केले के पत्ते पर सजी साध्या की थाली… ओणम पर सिटी तो दिल्ली ही थी, लेकिन वाइब केरलम की थी!

पहला कौर लेते ही मुंह में कुछ घुलने लगा. माट्टा राइस एक दम गोल गोल भात. फर्स्ट एक्सपीरियंस. मजा आ गया. तभी अंगुली इंजि पुली की ओर गई. इंजि पुली यानी कि गुड़ के साथ अदरक की चटनी. फिर अंगुली गई मुंह में. वाह... लिटरली चटखारा लिया. अंदर स्वाद की लहरी उठ रही थी, लेकिन चेहरे पर बैलेंस बनाए रखना जरूरी था. सैकड़ों मलयाली के बीच इमेज का भी खयाल करना होता है.

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उत्तरा गुरुवायुरप्पन मंदिर में ओणम सेलिब्रेशन (Photo: ITG) उत्तरा गुरुवायुरप्पन मंदिर में ओणम सेलिब्रेशन (Photo: ITG)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 26 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 4:23 PM IST

सिटी तो दिल्ली ही थी, लेकिन वाइब केरल का था. सॉरी... आज से केरलम. अब तो केंद्र का नोटिफिकेशन भी आ गया. तो आज मैं ओणम के मौके पर पूर्वी दिल्ली के उत्तरा गुरुवायुरप्पन मंदिर में पहुंचा.  मंदिर के सामने उतरते ही एम्बियंस साउथ इंडिया का हो गया. बालों में मुल्लाप्पु के गजरे लगाई स्त्रियां, पारंपरिक केरल की धोती यानी मुंडु पहने पुरुष. मुल्लाप्पु नहीं समझे. अरे चमेली. चमेली के फूल का गजरा लगाई महिलाएं. इनकी अटेंडेंस तो करीब 80-90 फीसदी थी. 

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किसी के हाथ में पूजा की थाली थी तो, कोई दीये जला रहा था. तो जेन जी मोबाइल से सेल्फी और तस्वीरें उतार रही थीं. दिल्ली में भले ही मलयाली संस्कृति की झलक थी. भाषा भले अलग थी, लेकिन उत्सव का उल्लास बिल्कुल अपना-सा लग रहा था. 

हैप्पी ओणम कहते लोग, दोस्तों से मिलते लोग, उमस भगाने साड़ी के पल्लू से पंखा करती महिलाएं, टिशू पेपर से गाल पोछतीं लड़कियां.

और फिर आया उस पूरे अनुभव का सबसे खास हिस्सा साध्या. यानी को केले के पत्ते पर वो थाली जिसमें 15 से 17 आइटम खाने के थे. 

जहां तक मैं समझ पाया केले के पत्ते केरल से ही मंगाए गए थे. कुछ लोग एकदम नाप नाप कर केले को पतों को आकार दे रहे थे. 

एक एसी हॉल लगभग 700 लोगों के लिए टेबल कुर्सी लगा हुआ था. 

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केले के पत्ते पर एक-एक करके व्यंजन परोसे जा रहे थे. यहां खाना सिर्फ खाना नहीं था, बल्कि एक पूरी परंपरा थी. 

किससे शुरू करूं. साध्या यानी व्यंजन ही व्यंजन.

माट्टा राइस
परिप्पु करी (दाल)
सांभर
रसम
अवियल
ओलन
कालन
एरिसेरी
थोरन
पचड़ी / खिचड़ी
पुलिस्सेरी
इंजि पुली
अचार 
उपरी (केले के चिप्स)
शर्करा वरट्टी
पापड़म

और आगे कागज के दो दोनों में दो तरह की खीर- चने की दाल और गुड़ की खीर, और मुंह में पिघल जाने वाली चावल की खीर. कुल मिलाकर 15-16 व्यंजन थे.

पूरा आइटम डालने में 10 से 15 मिनट लगे. आखिर एक राउंड में 500-700 लोग खाने बैठ रहे थे. 

बड़ी मुश्किल थी. शुरुआत किससे की जाए. पत्ते की ताजगी, चावल की भाप और नारियल-तेल की हलकी सुगंध मुश्किल बढ़ा रही थी. 

आखिरकार बिहारी होने का लाभ लेते हुए चावल यानी कि माट्टा राइस और सांभर से शुरुआत की गई. 

मुंह में कुछ घुलने लगा. माट्टा राइस एक दम गोल गोल भात. फर्स्ट एक्सपीरियंस. मजा आ गया. तभी अंगुली इंजि पुली की ओर गई. फिर मुंह में. वाह... लिटरली चटखारा लिया. अंदर स्वाद की लहरी उठ रही थी, लेकिन चेहरे पर बैलेंस बनाए रखना जरूरी था. सैकड़ों मलयाली के बीच इमेज का भी खयाल करना होता है. 

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इंजि पुली यानी की अदरक और गुड़ की चटनी. तीखा, मीठा और खट्टा, तीनों स्वाद एक साथ मुंह में नाचने लगे. सचमुच ही चटनी स्वाद तंतुओं पर जादू करती है. जायका और मिजाज दोनों ही बदल गए. 

एक-एक कर सारे आइटम सधाये गए. यूं तो लोग मीठा लास्ट में खा रहे थे. लेकिन हमने चने की दाल की खीर को बीच में ही चखा. आह... क्या दिव्य अनुभूति. लगा मुंह में कुछ गल रहा है. चने की दाल की खीर यानी कि Kadala Parippu Payasam.  गाढ़ी, सुगंधित और गुड़ की मिठास से लबरेज. 

ध्यान रहे इसे खाया नहीं घोंटा गया. 

चावल की खीर भी यादगार रही. एकदम नरम, मुंह में घुल जाने वाली. दूध और चावल का वह मधुर संयोग इतना हल्का और दिव्य था कि आंखें बंद करके खाते हुए लगा बस ये चीज गले से नीचे उतरे ही नहीं. 

केरल का पापड़म अपने यहां के पापड़ से थोड़ा अलग होता है. कुछ चीजें ठंडी थी लेकिन स्वाद कायम था. केले के चिप्स का कुरकुरापन बीच बीच में मजा बढ़ा रहा था.  

मीठा, खट्टा, नमकीन और मसालेदार...सब कुछ एक पत्ते पर एक साथ मौजूद था, जैसे जीवन के सारे स्वाद एक थाली में समा गए हों. 

और हां... मैंने हाथों से खाया, जैसे केरलम में खाया जाता है. 

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मुझे सबसे अच्छा यह लगा कि इस पूरे अनुभव में भोजन और संस्कृति एक-दूसरे से अलग नहीं थे.
 

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