स्वरा भास्कर के बयान से फिर चर्चा में जौहर, क्या है 1303 ईस्वी के चित्तौड़ की कहानी?

स्वरा भास्कर के बयान के बाद जौहर एक बार फिर बहस के केंद्र में है. जौहर को इतिहास और लोककथाओं की नजर से देखना जरूरी है. आखिर 1303 में चित्तौड़ में क्या हुआ था?

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सन 1303 की घटना पर फिल्म पद्मावत बनी है, इसमें पद्मावती का किरदार दीपिका पादुकोण ने निभाया था. (Photo: Screengrab/Instagram @reallyswara) सन 1303 की घटना पर फिल्म पद्मावत बनी है, इसमें पद्मावती का किरदार दीपिका पादुकोण ने निभाया था. (Photo: Screengrab/Instagram @reallyswara)

पन्ना लाल

  • नई दिल्ली,
  • 02 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 10:15 PM IST

जौहर सिर्फ इतिहास की एक घटना नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत के उस भयावह दौर की कहानी है, जब युद्ध में हार को महल की स्त्रियों के लिए मृत्यु से भी बड़ी त्रासदी माना जाता था. दुश्मन सेना के किले में दाखिल होने से पहले राजघरानों और योद्धा समुदायों की महिलाएं सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश कर अपने प्राण त्याग देती थीं. इसे ही जौहर कहा गया. 

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यह कोई आकस्मिक आवेग नहीं था, यह संस्कृति का अंतिम शस्त्र था. जब पुरुष रणभूमि में ‘केसरिया’ बांधकर मरने को निकलते, तब नारियां ‘जौहर’ की अग्नि में अपने अस्तित्व को समर्पित कर देती थीं.

इसके पीछे उस समय की सामाजिक मान्यताएं, युद्ध से जन्मीं परिस्थितियां, स्त्री की अस्मिता और हारी हुई महिलाओं के सामने आने वाले संभावित अत्याचारों का डर जैसे कई कारण बताए जाते हैं. 

राजस्थान के इतिहास में चित्तौड़ के जौहर सबसे अधिक चर्चित हैं. इनमें सबसे प्रसिद्ध कथा रानी पद्मावती से जुड़े जौहर की है, हालांकि इतिहासकार इसे लेकर अलग-अलग मत रखते हैं.

स्वरा भास्कर के बयान से जौहर की कहानी फिर से चर्चा में आ गई है. स्वरा ने कहा संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावत' पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था , “मैं इसे देख रही थी और सोचा कि भगवान न करे, अगर मैं रेप सर्वाइवर होती तो ये फिल्म मुझे क्या बता रही है? मुझे कायर जैसा महसूस होता कि मैंने अपनी इज्जत बचाने के लिए खुदकुशी क्यों नहीं की. क्या हम ये कहना चाहते हैं कि रेप किसी महिला की जिंदगी का अंत है? ये सीन बहुत प्रॉब्लमैटिक था.”

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स्वरा के इस बयान के बाद सोशल मीडिया में उबाल आ गया है. 

आखिर वह कैसी परिस्थितियां थीं, जिनमें जीवन से बड़ी अपनी अस्मिता की रक्षा मानी गई? यही सवाल जौहर की कहानी को आज भी संवेदनशील और बहस का विषय बनाता है. 

आइए लगभग 700 वर्ष पीछे चलते हैं. उन पन्नों को उलटते हैं जब चित्तौडगढ़ को दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने घेर रखा था. 

साल 1303. दिल्ली की गद्दी पर सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी बैठा था और उसकी नजर चित्तौड़गढ़ पर थी. उस समय चित्तौड़ पर रतन सिंह राज कर रहे थे. खिलजी की विशाल सेना ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ के दुर्ग को घेर लिया. अलाउद्दीन ने किले के उत्तर में स्थित चित्तौड़ी पहाड़ी पर अपना डेरा डाला था.

तब चित्तौड़गढ़ राजपूत सत्ता और प्रतिष्ठा का बड़ा केंद्र माना जाता था. यह घेराबंदी करीब आठ महीने चली और किले के रक्षकों ने लंबे समय तक प्रतिरोध किया. समकालीन इतिहासकार और खिलजी के दरबारी कवि अमीर खुसरो भी इस अभियान के साथ थे और उन्होंने अपनी रचना खजाइन-उल-फुतूह में चित्तौड़ अभियान का उल्लेख किया है. 

खुसरो का कहना है कि हमलावरों के सीधे हमले दो बार नाकाम रहे. वे बताते हैं कि बारिश के मौसम के दो महीनों में हमलावर पहाड़ी के 'मध्य भाग' तक तो पहुंच गए, लेकिन उससे आगे नहीं बढ़ पाए. अलाउद्दीन ने घेराबंदी करने वाले यंत्रों से किले पर पत्थर बरसाने का आदेश दिया. साथ ही, उसके बख्तरबंद सैनिकों ने चारों तरफ से किले पर हमला किया. 

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लंबी घेराबंदी के चलते किले के भीतर खाद्यान्न और दूसरी आवश्यक चीजों की स्थिति बिगड़ने की आशंका थी. भीषण प्रतिरोध के बाद खिलजी ने फतह हासिल की और 26 अगस्त 1303 को किले में दाखिल हुआ. 

अलाउद्दीन ने किले में नरसंहार का आदेश दिया. उस रोज चित्तौड़गढ़ के किले में कितने लोग मारे गए, इसका स्पष्ट आंकड़ा नहीं मिलता है. कुछ विवरणों में इसे तीस हजार तक बताया गया है. हालांकि बाद के इतिहासकारों ने इस संख्या की सटीकता पर सवाल उठाए हैं.

इसी घटना के साथ चित्तौड़ के जौहर की परंपरा को जोड़ा जाता है. जिसका अर्थ है शत्रु के हाथों पड़ने की आशंका के बीच महिलाओं का सामूहिक रूप से अग्नि में प्रवेश कर प्राण त्यागना.  इसके बाद पुरुष योद्धाओं द्वारा अंतिम युद्ध लड़ने की परंपरा को साका कहा जाता था. 

हालांकि 1303 के जौहर का विस्तृत समकालीन विवरण उपलब्ध नहीं है. अमीर खुसरो मुख्य रूप से किले की घेरेबंदी, संघर्ष, किले पर कब्जे और नरसंहार पर ध्यान केंद्रित करते हैं. हालांकि वे 1301 में वे रणथंभौर 1301 के जौहर का स्पष्ट वर्णन करते हैं, जिससे पता चलता है कि यह प्रथा उस समय प्रचलित थी. 

हालांकि बाद के इतिहास-लेखन में चित्तौड़ की इस घटना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. इसमें मलिक मोहम्मद जायसी का नाम प्रमुख है. 

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मलिक मोहम्मद जायसी का जन्म लगभग 1477 में अवध के जायस कस्बे में माना जाता है. जायसी ही वो कवि हैं जिनकी साहित्य की रचना पद्मावत में रानी पद्मावती का जिक्र है. 

जायसी ने 1303 के चित्तौड़ अभियान को इतिहास की तरह नहीं, बल्कि प्रेम, सत्ता और आध्यात्मिक बिंबों से बुनी काव्य-कथा के रूप में पेश किया. उनकी अवधी रचना पद्मावत लगभग 1540 में लिखी गई थी, यानी चित्तौड़ की घेराबंदी के करीब 237 साल बाद. 

जायसी पद्मावती के किरदार को गढ़ते हुए लिखते हैं, "पद्मावती सिंहली राज्य (श्रीलंका में) की बेहद खूबसूरत राजकुमारी थीं. चित्तौड़ किले के राजपूत शासक रतन सिंह ने हीरामन नाम के बोलने वाले तोते से उनकी सुंदरता के बारे में सुना था. एक साहसिक अभियान के बाद, उन्होंने उनसे विवाह किया और उन्हें चित्तौड़ ले आए."

पद्मावती की सुंदरता की खबर अलाउद्दीन खिलजी तक पहुंची. जायसी की कथा में राघव चेतन नाम का व्यक्ति सुल्तान को पद्मावती के सौंदर्य के बारे में बताता है. इसके बाद खिलजी चित्तौड़ पर चढ़ाई करता है.

पद्मावत की कथा के अनुसार अलाउद्दीन द्वारा किले को जीतने से पहले ही कुंभलनेर के शासक के साथ हुई लड़ाई में रतन सिंह की मृत्यु हो गई थी. इसके बाद जब चित्तौड़ का पतन निश्चित दिखाई देता है, तब रानी पद्मावती और किले की अन्य राजपूत महिलाएं जौहर करती हैं. 

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