जहां जगह मिली, वहां एक कमरा बना दिया और उसे किराये पर चढ़ा दिया... अगर पूरा घर है तो उसमें पीजी, हॉस्टल, रेस्टोरेंट बना दिया. ये कहानी दिल्ली के किसी एक इलाके की नहीं हैं, बल्कि पूरी दिल्ली की है. तारों के मकड़जाल से घिरी इन तंग गलियां में चार-पांच मंजिल की कई इमारतें व्हील चेयर पर हैं. इसी का नतीजा है कि इमारत गिरती है, लोग मरते हैं, FIR होती है, कुछ इमारतों पर सीलिंग या तोड़फोड़ की कार्रवाई होती है और कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर उसी ढर्रे पर लौट आता है. फिर हादसों की ऐसी कहानी दोहराती रहती है. अब इसमें सत्य निकेतन एक और हादसा शामिल हो गया है और हमेशा की तरह एफआईआर, कार्रवाई का दौर भी शुरू हो गया है.
ऐसे में सवाल सिर्फ ये नहीं कि ये सब कैसे हुआ जबकि सवाल ये है कि इसे होने किसने दिया और क्या कभी ऐसे हादसे रुक पाएंगे? सवाल उन हजारों इमारतों का है, जो दिल्ली की संकरी गलियों में नियमों को धता बताकर खड़ी हैं. खास बात ये है कि जब कागजों में लिखे नियम पढ़ते हैं तो पता चलता है कि अगर इनका पालन हो जाए तो शायद ये ‘मौत की इमारतें’ भी बनना बंद हो जाए.
सत्य निकेतन में जो बिल्डिंग गिरी है, वो 40-50 साल पुरानी थी और इसे तीन की जगह पांच मंजिल तक अवैध बना दिया गया. ऐसा ही हाल इसके बगल वाली बिल्डिंग का है, जिसे लोहे के पिलर लगाकर गिरने से रोका गया है. वो बिल्डिंग भी झुकी हुई है. अब हादसे के बाद दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 की धारा 348, को धारा 491 के तहत तीन दिन में बिल्डिंग को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया है.
कितने मंजिल का घर बना सकते हैं?
अगर नियमों की बात करें तो दिल्ली में डीडीए बिल्डिंग से जुड़े नियमों का फ्रेमवर्क तैयार करता है और उसके हिसाब से एमसीडी का बिल्डिंग अप्रूवल सिस्टम काम करता है. इसी के आधार पर तय होता है कि कहां, कितना ऊंचा घर बन सकता है. नियमों के अनुसार, घर की ऊंचाई या मंजिल के लिए कोई सिंगल लाइन रूल नहीं है, ये प्लॉट या जमीन की साइज, उसके सामने वाली सड़क, इलाके और उस जमीन पर अलॉट एफएआर (कितना निर्माण कर सकते हैं) के आधार पर तय होता है. इस सभी को ध्यान में रखते हुए नक्शे को परमिशन मिलती है.
कई सर्टिफिकेट भी चाहिए
फिर नक्शा पास होने के बाद घर बनता है और घर बनने के बाद भी ऑक्यूपेसी सर्टिफिकेट जारी किया जाता है, जिसमें अधिकारी देखते हैं कि मकान नक्शे के हिसाब से है या नहीं और किस तरह से मकान बनाया गया है. इसके लिए बिल्डिंग की तस्वीरें आदि जमा करनी होती है. वहां से फाइल पास होने के बाद ऑक्यूपेसी सर्टिफिकेट मिलता है. इसके साथ ही स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट भी होता है, जो बताता है कि घर को मजबूती से बनाया गया है. इसके बाद एमसीडी ये भी देखती रहती है कि कौनसी बिल्डिंग जर्जर है या नहीं, ऐसा पाया जाने पर नगर निगम उसे खाली करने या तोड़ने का आदेश दे सकता है.
नियमों के हिसाब से तो घर को मजबूत बनाया जाना अनिवार्य है और लोकेशन के हिसाब से मकान बनाया जाना जरूरी है. लेकिन, एक बार नियमों के हिसाब से मकान बनने के बाद उनका समय समय पर ऑडिट भी जरूरी है कि आखिर अब वे किस स्थिति में हैं.
बता दें कि सत्य निकेतन इलाके में बिल्डिंग गिरने से हुए हादसे में अब तक 7 लोगों की मौत हो चुकी है और अभी भी ऑपरेशन जारी है. आशंका है अभी भी मलबे में लोग फंसे हो सकते हैं. साथ ही इस मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है. यह मामला BNS की धारा 105/290/125(a) के तहत दर्ज किया गया है. FIR में कथित तौर पर बिल्डिंग के मालिक हरिराम समेत अन्य लोगों को आरोपी बनाया गया है. पुलिस के मुताबिक, यह बिल्डिंग PG (पेइंग गेस्ट) के रूप में इस्तेमाल हो रही थी. आरोप है कि बिल्डिंग के ग्राउंड फ्लोर पर रेनोवेशन/निर्माण कार्य चल रहा था.
इसी दौरान बिल्डिंग का ढांचा कमजोर होने के कारण उसके ढहने की आशंका जताई जा रही है. आरोपियों की तलाश और उन्हें ट्रेस करने के लिए पुलिस की कई टीमें गठित की गई हैं. पुलिस और राहत-बचाव एजेंसियों की टीमें लगातार मौके पर मौजूद हैं.
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