद लोग उन्हें हैरानी से देखने लगे. उम्र 73 साल... बायां पैर फ्रैक्चर... जेब लगभग खाली... साथ में कोई अपना नहीं... लेकिन आंखों में एक उम्मीद थी कि अगर अस्पताल पहुंच गया, तो शायद फिर से चल सकूंगा.

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ये कहानी है ओडिशा के नयागढ़ जिले के बरासाही गांव में रहने वाले सुकदेव नाहक की. ऐसी कहानी, जिसमें गरीबी है, अकेलापन है, दर्द है... लेकिन सबसे ज्यादा है जीने की जिद. सुकदेव कभी गांव के चौकीदार हुआ करते थे. छोटी-सी नौकरी थी, लेकिन उससे किसी तरह घर चल जाता था. पत्नी साथ थीं, बेटा था, जिंदगी किसी तरह पटरी पर चल रही थी. फिर वक्त ने करवट ली.

साल 2011 में पत्नी का निधन हो गया. घर की सबसे बड़ी ताकत चली गई. बेटा मानसिक रूप से बीमार हो गया और काम करने की हालत में नहीं रहा. घर की जिम्मेदारी पूरी तरह सुकदेव के कंधों पर आ गई. इसी बीच एक हादसे ने उनकी जिंदगी को और मुश्किल बना दिया. 

दुर्घटना में उनका बायां पैर टूट गया. दर्द इतना था कि चलना मुश्किल हो गया, लेकिन उससे भी बड़ा दर्द था इलाज के लिए पैसे न होना. कई दिनों तक उन्होंने गांव में ही जैसे-तैसे समय बिताया. लेकिन जब दर्द असहनीय हो गया, तो उन्होंने तय कर लिया कि अब इलाज कराना ही होगा.

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न पैसे... न कोई सहारा... फिर भी निकल पड़े

किसी आम इंसान के लिए 150 किलोमीटर का सफर भी आसान नहीं होता. लेकिन सोचिए, एक 73 साल का बुजुर्ग... जिसका पैर टूटा हो... जिसके पास पैसे न हों... और जो ट्राइसाइकिल चलाकर इतना लंबा सफर तय करने निकले. सुकदेव ने किसी का इंतजार नहीं किया. उन्होंने अपनी पुरानी ट्राइसाइकिल उठाई और ओडिशा के बरासाही गांव से बरहामपुर स्थित एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के लिए निकल पड़े. यह सफर एक-दो घंटे का नहीं था.

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लगातार करीब दो दिन तक वह सड़क पर चलते रहे. कभी धूप मिली, कभी रात का अंधेरा. कहीं सड़क समतल थी तो कहीं ऊबड़-खाबड़. हर पैडल के साथ टूटा हुआ पैर दर्द से कराहता रहा, लेकिन उनके इरादे नहीं डगमगाए. रास्ते में अनजान लोग मिले, जिन्होंने उम्मीद जिंदा रखी. 

सुकदेव के पास इतना भी पैसा नहीं था कि रास्ते में खाना खरीद सकें. रास्ते में जिन लोगों ने उनकी हालत देखी, उन्होंने उन्हें खाना खिलाया, पानी दिया और आगे बढ़ने की हिम्मत दी. बस एक घायल बुजुर्ग को देखकर मदद का हाथ बढ़ा दिया. शायद उन्हीं अनजान लोगों की दया ने सुकदेव की ताकत को जिंदा रखा और उनकी ट्राइसाइकिल आगे बढ़ती रही.

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दो दिन बाद अस्पताल का गेट... और आंखों में उम्मीद

करीब 150 किलोमीटर का सफर पूरा करने के बाद आखिरकार सुकदेव बरहामपुर के एमकेसीजी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल पहुंच गए. अस्पताल के कर्मचारियों ने जब उनकी कहानी सुनी, तो हर कोई भावुक हो गया. डॉक्टरों ने तुरंत उनकी जांच की. अस्पताल प्रशासन ने भरोसा दिलाया कि उनकी पूरी जांच होगी और जो भी इलाज जरूरी होगा, वह कराया जाएगा. मेडिकल सुपरिंटेंडेंट की देखरेख में अधिकारियों ने कहा कि पहले सभी मेडिकल टेस्ट किए जाएंगे. रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टर इलाज शुरू करेंगे.

सुकदेव ने अपनी कहानी सुनाते हुए कहा कि मैं नयागढ़ जिले के बरासाही गांव का रहने वाला हूं. इलाज के लिए ट्राइसाइकिल से बरहामपुर आया. करीब दो दिन लगे. रास्ता बहुत कठिन था, लेकिन इलाज कराना था. लोगों ने रास्ते में खाना दिया, तभी मैं यहां तक पहुंच पाया. मेरा बायां पैर टूटा हुआ है. मेरा बेटा मानसिक रूप से बीमार है और काम नहीं कर सकता. पत्नी का 2011 में निधन हो गया. डॉक्टरों ने मुझे देख लिया है. मुझे उम्मीद है कि मैं ठीक होकर फिर से चल सकूंगा.

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इन शब्दों में शिकायत कम और उम्मीद ज्यादा थी. यह सिर्फ एक सफर नहीं... समाज के लिए आईना भी है. सुकदेव की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग के संघर्ष की कहानी नहीं है. यह कई सवाल भी छोड़ जाती है. क्या इलाज के लिए किसी बुजुर्ग को टूटा पैर लेकर 150 किलोमीटर ट्राइसाइकिल से जाना पड़ेगा? क्या गरीबी आज भी किसी इंसान के इलाज की सबसे बड़ी दुश्मन बनी हुई है? क्या हमारे गांवों तक स्वास्थ्य सेवाएं इतनी आसानी से नहीं पहुंच पातीं कि एक घायल बुजुर्ग को दो दिन सड़क पर बिताने पड़ें? इन सवालों के जवाब सिस्टम को तलाशने होंगे.

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लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा मैसेज अलग है. हर इंसान के जीवन में ऐसे पल आते हैं, जब हालात हार मान लेने को कहते हैं. सुकदेव के पास हार मानने की हर वजह थी. पत्नी नहीं थीं. बेटा सहारा नहीं बन सकता था. पैसे नहीं थे. पैर टूटा हुआ था. उम्र 73 साल थी, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. उन्होंने दर्द को पीछे छोड़ा और उम्मीद को आगे बैठाकर ट्राइसाइकिल चला दी. 

शायद इसलिए सुकदेव नाहक की यह यात्रा सिर्फ 150 किलोमीटर की दूरी तय करने की कहानी नहीं है. यह उस दूरी को पार करने की कहानी है, जो अक्सर इंसान अपने मन में बना लेता है. और शायद इसी वजह से ओडिशा का यह बुजुर्ग आज सिर्फ एक मरीज नहीं, बल्कि हौसले, आत्मविश्वास और जीने की अदम्य इच्छा का प्रतीक है.

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