फैक्ट्री मालिक ने बताया- कौन सा लेदर है डिफेक्टिव, जो 90% सस्ता बिकता है! 

कानपुर को लेदर सिटी के नाम से जाना जाता है. यहां कच्चे चमड़े से जूते, बेल्ट, जैकेट और बैग जैसे प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं. फैक्ट्री में मामूली सिलवट या खराबी वाला चमड़ा डिफेक्टिव मान लिया जाता है और उसकी कीमत करीब 90 फीसदी तक कम हो सकती है.

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जानिए कच्चे चमड़े से तैयार लेदर प्रोडक्ट बनने तक की पूरी कहानी. ( Photo: ITG) जानिए कच्चे चमड़े से तैयार लेदर प्रोडक्ट बनने तक की पूरी कहानी. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 06 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:19 AM IST

कानपुर को यूं ही देश की लेदर सिटी नहीं कहा जाता. यहां चमड़े से जूते, बेल्ट, जैकेट, बैग और कई तरह के दूसरे सामान तैयार किए जाते हैं. खास बात यह है कि जिन लेदर प्रोडक्ट्स को लोग शोरूम में हजारों रुपये में खरीदते हैं, उन्हें तैयार करने की प्रक्रिया काफी दिलचस्प है. कच्चे चमड़े से लेकर तैयार प्रोडक्ट तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है. कानपुर की लेदर इंडस्ट्री सिर्फ कारोबार का हिस्सा नहीं है, बल्कि इससे शहर की अर्थव्यवस्था और बड़ी संख्या में लोगों का रोजगार भी जुड़ा हुआ है.

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फैक्ट्री में इस्तेमाल होने वाला लेदर अलग-अलग स्रोतों से आता है. इसमें भैंस और बकरी की खाल का भी इस्तेमाल होता है. कई फैक्ट्रियां विदेशों से भी खास तरह का लेदर मंगाती हैं. फैक्ट्री में पहुंचने के बाद कच्चे चमड़े में नमी होती है. सबसे पहले इसे सुखाया जाता है. इसके बाद हाइड्रोलिक प्रेस की मदद से चमड़े को दबाया जाता है. इससे इसकी सतह ज्यादा चिकनी और बेहतर हो जाती है. इसके बाद चमड़े पर रंग और दूसरे केमिकल्स की कोटिंग की जाती है. इसके लिए रोलर कटर मशीन का इस्तेमाल किया जाता है. मशीन चमड़े की सतह पर एक समान कोटिंग करती है. फिर इसे ड्रायर से सुखाया जाता है.

मशीनों के बाद होती है सबसे जरूरी जांच
लेदर तैयार होने के बाद उसे सीधे प्रोडक्ट बनाने के लिए नहीं भेज दिया जाता. सबसे पहले उसकी अच्छी तरह जांच होती है. फैक्ट्री में कर्मचारी चमड़े को देखकर यह पता लगाते हैं कि उसमें कहीं कोई दाग, सिलवट, कट तो नहीं है. अगर चमड़े में छोटा सा भी डिफेक्ट दिखाई देता है तो उसे अलग कर दिया जाता है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिस चमड़े में मामूली सी सिलवट भी हो, वह प्रीमियम क्वालिटी के माल में शामिल नहीं किया जाता. ऐसे चमड़े को रिजेक्शन या डिफेक्टिव माल की कैटेगरी में डाल दिया जाता है. फैक्ट्री के मुताबिक, ऐसा माल सामान्य कीमत के मुकाबले करीब 10 फीसदी लागत पर बिक सकता है. यानी मामूली डिफेक्ट की वजह से उसकी कीमत करीब 90 फीसदी तक कम हो सकती है.

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400-500 रुपये का बेल्ट बाजार में 2000-3000 रुपये तक
कानपुर की फैक्ट्रियों में बनने वाले लेदर प्रोडक्ट्स की कीमत और बाजार में उनकी कीमत के बीच काफी अंतर देखने को मिलता है. फैक्ट्री में एक सामान्य बेल्ट करीब 400 से 500 रुपये की लागत में तैयार हो सकता है. यही बेल्ट रिटेल मार्केट में 2000 से 3000 रुपये तक बिक सकता है. इसकी कीमत में मैन्युफैक्चरिंग के अलावा पैकेजिंग, ट्रांसपोर्ट, दुकानदार का मार्जिन और ब्रांड की कीमत भी जुड़ जाती है. लेकिन जब बात बड़े लग्जरी ब्रांड्स की आती है तो कीमत कई गुना बढ़ जाती है. बड़े ब्रांड्स के बेल्ट लाखों रुपये तक में बिकते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह सिर्फ चमड़े की लागत नहीं बल्कि ब्रांड वैल्यू भी होती है. यानी कई बार ग्राहक जिस कीमत का भुगतान करता है, उसका बड़ा हिस्सा सिर्फ लेदर के लिए नहीं बल्कि ब्रांड के नाम और उसकी पहचान के लिए होता है.

कानपुर से होता है बड़ा लेदर एक्सपोर्ट
कानपुर की लेदर इंडस्ट्री का असर सिर्फ देश के बाजार तक सीमित नहीं है. यहां से बड़ी मात्रा में लेदर और लेदर प्रोडक्ट्स विदेशों में भी भेजे जाते हैं. बताया गया कि उत्तर प्रदेश से होने वाले कुल लेदर प्रोडक्ट्स के एक्सपोर्ट में कानपुर की बड़ी हिस्सेदारी है. कानपुर और उन्नाव का लेदर क्लस्टर इस उद्योग के लिए खास पहचान रखता है. इसी वजह से जब विदेशी खरीदार भारत में लेदर प्रोडक्ट्स के लिए सप्लायर तलाशते हैं तो कानपुर एक प्रमुख केंद्र के रूप में सामने आता है.

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अलग-अलग तरह के लेदर की होती है मांग
फैक्ट्रियों में अलग-अलग प्रकार के कच्चे माल का इस्तेमाल किया जाता है. इनमें बफेलो लेदर और बोवाइन लेदर प्रमुख हैं. बफेलो लेदर की घरेलू बाजार में काफी मांग है. वहीं कुछ खास तरह के बोवाइन लेदर का इस्तेमाल एक्सपोर्ट क्वालिटी के प्रोडक्ट्स में किया जाता है. कुछ लेदर विदेशों से भी मंगाया जाता है, क्योंकि वहां मिलने वाले कच्चे माल की क्वालिटी और प्रोसेसिंग अलग स्तर की होती है. बेल्ट तैयार करने के दौरान कटिंग, ग्राइंडिंग, बफिंग, किनारों पर कलर और फिनिशिंग जैसे कई चरण होते हैं. इन सभी प्रक्रियाओं के बाद चमड़ा एक प्रीमियम और चमकदार प्रोडक्ट का रूप लेता है.

छोटे कारोबारियों के लिए सरकारी योजनाएं भी मददगार
लेदर इंडस्ट्री में सिर्फ बड़ी फैक्ट्रियां ही नहीं बल्कि छोटे कारोबारी और कारीगर भी जुड़े हुए हैं. सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट यानी ODOP योजना के तहत छोटे कारोबारियों को भी मदद दी जाती है. इसके तहत लेदर से जुड़े काम के लिए मशीनें, सिलाई उपकरण और दूसरे जरूरी टूल्स उपलब्ध कराने में सहायता दी जाती है. इससे छोटे स्तर पर जूते, चप्पल, बैग, बेल्ट और दूसरे लेदर प्रोडक्ट्स बनाने वाले लोगों को कारोबार बढ़ाने का मौका मिलता है.

कानपुर की पहचान लंबे समय से लेदर इंडस्ट्री से जुड़ी हुई है. यहां कच्चे चमड़े से लेकर तैयार प्रोडक्ट तक एक पूरी इंडस्ट्री काम करती है. यही वजह है कि कानपुर को भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख लेदर मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट केंद्रों में गिना जाता है. कुल मिलाकर, अगली बार जब आप किसी शोरूम में हजारों रुपये का लेदर बेल्ट या बैग देखें तो याद रखिए कि उसकी कहानी सिर्फ दुकान से शुरू नहीं होती. उसके पीछे कच्चे चमड़े से लेकर मशीनों, कारीगरों, क्वालिटी चेक, फिनिशिंग, ब्रांडिंग और बाजार तक की एक लंबी प्रक्रिया होती है.

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