आगर मालवा जिले के सोयतकलां में मंगलवार को डोल ग्यारस यानी जलझूलनी एकादशी का पर्व आस्था, भक्ति और लोकपरंपरा के रंग में मनाया गया. शाम होते-होते पूरा नगर भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति में डूब गया. अलग-अलग मंदिरों से भगवान श्री बालकृष्ण के तीन दर्जन से अधिक बाल विग्रह आकर्षक देव-विमानों में विराजित होकर नगर भ्रमण पर निकले. हजारों श्रद्धालु इस अनोखे सामूहिक दर्शन के गवान बने.
सोयतकलां में डोल ग्यारस का यह आयोजन सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही ऐसी परंपरा है, जिसमें नगर के अलग-अलग मंदिरों में विराजित बालकृष्ण के विग्रह साल में एक बार एक साथ श्रद्धालुओं के बीच आते हैं. इस दौरान पूजा-अर्चना, महाआरती, भजन-कीर्तन और फिर कंठाल नदी में देव-विमानों का जल विहार होता है.
जलझूलनी एकादशी महोत्सव की शुरुआत शाम करीब 3 बजे हुई. अलग-अलग मंदिरों से सजाए गए देव-विमान सबसे पहले छत्री चौक पहुंचे. यहां भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना की गई.
इसके बाद सभी देव-विमानों को नगर के मध्य स्थित माधव चौक ले जाया गया. यहां भगवान के बाल स्वरूपों के सामूहिक दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे.
माधव चौक पर तीन महाआरतियों के साथ भगवान का महाअभिषेक किया गया. आरती के दौरान पूरा चौक श्रद्धालुओं से भर गया. महिला, पुरुष, युवा और बच्चे सभी भगवान के बाल स्वरूपों के दर्शन करने पहुंचे. घंटियों की आवाज, भजन-कीर्तन और जय श्रीकृष्ण के जयघोष से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया.
डोल ग्यारस की सबसे खास बात यहां होने वाला सामूहिक देव-दर्शन है. साल में एक बार सोयतकलां के अलग-अलग मंदिरों में विराजित श्री बालकृष्ण के विग्रह एक साथ देव-विमानों में सजकर नगर में निकलते हैं. इस बार भी तीन दर्जन से ज्यादा बाल विग्रह एक साथ देव-विमानों में विराजित किए गए. श्रद्धालुओं ने इन देव-विमानों की पूजा की और भगवान के सामने अपनी मनोकामनाएं रखीं.
स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन धार्मिक आस्था के साथ-साथ नगर की सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है. लेकिन इस पूरे आयोजन का सबसे खास दृश्य अभी बाकी था. नगर भ्रमण के बाद सभी देव-विमान भजन-कीर्तन करते हुए कंठाल नदी की ओर बढ़े. नदी तट पर पहुंचने के बाद एक बार फिर भगवान की आरती की गई. इसके बाद सदियों से चली आ रही परंपरा के मुताबिक देव-विमानों को कंठाल नदी के जल में तैराया गया.
नदी की लहरों पर सजे हुए देव-विमान और उनके बीच विराजित भगवान के बाल स्वरूप. आसपास खड़े हजारों श्रद्धालु. कहीं भजन-कीर्तन हो रहा था तो कहीं भगवान के जयकारे लग रहे थे. नदी में देव-विमानों का जल विहार इस आयोजन का सबसे आकर्षक हिस्सा रहा. श्रद्धालु इस दृश्य को अपने मोबाइल कैमरों में भी कैद करते नजर आए. यहां आस्था और लोकपरंपरा का ऐसा मेल दिखाई दिया, जो सोयतकलां के डोल ग्यारस उत्सव को अलग पहचान देता है.
कंठाल नदी में जल विहार के बाद देव-विमान फिर भजन-कीर्तन करते हुए पेड़ियाघाट स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर की ओर रवाना हुए. मंदिर परिसर में पहुंचने के बाद सामूहिक महाआरती की गई. भगवान का फिर से पूजन और अभिषेक हुआ. इसके बाद सभी देव-विमानों को उनके-अपने मंदिरों की ओर रवाना किया गया. इस दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ पूरे रास्ते बनी रही.
नदी किनारे रात में रोशनी का नजारा
धार्मिक आयोजन के बाद रात में सोयतकलां के आसमान ने भी अलग रंग दिखाया. स्टॉप डेम के पास नगर परिषद की ओर से भव्य रात्रिकालीन आतिशबाजी की गई. अंधेरे आसमान में रंग-बिरंगी रोशनी, नीचे नदी और आसपास मौजूद श्रद्धालुओं की भीड़. दिनभर चले धार्मिक आयोजन का यह आखिरी हिस्सा भी लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा. नदी, देव-विमान, भजन-कीर्तन और फिर आतिशबाजी. डोल ग्यारस की रात सोयतकलां में धार्मिक आस्था और लोक उत्सव का ऐसा संगम दिखाई दिया, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटे.
सोयतकलां में जलझूलनी एकादशी की यह परंपरा बताती है कि कुछ पर्व सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं होते. वे पीढ़ियों से चले आ रहे विश्वास, संस्कृति और सामूहिक जीवन का हिस्सा बन जाते हैं. डोल ग्यारस भी इसी परंपरा का एक ऐसा उत्सव है, जब साल में एक बार अलग-अलग मंदिरों के बालकृष्ण एक साथ नगर में निकलते हैं, नदी में जल विहार करते हैं और पूरा शहर उनके स्वागत में भक्ति के रंग में रंग जाता है.
प्रमोद कारपेन्टर