Loneliness in Young Adults: जब हम किसी अकेले इंसान की कल्पना करते हैं तो अक्सर हमारे दिमाग में किसी बुजुर्ग की तस्वीर आती है, जो घर में अकेला रहता है. लेकिन आज की दुनिया में अकेलापन सिर्फ बढ़ती उम्र की समस्या नहीं रह गया है. कई रिपोर्ट्स और सर्वे बताते हैं कि 20 से 30 साल की उम्र के लोग भी बड़ी संख्या में अकेलापन महसूस करते हैं, जबकि यही उम्र दोस्ती, घूमने-फिरने और जिंदगी को खुलकर जीने की मानी जाती है. सोशल मीडिया पर हजारों फॉलोअर्स, फोन में सैकड़ों कॉन्टैक्ट और आसपास लोगों की भीड़ होने के बावजूद कई युवा अंदर से बेहद अकेले महसूस करते हैं.
स्कूल और कॉलेज के दिनों में दोस्त बनाना आसान होता है. रोज एक ही जगह जाना, एक ही क्लास में बैठना और लगातार लोगों से मिलना दोस्ती को अपने आप मजबूत बना देता है. लेकिन कॉलेज खत्म होते ही जिंदगी अचानक बदल जाती है. कोई नौकरी के लिए दूसरे शहर चला जाता है, कोई शादी कर लेता है, किसी की पढ़ाई आगे बढ़ जाती है और कोई अपने करियर में इतना व्यस्त हो जाता है कि दोस्तों से मिलने का समय ही नहीं मिलता. यहीं से कई लोगों को पहली बार महसूस होता है कि अब दोस्ती पहले की तरह अपने आप नहीं बनती. अब किसी से मिलने के लिए समय निकालना पड़ता है, मैसेज करना पड़ता है और कोशिश करनी पड़ती है.
सोशल मीडिया ने बढ़ाई दूसरे लोगों से तुलना
साइकोलॉजिस्ट पवन गुगरी कहते हैं कि अकेलापन महसूस करने की एक बड़ी वजह सोशल मीडिया भी बन सकता है. फोन खोलते ही ऐसा लगता है कि बाकी सभी लोग अपनी जिंदगी का भरपूर आनंद ले रहे हैं. कोई दोस्तों के साथ पार्टी कर रहा है, कोई ट्रिप पर है और किसी की जिंदगी तस्वीरों में बिल्कुल परफेक्ट दिखाई देती है. ऐसे में अकेला महसूस कर रहा व्यक्ति सोचने लगता है कि शायद सिर्फ उसकी जिंदगी ही खाली है. वह दूसरों की चमकदार तस्वीरों की तुलना अपनी असली जिंदगी से करने लगता है. धीरे-धीरे यह एहसास और बढ़ सकता है कि लोग उसे पसंद नहीं करते या वह दूसरों के लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है.
दोस्तों की कमी नहीं, असली बातचीत की कमी
साइकोलॉजिस्ट कहते हैं कई बार अकेलेपन का मतलब यह नहीं होता कि आपके आसपास कोई नहीं है. इंसान लोगों से घिरा हुआ हो सकता है, लेकिन फिर भी उसके पास ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होता जिससे वह खुलकर अपने दिल की बात कर सके. आज बहुत से लोगों की बातचीत सिर्फ काम, सोशल मीडिया, मजाक या रोजमर्रा की बातों तक सीमित रह जाती है. लेकिन जब किसी को सच में यह पूछने वाला नहीं मिलता कि तुम सच में कैसे हो, तब अंदर का अकेलापन महसूस होने लगता है.
बड़ी पार्टी या शानदार ट्रिप से ज्यादा जरूरी है लोगों से लगातार मिलते रहना. एक साथ चाय पीना, वॉक पर जाना, किसी क्लास में जाना या हर हफ्ते किसी तय जगह पर मिलना धीरे-धीरे रिश्तों को मजबूत बना सकता है. यानी नई दोस्ती हमेशा किसी बड़े और खास मौके से नहीं बनती. कई दफा बार-बार होने वाली साधारण मुलाकातें ही सबसे गहरे रिश्ते बना देती हैं.
अकेलापन हमेशा आपकी कमी नहीं है
पवन गुगरी कहते हैं अगर आप 20 या 30 की उम्र में अकेलापन महसूस कर रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप में कोई कमी है या लोग आपको पसंद नहीं करते. यह जिंदगी का ऐसा दौर हो सकता है, जहां पुराने रिश्ते बदल रहे होते हैं और नए रिश्तों को बनने में समय लग रहा होता है. जरूरत है कि आप पहल करने से न डरें. किसी पुराने दोस्त को मैसेज करें, मिलने का प्लान बनाएं और किसी नए ग्रुप या एक्टिविटी से जुड़ने की कोशिश करें. याद रखें, अकेलापन जिंदगी का स्थायी फैसला नहीं है. कभी-कभी बस एक मैसेज, एक मुलाकात और बार-बार की छोटी कोशिशें जिंदगी में फिर से लोगों को करीब ला सकती हैं.
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