दुनिया के 'असली' मैप में क्या-क्या बदलेगा, US खिलाफ क्यों, भारत ने किस बात पर चेतावनी दी

450 साल से क्या हम दुनिया को गलत आकार में देखते आ रहे थे? क्या नक्शे पर बड़ा दिखना ही दुनिया में बड़ा होना है? ‘Correct the Map’ की मुहिम इसी भ्रम को चुनौती दे रही है. लेकिन पेच ये है कि गोल धरती को सपाट कागज पर उतारेंगे, तो कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर होगी.

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अफ्रीका Mercator मैप प्रोजेक्शन के साथ Equal Earth प्रोजेक्शन को बढ़ावा चाहता है (फोटो क्रेडिट- Pixabay) अफ्रीका Mercator मैप प्रोजेक्शन के साथ Equal Earth प्रोजेक्शन को बढ़ावा चाहता है (फोटो क्रेडिट- Pixabay)

विष्णु रावल

  • नई दिल्ली,
  • 08 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 12:16 PM IST

भारत में हिस्ट्री चैप्टर्स पर विवादों के बीच संयुक्त राष्ट्र (UN) ने ज्योग्राफी का पूरा सिलेब्स ही मानो हैक कर दिया. अरे, घबराइए नहीं, दुनिया नहीं बदली है. बस उसे दिखाने वाला नक्शा बदलने की मुहिम शुरू हुई है.

टीचर्स डे पर बच्चों को 'गिफ्ट' में दुनिया का नक्शा मिला है. इसमें अमेरिका, ग्रीनलैंड, रूस और अफ्रीका को अपने 'असली' रूप में दिखाया जाएगा.

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मतलब 450 साल से दुनिया को नक्शे में हम जिस तरह देख रहे थे, असल में वो वैसी नहीं थी!

अबतक स्कूलों में जिस Mercator मैप के जरिए हम दुनिया को देखते आए थे, उसमें अमेरिका और ग्रीनलैंड को काफी बड़ा दिखाया जाता था. लेकिन असलियत ये अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3.0 करोड़ वर्ग किमी है, जबकि ग्रीनलैंड करीब 21.6 लाख वर्ग किमी में फैला है... यानी अफ्रीका करीब 14 गुना बड़ा है.

मतलब, अफ्रीका पृथ्वी का दूसरा सबसे बड़ा महाद्वीप है. जिसमें अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और यूरोप का एक बड़ा हिस्सा समा सकता है और फिर भी काफी जमीन बच जाएगी.

अब बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?

अफ्रीका को Cartography (नक्शे बनाने के विज्ञान) की कुछ खास प्रोजेक्शन से दिक्कत थी, जो अफ्रीका को साइज में छोटा दिखाते थे. इसमें मर्केटर प्रोजेक्शन सबसे प्रचलित है. जो नक्शे हम स्कूल टाइम से देखते आ रहे हैं वो भी इसी प्रोजेक्शन के आधार पर बने थे. इसके अलावा Equirectangular, Gall-Peters, Equal Earth जैसे अलग-अलग प्रोजेक्शन मौजूद हैं.

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अफ्रीका का आरोप है कि मर्केटर मैप जानबूझकर अमेरिका को बड़ा और अफ्रीका को छोटा दिखाता रहा, इसलिए उन्होंने इसमें बदलाव की मांग की.

इसके लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में Correct the Map नाम से प्रस्ताव लाया गया. इसे अफ्रीकी संघ और टोगो देश (घाना के बराबर में) ने पेश किया. भारत समेत कुल 164 देशों ने इसका सपोर्ट किया. 6 देशों (सर्बिया, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा और यूक्रेन) ने वोट नहीं किया. वहीं इकलौते अमेरिका ने इसका विरोध किया.

Mercator प्रोजेक्शन किसने बनाया था?

दुनिया का नक्शा तो आपने भी देखा होगा. वही नक्शा, जिसे हम स्कूल में लेकर चलते थे और जिसकी तस्वीर-पोस्टर अक्सर दीवारों पर नजर आती थी. इस नक्शे को बनाने वाले थे जेरार्डस मर्केटर (Gerardus Mercator). साल था 1569 और जगह थी यूरोप. जेरार्डस धरती और भूगोल के जानकार, मानचित्रकार और गणितज्ञ थे.

उन्होंने 1569 में दुनिया का एक बड़ा नेविगेशनल वर्ल्ड मैप प्रकाशित किया. चूंकि इसे मर्केटर ने बनाया था, इसलिए इस नक्शे को नाम मिला- Mercator Projection.

16वीं सदी में यूरोप के जहाज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में समुद्र के रास्ते जा रहे थे. उस समय सबसे बड़ी जरूरत थी कि जहाज किस दिशा में लगातार चलता रहे ताकि वह सही जगह पहुंचे.

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इसलिए मर्केटर ने नक्शा बनाया. उन्होंने गोल पृथ्वी को सपाट करके दुनिया के सामने रख दिया. अपने Mercator Projection में मर्केटर ने Conformal Projection का इस्तेमाल किया. इसकी खासियत ये थी कि छोटे हिस्सों के एंगल्स और लोकल शेप को वैसा ही दिखाने की कोशिश हुई.

उनके प्रोजेक्शन का मकसद दुनिया को बिल्कुल सही आकार में दिखाना नहीं था. बल्कि समुद्री यात्रियों को सही दिशा में आसानी से रास्ता दिखाना था.

लेकिन फिर दिक्कत कहां हुई?

Mercator का नक्शा नेविगेशन के लिए तो क्रांतिकारी साबित हुआ. लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी. दिशा और कोण को बचाने के लिए नक्शे में क्षेत्रफल बिगड़ गया. इसलिए ध्रुवों के पास की जमीन खिंचकर बहुत बड़ी दिखाई देने लगी. 

क्योंकि जब गोल पृथ्वी को Mercator Projection में चौकोर/सपाट नक्शे पर फैलाकर दिखाया जाता है, तो जैसे-जैसे हम उत्तर या दक्षिण ध्रुव के करीब जाते हैं, नक्शा उन जगहों को खींचकर बड़ा दिखाने लगता है.

जैसे- रबर की गेंद पर बनी तस्वीर को खींचकर सपाट करने पर किनारे की तस्वीरें फैल जाएंगी. पृथ्वी के साथ Mercator Projection में कुछ ऐसा ही होता है.

उदाहरण के लिए:

ग्रीनलैंड असल में अफ्रीका से बहुत छोटा है. लेकिन Mercator वाले नक्शे में ग्रीनलैंड इतना बड़ा दिखाई देता है कि वह अफ्रीका के लगभग बराबर लगता है.

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क्या अब दुनियाभर में नक्शे बदल जाएंगे?

नहीं. ऐसा नहीं होने वाला. Correct the Map प्रस्ताव का मकसद दुनिया के हर नक्शे को एक ही प्रोजेक्शन में बदलना नहीं है.  Correct the Map प्रस्ताव का मकसद Equal-Area Projections के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है. Equal Earth उन्हीं प्रोजेक्शन्स में से एक है.

टोगो के मंत्रालय ने भी कहा कि यह प्रस्ताव कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है. साथ ही, इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि समुद्री नेविगेशन में इस्तेमाल होने वाले Mercator Projection को गलत या बेकार माना जा रहा है. नेविगेशन के लिए वह अब भी पूरी तरह उपयोगी है.

अफ्रीकी देशों की चिंता बस यह थी कि नेविगेशन के लिए बेहद उपयोगी मर्केटर प्रोजेक्शन का इस्तेमाल स्कूलों और सामान्य वर्ल्ड मैप्स में भी बड़े पैमाने पर हुआ, जहां क्षेत्रफल की तुलना ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. अब अगर बच्चा बचपन में ही ये देखेगा कि अफ्रीका छोटा है, अमेरिका-यूरोप बड़े तो उसे जीवन भर वही याद रहेगा.

इसलिए अब टोगो ने 2026 के आखिर तक अपने स्कूलों में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शे को बदल देने का ऐलान भी किया है. वहां अब Mercator Projection वाला नक्शा नहीं बल्कि Equal Earth Projection वाला नक्शा पढ़ाया जाएगा.

साथ ही अफ्रीकी संघ ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, स्कूल-कॉलेजों, किताबें छापने वालों और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगों से कहा है कि वे ऐसे नक्शों का इस्तेमाल बढ़ावा दें, जिनमें दुनिया के अलग-अलग इलाकों का आकार उनकी असली जमीन के करीब दिखे.

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नक्शे पर किस-किस देश का साइज बदल जाएगा?

नए मैप में ग्रीनलैंड, कनाडा, अमेरिका, अलास्का, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, आइसलैंड, ब्रिटेन और यूरोप के कई देश छोटे दिखेंगे.

वहीं अफ्रीका के लगभग सभी देश, इंडोनेशिया, ब्राजील और दक्षिण अमेरिका के कई देश बड़े दिखेंगे. वहीं भारत के नक्शे पर कोई खास असर नहीं होगा.

अमेरिका खिलाफ क्यों?

UN में अमेरिका इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट देने वाला एकमात्र देश था. अमेरिका ने इसे ‘वैचारिक एजेंडा’ बताते हुए कहा कि इससे अंतरराष्ट्रीय शांति, समृद्धि और अच्छे संबंधों से जुड़ी वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकता है.

भारत ने अफ्रीका के Correct the Map प्रस्ताव का सपोर्ट किया. लेकिन साथ में दो-टूक संदेश भी दिया. UN में भारत ने कहा कि हम ऐसे नक्शों को बढ़ावा देने की सोच का समर्थन करता है, जो दुनिया और अलग-अलग इलाकों का आकार ज्यादा सही तरीके से दिखाते हैं. 

हालांकि, भारत ने साफ किया कि इस प्रस्ताव का मतलब ‘Equal Earth Projection’ को मंजूरी देना नहीं है. भारत का समर्थन किसी एक खास नक्शे के लिए नहीं, बल्कि सभी ‘Equal-area’ projections के ज्यादा इस्तेमाल के पक्ष में है. ऐसे नक्शों में अलग-अलग महाद्वीपों और देशों के क्षेत्रफल का आपसी अनुपात सही रहता है.

भारत ने यह भी कहा कि हर नक्शा हर काम के लिए सही नहीं होता. कुछ नक्शे आकार को सही रखने के लिए बनाए जाते हैं, तो कुछ दिशा, दूरी या आकृति को ज्यादा सही दिखाने के लिए. इसलिए किसी एक प्रोजेक्शन को हर जगह इस्तेमाल करने पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए.

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इसलिए भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, लेकिन यह समर्थन सिर्फ इस सिद्धांत तक सीमित है कि जहां महाद्वीपों के असली आकार की तुलना जरूरी हो, वहां Equal-area projection को ज्यादा इस्तेमाल किया जाए. भारत ने ‘Equal Earth Projection’ समेत किसी एक खास projection का समर्थन नहीं किया.

फिर रविवार को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ किया कि संयुक्त राष्ट्र (UN) के किसी भी प्रस्तावित वर्ल्ड मैप में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को भारत के आधिकारिक नक्शे के अनुसार ही दिखाया जाना चाहिए. भारत ने चेतावनी दी कि सीमाओं का कोई भी गलत या भ्रामक चित्रण स्वीकार नहीं किया जाएगा.

क्या कोई एकदम सही World Map है?

नहीं. गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारते वक्त किसी न किसी चीज में विकृति आएगी. कोई प्रोजेक्शन एरिया को बेहतर बचाता है, कोई शेप को, कोई दूरी या दिशा को. इसलिए हर काम के लिए एक ही प्रोजेक्शन सबसे सही नहीं हो सकती. गूगल मैप्स में भी आपको यही स्थिति दिखेगी क्योंकि वो मर्केटर प्रोजेक्शन का डिजिटल रूप है. वहीं गोल-गोल ग्लोब पर महाद्वीपों का आकार वास्तविकता के ज्यादा करीब दिखता है.

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