आजकल घरों में बच्चों और माता-पिता के बीच कई बातों को लेकर बहस होती है. कभी फोन चेक करने पर, कभी दोस्तों के साथ बाहर जाने पर, तो कभी पर्सनल लाइफ में दखल देने पर. ऐसे में जेन जी अक्सर कहते सुनाई देते हैं, ‘ये मेरी बाउंड्री है’ या ‘प्लीज मेरी बाउंड्री का ध्यान रखें’. लेकिन आखिर जेन जी हर बात पर अपनी बाउंड्री की बात क्यों करती है? और पेरेंट्स के लिए इसे समझना क्यों जरूरी है?
क्या होती हैं पर्सनल बाउंड्री?
पर्सनल बाउंड्री का मतलब है अपनी पर्सनल लाइफ, फीलिंग्स, टाइम और फैसलों को लेकर अपनी बाउंड्रीज यानी सीमाएं तय करना. आसान भाषा में कहें, तो ये बताना कि आपको कौन-सी बात अच्छी लगती है और कौन-सी बात आपको परेशान करती है.
उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति नहीं चाहता कि उसके माता-पिता बिना पूछे उसका फोन चेक करें या हर पर्सनल बात जानने की कोशिश करें. इसका मतलब ये नहीं कि वो अपने माता-पिता से कुछ छिपाना चाहता है. हो सकता है कि वो अपनी निजी जिंदगी के लिए थोड़ी जगह चाहता हो.
जेन जी के लिए बाउंड्री क्यों जरूरी है?
जेन जी अपनी पसंद, पर्सनल लाइफ और मेंटल पीस को अहमियत देते हैं. वे चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए और उनके फैसलों की रिसपेक्ट हो. कई बार पेरेंट्स की टेंशन और बच्चों की फ्रीडम की जरूरत के बीच टकराव हो जाता है.
उदाहरण के लिए, माता-पिता बार-बार फोन करके पूछते हैं कि बच्चा कहां है और किसके साथ है. उनके लिए ये चिंता की बात हो सकती है, लेकिन बच्चे को लग सकता है कि उस पर भरोसा नहीं किया जा रहा. ऐसे में दोनों के बीच गलत फहमी पैदा हो सकती है.
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पेरेंट्स को क्या समझना चाहिए?
पेरेंट्स के लिए ये समझना जरूरी है कि बच्चों का बड़ा होने के साथ अपनी पसंद और पर्सनल लाइफ होना नॉर्मल है. हर बात पर सवाल पूछना, दूसरों से कम्पेयर करना या उनकी फीलिंग्स को इग्नोर करना बच्चों को परेशान कर सकता है.
इसका मतलब ये नहीं है कि पेरेंट्स बच्चों को एडवाइज देना या उनकी चिंता करना छोड़ दें. जरूरी ये है कि वे अपनी बात कहने के साथ बच्चों की बात भी सुनें. अगर बच्चा किसी मुद्दे पर अपनी बाउंडरी तय करता है, तो उससे गुस्सा होने के बजाय ये समझने की कोशिश करें कि उसे ऐसा क्यों लग रहा है.
बाउंड्री का मतलब रिश्तों में दूरी नहीं
बाउंड्री फिक्स्ड करने का मतलब पेरेंट्स से दूर होना या उनकी बात न मानना नहीं है. इसका मतलब रिश्ते में एक-दूसरे की फीलिंग्स और जरूरतों की रिस्पेक्ट करना है. बच्चों को भी समझना चाहिए कि अपनी बात रखने का तरीका मायने रखता है. वे अपनी परेशानी बिना चिल्लाए और सामने वाले को नीचा दिखाए भी बता सकते हैं.
जेन जी का बाउंड्रीज़ वाला कॉन्सेप्ट सिर्फ पेरेंट्स तक ही लागू नहीं होता. जेन जी अपने हर रिश्ते और स्पेस में अपनी बाउंड्रीज़ क्रिएट कर के रखता है. और उसे किसे कितना वक्त देना है, कितना मिलना या जुलना है ये वो उस बाउंडरी के तहत ही डिसाइड करता है.
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